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Zakir Hussain: 11 साल की उम्र में अमेरिका में पहला कॉन्सर्ट, चुनौतियों को पार कर जाकिर ने ऐसे बनाया था मुकाम

Mon, 16 Dec 2024 07:15 AM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

Zakir Hussain: भारतीय शास्त्रीय संगीत में महान योगदान देने वाला तबलावादक और पद्म विभूषण से सम्मानित जाकिर हुसैन का आज निधन हो गया। उन्होंने 11 साल की उम्र में पहली बार अमेरिका में कॉन्सर्ट किया था। वह दुनिया भर में भारतीय शास्त्रीय संगीत की धारा को फैलाने में अग्रणी रहे।  
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उस्ताद जाकिर हुसैन - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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मशहूर तबला वादक जाकिर हुसैन का लंबी बीमारी के बाद अमेरिका के एक अस्पताल में निधन हो गया। वह जब भी अपनी उंगलियों और हाथ की थाप से तबला बजाते थे तो दुनिया को मंत्रमुग्ध कर देते थे। उनके तबले के सुर को सुनते ही लोग कहते थे- वाह उस्ताद। जाकिर हुसैन ने न केवल भारत, बल्कि दुनियाभर में अपनी कला डंका बजाया था। जीवन में प्रसिद्धी हासिल करने के बाद भी वह सादगी से जीवन जीना पसंद करते थे और जमीन से जुड़े रहते थे। कई संघर्षों के बाद उन्होंने इस मुकाम को हासिल किया था। आइए उनके बारे में विस्तार से जानते हैं-

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पिता से सीखी कला, 11 साल की उम्र में अमेरिका में पहला कॉन्सर्ट
जाकिर हुसैन का जन्म 9 मार्च 1951 को मुंबई में हुआ था। वह तबला वादक उस्ताद अल्ला रक्खा के बेटे हैं। जाकिर को तबला बजाने का यह हुनर अपने पिता से विरासत में मिला था। उन्होंने बचपन से ही पूरी लगन के साथ वाद्य बजाना सीखा। महज तीन साल की उम्र में ही उन्होंने पखावज बजाना सीख लिया था। यह कला उनके पिता ने उन्हें सिखाई थी। उन्होंने महज 11 साल की उम्र में ही अमेरिका में अपना पहला कॉन्सर्ट किया था। इसके बाद साल 1973 में अपना पहला एल्बम 'लिविंग इन द मैटेरियल वर्ल्ड' लॉन्च किया।

जब आरक्षित बोगी में यात्रा नहीं कर पाए थे जाकिर
छोटी  सी उम्र में ही जाकिर ने तबले पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी। इसके बाद उन्होंने 11-12 साल की उम्र में तबला वादन का सफर शुरू कर दिया था। वह जगह-जगह अपने कॉन्सर्ट के लिए यात्रा करते थे। अपने तबले को सरस्वती मानकर उन्होंने उसकी हिफाजत और इबादत में कोई कमी नहीं छोड़ी। जाकिर ने बताया था कि जब वह यात्रा करते थे तो उनके पास इतने पैसे नहीं होते थे कि वह आरक्षित कोच में यात्रा कर सकें। इस वजह से वह ट्रेन की भीड़ वाली कोच में चढ़ जाते थे।
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पैसे के अभाव में परिवार से नहीं मिल पाते थे तबला वादक
ट्रेन में बैठने के लिए उस्ताद के पास आरक्षित सीट नहीं होती थी, इसलिए वह अखबार बिछाकर नीचे बैठ जाते थे। तबले पर किसी का पैर या जूता ना लगे, इसलिए वह उसे अपनी गोद में रख लेते थे। जब तक उनका सफर जारी रहता था, वह तबले को एक बच्चे की तरह गोद में उठाए रखते थे। संगीत यात्रा के दौरान पैसे के अभाव के कारण वह अपने परिवार से भी मिलने नहीं जा पाते थे। लगातार संघर्षों के बाद जब उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ, तब वह अपनी संगीत यात्रा में से समय निकालकर परिवार से मिलने जाने लगे।

भारतीय शास्त्रीय संगीत में दिया महान योगदान
तमाम चुनौतियां भरी राह को पार करने के बाद उन्होंने दुनिया भर के लोगों के दिल में जगह बनाई। जब भी वह तबला बजाते थे, तो लोग अपनी सुध बुध खो बैठते थे और एक नई दुनिया के सफर का आनंद लेते थे। भारतीय शास्त्रीय संगीत के विकास में उस्ताद का महान योगदान रहा है। साल 1988 में पद्मश्री और साल 2002 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। इसके बाद 2009 में उन्हें संगीत के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार ग्रैमी अवॉर्ड से भी नवाजा गया। 

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