खगोलविदों ने अब तक ज्ञात सबसे कम उम्र के ग्रह की पुष्टि की है। एलियास 2-24 बी नाम का यह ग्रह 10 लाख साल से भी कम पुराना है और अभी भी गैस व धूल की उसी डिस्क के भीतर मौजूद है, जिससे इसका निर्माण हुआ है। यानी वैज्ञानिक किसी पुराने ग्रह को नहीं, बल्कि उसके जन्म के बेहद शुरुआती दौर को देख रहे हैं। इस खोज ने ग्रहों के बनने की प्रक्रिया को लेकर वैज्ञानिकों के सामने नई पहेली खड़ी कर दी है।
यह ग्रह इतना खास क्यों है?
एलियास 2-24 बी की खासियत सिर्फ इसकी कम उम्र नहीं है। नासा के अनुसार यह आकार में करीब बृहस्पति जितना विशाल है। इतना ही नहीं, वह पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी से करीब 55 गुना अधिक दूरी पर परिक्रमा कर रहा है। मौजूदा वैज्ञानिक सिद्धांतों के मुताबिक इतनी कम उम्र में इतनी दूर बृहस्पति जैसा बड़ा ग्रह बन जाना आसान नहीं माना जाता।
वैज्ञानिकों को ग्रह के होने का सुराग कैसे मिला?
एलियास 2-24 एक बेहद युवा तारा है, जिसके चारों ओर गैस, धूल, बर्फ और चट्टानी पदार्थ की विशाल डिस्क मौजूद है। चिली में स्थित एएलएमए ने पहले इस डिस्क में एक बड़ा गैप देखा था। बाद में यूरोपीय दक्षिणी वेधशाला के वेरी लार्ज टेलीस्कोप ने इसी गैप के भीतर एक बेहद कमजोर प्रकाश बिंदु दर्ज किया। करीब एक दशक से वैज्ञानिक यह पता लगाने में जुटे थे कि वह वास्तव में कोई ग्रह है या दूर स्थित किसी दूसरे तारे की रोशनी।
पुराने आंकड़ों ने कैसे खोला राज?
शोधकर्ताओं ने नासा की ओर से वित्तपोषित केक वेधशाला के पुराने आंकड़ों को खंगाला। उन्हें 2018 और 2020 में इसी वस्तु के दर्ज किए गए अवलोकन मिले। दोनों समय उसकी स्थिति की तुलना करने पर पता चला कि वह एलियास 2-24 के साथ गति कर रही थी। इससे पुष्टि करने में मदद मिली कि यह कोई दूर का पृष्ठभूमि तारा या तस्वीर की गलती नहीं, बल्कि अपने तारे की परिक्रमा कर रहा ग्रह है।
इतनी जल्दी ग्रह बना कैसे?
यही इस खोज का सबसे बड़ा सवाल है। मौजूदा मॉडल बताते हैं कि बृहस्पति जैसा विशाल ग्रह बनने में लाखों साल लग सकते हैं। सूर्य से बृहस्पति की दूरी के आसपास भी ऐसे ग्रह के निर्माण में करीब 50 लाख साल लगने का अनुमान है। इसके मुकाबले एलियास 2-24 बी इससे करीब 10 गुना ज्यादा दूर है, जबकि उसकी उम्र 10 लाख साल से भी कम है।
मौजूदा मॉडल के लिए चुनौती: इतनी कम उम्र में इतनी दूर एक विशाल ग्रह का मौजूद होना बताता है कि ग्रहों के निर्माण की प्रक्रिया में कुछ ऐसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं हो सकती हैं, जिन्हें मौजूदा मॉडल पूरी तरह शामिल नहीं करते।
दुर्लभ वैज्ञानिक मौका: यह ग्रह वैज्ञानिकों को ग्रहों के निर्माण के शुरुआती चरणों को वास्तविक अंतरिक्ष में परखने का दुर्लभ अवसर दे रहा है।
ग्रह बनते कैसे हैं: नए तारों के आसपास गैस और धूल की डिस्क बनती है। छोटे कण और चट्टानी टुकड़े धीरे-धीरे आपस में जुड़ते हैं और बड़े पिंड बनाते हैं, जो अपने आसपास की और सामग्री आकर्षित करके ग्रह का रूप लेते हैं।
नवजात ग्रह दिखना मुश्किल: ऐसे ग्रह अपने जन्मस्थल की धूल और गैस में छिपे रहते हैं। ऊपर से उनके तारे की तेज चमक ग्रह की कमजोर रोशनी को दबा देती है।
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क्या इससे हमारे सौरमंडल को समझने में मदद मिलेगी?
हमारा सौरमंडल करीब 4.6 अरब साल पुराना है। पृथ्वी और बृहस्पति जैसे ग्रहों को आज की अवस्था तक पहुंचने में अरबों साल लगे, लेकिन उनके जन्म के शुरुआती दौर को वैज्ञानिक सीधे नहीं देख पाए। एलियास 2-24 बी जैसे नवजात ग्रहों का अध्ययन यह समझने में मदद कर सकता है कि गैस और धूल की डिस्क से ग्रहों ने आकार लेना कैसे शुरू किया और विशाल ग्रह इतनी तेजी से कैसे विकसित हो सकते हैं।
आगे ऐसे और ग्रह कैसे मिलेंगे?
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि नासा का नैंसी ग्रेस रोमन स्पेस टेलीस्कोप ऐसे और युवा ग्रहों की खोज में मदद करेगा। इसमें अत्याधुनिक कोरोनाग्राफ है, जो किसी तारे की तेज रोशनी को रोककर उसके आसपास मौजूद बेहद कमजोर ग्रहों को देखने में मदद करेगा। एलियास 2-24 बी की खोज इसलिए अहम है क्योंकि यह वैज्ञानिकों को ग्रह के जन्म की प्रक्रिया को लगभग घटित होते हुए देखने का मौका दे रही है।