संस्कृति, धर्म व दर्शन में रुचि घटने का मतलब नकलची बंदर वाली स्थिति
जेएनयू में समाजशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर आनंद कुमार बताते हैं कि मौजूदा शिक्षा नीति में संस्कृति, धर्म और दर्शन का कोई स्थान नहीं है। इन विषयों में युवाओं की रुचि घट रही है। ये मानव जीवन की जड़े हैं, जब कोई युवा इन्हें नहीं जानेगा तो वह बहुत सी बातों से अनभिज्ञ रहेगा। उनकी हालत नकलची बंदर वाली होगी।
पोस्ट ग्रेजुएशन तक जाने से पहले युवाओं को सभी विषयों का थोड़ा-थोड़ा ज्ञान दिया जाना चाहिए। उन्हें शेक्सपियर के बारे में भी जानना है, तुलसीदास और आइंस्टीन की जानकारी भी होनी चाहिए। रवींद्र नाथ टैगोर और गांधी भी जरुरी हैं।
अमेरिका, जिसके पीछे आज की युवा पीढ़ी भागती है, वहां युवाओं को सोशल सर्विस और आर्मी ट्रेनिंग भी देते हैं। हमारे यहां तो ऐसा कुछ नहीं है। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थान आपको सालाना एक करोड़ रुपये का पैकेज दे देंगे, इसमें कोई शक नहीं है।
सवाल यह है कि वहां काम करने वाला व्यक्ति एकांगी व्यक्ति बन रहा है। उसे जाति और धर्म की रेखा की जानकारी नहीं है। आनंद कुमार के मुताबिक, शिक्षा नीति ऐसी हो, जिसमें भारतीयता और मानवता के बीच संतुलन हो। युवा इन विषयों को पढ़ें, इसके लिए सरकार को रोजगार का परिदृश्य बदलना होगा। बाजारवाद वाली शिक्षा से परे हटकर सोचना होगा।