कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा राजनीति के जिद्दी खिलाड़ी हैं। विधानसभा में बहुमत साबित कर पाने की संभावना धूमिल होते देख उन्होंने आने वाले कल की राजनीतिक पारी खेल ली। उन्होंने सदन में बहुमत का सामना करने की बजाय शहीद होने की रणनीति अपनाई। अपना इस्तीफा देने से पहले उन्होंने कर्नाटक के किसानों का दर्द और जल संकट समेत कई मुद्दे उठाए। अपनी बात रखी और लोकसभा चुनाव 2019 के लिए पूरी पारी खेलकर सदन से बाहर चले गए।
येदियुरप्पा को सदन से बाहर जाने की भी इतनी जल्दी थी उन्होंने राष्ट्रगान में उपस्थित रहना जरूरी नहीं समझा। लेकिन जाने से पहले यह चेताना नहीं भूले कि वह कर्नाटक विधानसभा में बतौर मुख्यमंत्री पांच साल से पहले आ सकते हैं। समय से पहले विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। इतना ही नहीं आने वाले समय में गठित होने वाली राज्य सरकार कभी भी गिर सकती है। इस तरह से जल्द ही भाजपा की राज्य में सरकार बनने की उन्होंने पूरी गुंजाइश छोड़ रखी है।
क्यों भाजपा ने किया सरकार बनाने का दावा
राजनीति को लेकर जनता की स्मरण शक्ति बड़ी छोटी होती है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की टीम इसे बखूबी समझती है। कर्नाटक में लगातार सक्रिय प्रकाश जावड़ेकर जैसे रणनीतिकार और मुरलीधर राव जैसे तेज तर्रार नेता को भी पता था कि भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। 104 विधायकों के जीतकर आने के बाद सरकार बनाने का दावा करना इतना आसान नहीं होगा। वह भी तब जब निर्दलीय विधायकों की संख्या केवल दो है और वे भी भाजपा के साथ सही समीकरण नहीं रखते। उच्चतम न्यायालय द्वारा 19 तारीख को 4.00 बजे तक बहुमत साबित करने का समय निर्धारित करने के बाद यह रास्ता और भी कठिन था। अनंत कुमार जैसे रणनीतिकार समय की इस विडंबना को बखूबी समझ रहे थे और सबके संवाद का केन्द्र अमित शाह इसे लेकर लगातार सक्रिय रहे। बताते हैं 104 का संख्या बल आने के बाद भाजपा की पहली रणनीति हर हाल में राज्य में सत्ता पाने की थी। लेकिन दुरूह रास्ता देखकर हर पल समय के हिसाब से रणनीति बदलती चली गई।
कांग्रेस और अदालत
अमित शाह और येदियुरप्पा की रणनीति पर कांग्रेस के वकीलों की फौज ने पानी फेर दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक मनुसिंघवी की जोड़ी ने अदालत में एक के बाद एक याचिका दायर करने के लिए कड़ी मेहनत की। उधर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले गुलाम नबी आजाद ने मोर्चा संभाला। कांग्रेस के नेताओं ने जद (एस) के एचडी कुमार स्वामी को केन्द्र में रखकर आक्रामक रणनीति अपनाई। सिद्धारमैया का सहयोग और मल्लिकार्जन खड़गे, डी शिवकुमार के जरिए कांग्रेस ने अपने विधायकों को बांधे रखा। इसमें कांग्रेस के नेता राजीव गौड़ा के सुझाव भी कारगर रहे और अंत तक कांग्रेस तथा जद (एस) की एकजुटता मे भाजपा की रणनीति को नाकाम कर दिया।