निषाद पार्टी के संस्थापक डॉक्टर संजय निषाद ने गोरखपुर उपचुनाव में अपने बेटे प्रवीण निषाद को सपा के टिकट पर चुनाव लड़ाया और अपनी पार्टी का सपा को समर्थन दिया, लेकिन दो-ढाई साल पहले सपा सरकार के साथ हुए संघर्ष के कारण ही वो पहली बार चर्चा में आए थे। जून 2015 में गोरखपुर के पास कसरावल गांव में निषादों को अनुसूचित जाति में शामिल किए जाने की मांग को लेकर उन्होंने समर्थकों के साथ रेलवे ट्रैक को जाम कर दिया था।
पुलिस ने जब उन्हें हटाने की कोशिश की तो हिंसक झड़प हुई। पुलिस ने फायरिंग की जिसमें एक युवक की मौत भी हो गई थी। उस समय राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और संजय निषाद सहित तीन दर्जन लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया। बावजूद इसके संजय निषाद की भारतीय जनता पार्टी से दूरी और उसके प्रति उनकी राजनीतिक नफरत, उन्हें सपा के करीब ले आई। लेकिन जानकारों का कहना है कि संजय निषाद, जमना प्रसाद निषाद के बेटे अमरेंद्र निषाद और राम भुआल निषाद जैसे नेताओं को एक साथ रखना सपा-बसपा के सामने आसान काम नहीं होगा, वो भी उस स्थिति में जबकि इन पार्टियों के अपने पुराने नेताओं को भी 'खुश रखने' की विवशता होगी।
अनुसूचित जाति में निषादों को शामिल करना
यही नहीं, गोरखपुर में उपचुनाव के बाद ही समाजवादी पार्टी के नेताओं और संजय निषाद के समर्थकों में दूरी साफ देखने को मिली। गोरखपुर में समाजवादी पार्टी दफ्तर में एक सपा नेता ने बताया, "जिताने में सारी मेहनत सपा वालों ने की लेकिन जब मुख्यमंत्री से मिलना हुआ तो प्रवीण निषाद और उनके पिता अपने लोगों को लेकर लखनऊ चले गए। बिना सपा वालों से पूछे उन्होंने कार्यक्रम तय कर लिया कि दिल्ली से लौटने के बाद गोरखनाथ मंदिर जाएंगे। वो लोग जाएंगे लेकिन हम तो गोरखनाथ मंदिर नहीं जाएंगे।"
यही नहीं, समाजवादी पार्टी में निषाद समुदाय के कुछेक बड़े नेता भी अचानक संजय निषाद और प्रवीण निषाद को मिले इस महत्व पर बेचैन हैं। हालांकि सपा नेता और पूर्व मंत्री जमना निषाद के बेटे अमरेंद्र निषाद ऐसी बातों को सिर्फ अफवाह बताते हैं, "सारे निषाद अब सपा-बसपा के साथ हैं। संजय निषाद कोई बाहरी व्यक्ति तो हैं नहीं। उन्होंने
अनुसूचित जाति में निषादों को शामिल करने का आंदोलन चलाया और पार्टी बनाई, जबकि मेरे पिता स्वर्गीय जमना प्रसाद निषाद भी लंबे समय तक इसकी मांग करते रहे और समाजवादी पार्टी की सरकार ने इस पर कार्रवाई भी शुरू कर दी थी।"
"ये उपचुनाव था, बात अलग थी"
लेकिन पत्रकार सुजीत पांडेय ऐसा नहीं मानते। उनके मुताबिक, "निषादों का अब तक कोई ऐसा बड़ा नेता इस इलाके में नहीं हुआ है जिसके पीछे सारे निषाद चलें। पहली बार ऐसा हुआ है जबकि इस जाति का एक ही उम्मीदवार चुनाव में खड़ा हुआ, अन्यथा अब तक कई उम्मीदवार खड़े होते थे। दूसरे, जो नेता हैं भी उनमें से कोई भी न तो सर्वमान्य है और न ही ऐसा है जो कि इतनी निष्ठा से इस गठबंधन के साथ खड़ा हो कि अब डिगेगा ही नहीं।"
सुजीत पांडेय ये भी कहते हैं कि न सिर्फ सपा और बसपा का एकजुट होना अभी उनके कार्यकर्ताओं को बेमेल लग रहा है बल्कि निषाद समुदाय के भी तमाम लोग इस गठबंधन में बहुत सहज महसूस नहीं कर रहे हैं। उनके मुताबिक, "ये उपचुनाव था, बात अलग थी। मुख्य चुनावों में, चाहे वो लोकसभा हो या विधानसभा, इतनी आसानी से सब मानने वाले और एक-दूसरे के साथ चलने वाले नहीं हैं। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी इतने महत्वपूर्ण समुदाय पर डोरे न डाले, ऐसा लगता नहीं है।"