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यूपी में भाजपा ने पैराशूट से नहीं उतारा मुख्यमंत्री

Sun, 19 Mar 2017 08:10 AM IST
शशिधर पाठक
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सांसद योगी आदित्यनाथ को उ.प्र. भाजपा विधायक दल का चेहरा और राज्य का मुख्यमंत्री चुनकर भाजपा ने साबित कर दिया कि पार्टी ने पैराशूट से सीएम नहीं उतारा। योगी आदित्यनाथ जहां पांच बार के सांसद हैं, वहीं उ.प्र. में बड़ा जनाधार रखते हैं। उ.प्र. विधानसभा चुनाव वह न केवल पार्टी के स्टार प्रचारक थे, बल्कि पूर्वांचल के राजनीतिक समीकरण में उनकी बड़ी भूमिका थी। 
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इसी के साथ पार्टी ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और सांसद केशव प्रसाद मौर्य और लखनऊ के मेयर दिनेश शर्मा उ.प्र. का उपमुख्यमंत्री बनाने का निर्णय लिया है। वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू के अनुसार दोनों उपमुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दो सहयोगी की मांग पर दिए गए हैं, लेकिन करीब से जानने वालों को पता है कि राज्य को नेतृत्व देने में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तथा संघ ने खूब पसीना बहाया है। 11 मार्च को चुनाव नतीजे आने के बाद भाजपा ने गोवा और मणिपुर में बिना समय गंवाए सरकार बनाने की पहल शुरू कर दी। जबकि उ.प्र. और उत्तराखंड में सीएम का चेहरा तय करने में शीर्ष नेतृत्व को काफी मशक्कत करनी पड़ी। 

हालांकि पार्टी के एक केन्द्रीय मंत्री के अनुसार उ.प्र. के मुख्यमंत्री को लेकर राष्ट्रीय मीडिया ने खूब काइट फ्लाइंग की, लेकिन अचानक योगी आदित्यनाथ का दिल्ली आना, पार्टी के राष्ट्रीय अद्यक्ष अमित शाह से मिलना आदि पर वह चुप्पी साथ जाते हैं। सूत्र बताते हैं कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा केशव प्रसाद मौर्य की भूमिका बताने और मौर्य की तबियत बिगडऩे के बाद से रायसीना हिल्स का तापमान कई बार चढ़ा-उतरा। झंडेवालान में केशवकुंज से लेकर नागपुर और दिल्ली की टेलीफोन घंटी काफी बजी। 
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राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह से लेकर उ.प्र. के कुछ शीर्ष नेताओं ने भी अपनी राय को आगे बढ़ाया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, ओम माथुर, सुनील बंसल और प्रधानमंत्री को इसके लिए काफी मंथन करना पड़ा। इस दौरान केन्द्रीय नेतृत्व के सामने कई चेहरे मुख्यमंत्री की रेस में आए। केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, केन्द्रीय दूर संचार राज्यमंत्री मनोज सिन्हा, योगी आदित्यनाथ आदि-आदि। अंतत: केन्द्रीय नेतृत्व ने संघ से मशविरा के बाद कट्टर हिन्दुत्व की छवि रखने वाले गोरखपुर के सांसद आदित्यनाथ को यह जिम्मेदारी सौंपने का मन बनाया। 

केशव प्रसाद को मिला ईनाम
उ.प्र. विधानसभा चुनाव में केशव प्रसाद मौर्य ने अपनी सांगठनिक क्षमता साबित की थी। हालांकि केशव के खिलाफ अपराधिक मामले भी दर्ज हुए हैं, लेकिन पार्टी के शीर्ष नेतृत्व उनकी क्षमता, मेहनत आदि को देखते उन्हें इसका ईनाम दिया है। वहीं योगी आदित्यनाथ को मिले दूसरे सहयोगी दिनेश शर्मा गुजरात राज्य के प्रभारी हैं। राजनीति की अच्छी समझ रखते हैं। मिलनसार हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के काफी निकट हैं। माना जा रहा है कि उन्हें इसका ईनाम मिला है।

325 विधायक में कोई काबिल नहीं
एक सवाल तैर रहा है। भाजपा को उ.प्र. में सहयोगी दलों के साथ 325 सीटे मिली हैं, लेकिन इनमें से विधायकों और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को कोई भी चेहरा मुख्यमंत्री के काबिल समझ में नहीं आया। हालांकि शीर्ष नेतृत्व से सुरेश खन्ना और सतीश महाना समेत तमाम विधायकों ने भेंट की थी। मुख्यमंत्री पद के लिए नाम भी उछला, लेकिन किसी कोभ शीर्ष या दो उप शीर्ष पदों की जिम्मेदारी नहीं मिल पाई।

राजनाथ थे अनिच्छुक
 केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह अपनी वरिष्ठता को ध्यान में रखकर अनिच्छुक थे। उ.प्र. के इस कद्दावर राजनीतिज्ञ ने 60 के दशक से राजनीतिक यात्रा की शुरुआत की थी। 1990 के दशक में उ.प्र. के शिक्षा मंत्री और बाद में मुख्यमंत्री भी बने थे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कृषि मंत्री रहे राजनाथ भाजपा अध्यक्ष के तौर पर तीन बार की पारी खेल चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी की कैबिनेट में दूसरा स्थान रखते हैं। ऐसे में सूत्र बताते हैं कि संघ की पहली पसंद होने के बाद भी दो उप मुख्यमंत्रियों के साथ उन्हें प्रदेश का प्रभार संभालना गंवारा नहीं था। उन्होंने केन्द्र सरकार में गृहमंत्री बने रहना ही ठीक समझा। 

हिन्दुत्व, जाति सब साधा
योगी आदित्यनाथ(पूर्व में अजय सिंह) पांच बार सांसद रह चुके हैं। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में पैदा हुए गोरक्षपीठाधीश्वर गोरखपुर के सांसद और नाथ संप्रदाय के महंत हैं। गोरखपुर, देवरिया समेत आस-पास क्षत्रिय समाज में भी अच्छा खासा दबदबा रखते हैं। साथ में कठोर हिन्दुत्व की छवि भी है। इतना ही नहीं उ.प्र. और खासकर पूर्वांचल में भाजपा, संघ और हिन्दुत्व की राजनीति को आगे बढ़ाने वाले प्रखर नेता हैं। इस तरह से राजनाथ नहीं तो योगी आदित्यनाथ।

केशव प्रसाद मौर्य पिछड़ी मौर्य जाति से हैं। गोरक्षा अभियान से जुड़े विश्व हिन्दु परिषद के कर्मठ सदस्य रहे हैं। स्व. अशोक सिंघल का वरदहस्त रहा है। अन्य पिछड़ी जातियों ने इस बार जमकर भाजपा के पक्ष में मतदान किया और केशव प्रसाद मौर्य के रूप में पार्टी ने संदेश देने की कोशिश की। 
दिनेश शर्मा ब्राह्मण चेहरा हैं। इस तरह से पार्टी के विधायक सुरेश खन्ना से प्रस्ताव रखवाकर भाजपा ने राज्य में सरकार के गठन का लक्ष्य हासिल कर लिया है। 

सावधानी से लिखी गई पटकथा
शीर्ष नेतृत्व ने मुख्यमंत्री के नाम पर विधायकों की मुहर लगवाने की पटकथा बेहद सावधानी से लिखी। केन्द्रीय दूर संचार मंत्री का नाम मुख्यमंत्री के तौर पर मीडिया में आगे बढऩे और कई तरह की मांग उभरने के बीच सूत्र बताते हैं कि रणनीति पर अमल तेज हो गया। इसबीच मनोज सिन्हा कुछ शीर्ष नेताओं से मिलकर शुक्रवार की शाम को वाराणसी चले गए। उनके घर की सुरक्षा भी बढ़ा दी गई। सुबह वह काशी के कोतवाल और बाबा विश्वनाथ का दर्शन भी किया। तबतक उ.प्र. के मुख्यमंत्री के तौर पर मनोज सिन्हा ही मीडिया में चल रहे थे। इस बीच शनिवार को योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद ने भाजपा अध्यक्ष से मुलाकात की और लखनऊ चले गए।

तीन तीर से कई निशाने
भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। योगी आदित्यनाथ के चयन से जहां पार्टी संघ के एजेंडे, हिन्दुत्व के संदेश को बनाए रखने में सफल हुई है, वहीं एक नेता विशेष के विकल्प को भी खड़ा कर दिया है। 

दो उप मुख्यमंत्रियों केशव प्रसाद और दिनेश शर्मा के चयन के जरिए पार्टी ने संदेश देने की कोशिश की है कि अनुशासित नेता का कभी नुकसान नहीं होता। शीर्ष नेतृत्व कभी उनकी मेहनत बेकार नहीं होने देता।

अनुभव की कमी, लेकिन इरादे नेक
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मंत्र है। अनुभव की भले कमी हो लेकिन इरादे नेक होने चाहिए। पार्टी के विधायकों ने इसी को ध्यान में रखकर योगी आदित्यनाथ को अपना नेता चुना है। योगी आदित्यनाथ और उनके दो सहयोगी उपमुख्यमंत्री के प्रशासनिक कामकाज का कोई खास अनुभव नहीं है। तीनों पदाधिकारी कभी मंत्री अथवा किसी संवैधानिक पद पर नहीं रहे हैं, लेकिन तीनों के कठिन परिश्रम, समझ, तालमेल बनाने की क्षमता तथा लक्ष्य को धयान में रखकर जूझने की मुहिम से इनकार नहीं किया जा सकता।
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