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'तुम कश्मीरी हो, तुम्हें घर देने में डर लगता है'

Fri, 02 Jun 2017 11:07 AM IST
amarujala.com- बीबीसी हिंदी.कॉम के लिए
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जब मैं फिजियोथेरेपी में बैचलर की डिग्री लेकर श्रीनगर लौटी तो मैंने नूरा अस्पताल में करीब आठ महीने तक काम किया। जिंदगी ऐसी थी कि घर से अस्पताल और अस्पताल से घर, बस। देहरादून या बेंगलुरु की तरह कोई शांति नहीं थी जहां से मैंने ग्रैजुएशन और पोस्ट ग्रैजुएशन किया था। मैं आगे पढ़ना चाहती थी और रिसर्च करना चाहती थी, लेकिन उसका कोई मौका नहीं था।
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मेरे पिता मेरा उत्साह बढ़ाते रहते थे। वो चाहते थे कि उनके बच्चे, यहां तक कि सभी बेटियां भी वो करें जो वो करना चाहती हैं। इस तरह मैं राजीव गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज से मास्टर्स डिग्री हासिल करने बेंगलुरु आई और एक क्लिनिकल रिसर्च कंपनी में मुझे नौकरी मिल गई।

श्रीनगर से अगर देहरादून और बेंगलुरू की तुलना करें तो बहुत अंतर है। कश्मीर में अगले दिन की योजना बनाते वक़्त कई पहलुओं का ध्यान रखना होता है। जैसे कि हड़ताल या कर्फ्यू या फिर कुछ और तो नहीं होना जा रहा अगले दिन। मसला सिर्फ नौकरी और पैसे का नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा को लेकर हमेशा एक चिंता बनी रहती है। माता-पिता भी बहुत तनाव में होते हैं।
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घर खोजने में परेशानी

देहरादून या बेंगलुरु में ऐसी कोई बात नहीं है। यहां बहुत शांति है और तमाम अवसर मौजूद हैं। हां, देहरादून और बेंगलुरु में दूसरे मसले जरूर थे। देहरादून में जब मैं फर्स्ट इयर में थी तो वहां रहने की व्यवस्था मेरे पिता ने करवाई थी। सेकंड इयर में अपने एक दोस्त के साथ जब मैंने एक फ्लैट में शिफ्ट होने की कोशिश की तब मुझे अहसास हुआ कि मेरा कश्मीरी होना समस्या पैदा कर रहा है। लोग मुंह पर ही कहने लगे थे,"क्योंकि तुम कश्मीरी हो, इसलिए तुम्हें घर देने में हमें डर लगता है।"

मेरी दोस्त मुस्लिम नहीं थी और दिल्ली से थी। जब हमें तीन-चार बार घर देने से इनकार कर दिया गया तो मेरी दोस्त ने कहा कि मुझे कश्मीर की बजाय जम्मू का जिक्र करना चाहिए। लेकिन मैं झूठ नहीं बोलना चाहती थी। ऐसा नहीं है कि सभी लोग ऐसे ही हैं। कुछ अच्छे लोग भी थे। तब मैंने एक आंटी से कहा कि 'मैं एक कश्मीरी हूं और अगर आपको इसे लेकर कोई एतराज है तो आप कह सकती हैं।'

आंटी ने कहा, ''अगर तुम वैसी नहीं हो तो तुम रह सकती हो। हम वहां चार साल तक रहे।'' लेकिन जब मैं मास्टर्स करने बेंगलुरु आई तो वहां मुझे देहरादून जैसा अनुभव नहीं करना पड़ा। हालांकि मेरे कुछ दोस्तों का अनुभव मुझसे अलग था। हां, ये भी सच है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को घर देने को लेकर मकान मालिक थोड़े उदार होते हैं।
 

कश्मीर के हालात

इंटरव्यू के दौरान मेरे जन्म स्थान को लेकर मुझे किसी भेदभाव या असहज सवालों का सामना नहीं करना पड़ा। सहकर्मी बाद में जरूर पूछते कि इतने सुंदर कश्मीर में हालात इतने बुरे क्यों हैं। मैं हमेशा उन्हें श्रीनगर आने और मेरे घर में ठहरने का न्यौता देती ताकि वो देख सकें कि यहां शांति क्यों नहीं है। आप मीडिया में जो देखते हैं वो अलग है। हमारे अंदर किसी के प्रति कोई घृणा नहीं है। हम बेहद खुले स्वभाव वाले और स्नेह से भरे लोग हैं।

आपको बताऊं, जब मैं श्रीनगर एयरपोर्ट से घर जाती हूं तो अपने पिता से कहती हूं कि मुझे लगता है कि हम कश्मीरी 50 साल पीछे चले गए हैं। मुझे लगता है कि हालात दिन ब दिन बिगड़ते ही जा रहे हैं। कश्मीर के लोगों में टैलेंट की भरमार है। लेकिन फिर वही बात कहूंगी कि टैलेंट होने के बावजूद यहां अवसर नहीं हैं। मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि कश्मीर में लोग जो कर रहे हैं उसकी वजह क्या है।

मैं कहना चाहूंगी कि अगर कोई मेरे सामने खड़ा हो और मैं उसे एक नहीं, दो नहीं, तीन नहीं बल्कि चार-चार झापड़ मारूं तो ये स्वाभाविक है कि वो शख्स जवाबी कार्रवाई करेगा। बेंगलुरु में मेरे सहकर्मी और दोस्त कहते हैं कि 'सभी पत्थरबाजों को पैसे दिए जाते हैं।' मेरा कहना है कि पूरी घाटी को पैसे नहीं दिए जा सकते। ये समझने की बात है कि अगर इतने बड़े पैमाने पर लोग सड़कों पर उतरे हैं तो कहीं न कहीं कुछ गलत है। कुछ लोगों को आगे आकर उनसे पूछना चाहिए कि ऐसा क्या है जो गलत है।
 
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सवाल मेरी जिंदगी का

मैंने एक साल बेंगलुरु में काम करने के बाद एक ब्रेक लिया है। मैं घर से 15 दिन काम कर सकती थी और बाकी के 15 दिन मैं छुट्टी पर थी। मेरे माता-पिता भी खुश थे। लेकिन चुनाव में कुछ गड़बड़ी के ठीक पांच दिन बाद इंटरनेट बंद हो गया। मुझे मेरे मैनेजर को कॉल करनी थी और हालात के बारे में बताना था। मेरा काम रिसर्च का है और उसका कई लोगों पर असर हो सकता है।

मुझे मेरे काम को दूसरे सहकर्मियों तक पहुंचाना था। आखिरकार मुझे टिकट कैंसल कराना पड़ा, नया टिकट लेना पड़ा और जल्दबाजी में लौटना पड़ा। ये सब निस्संदेह बहुत तनावभरा था। मैं आठ साल से कश्मीर से बाहर थी। मेरी जिंदगी काफी अच्छी है। बहुत सुकून है जिंदगी में और वही सबसे महत्वपूर्ण है।

सवाल ज्यादा या कम काम का नहीं है। आखिरकार ये मेरी जिंदगी है। मैं अपनी बहनों से कहती रहती हूं कि तुम्हें अपना घर हमेशा के लिए नहीं छोड़ना है। कम से कम बाहर निकलो, पढ़ो और देश के किसी और हिस्से में जाकर काम करो।
 
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