जिंदगी में भी और साहित्य में भी जनतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले हिंदी के मशहूर साहित्यकार रमेश उपाध्याय नहीं रहे। दिल्ली के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली।
एक कथाकार, एक विचारक, एक संपादक और एक अध्यापक का यू्ं चले जाना साहित्य में मूल्यों पर भरोसा करने वालों के लिए आघात है। 1 मार्च 1942 को उत्तर प्रदेश में जन्मे रमेश का आरंभिक जीवन काफी संघर्षों में बीता था। प्रिंटिंग प्रेस में कंपोजिटर से लेकर पत्रकारिता करने तक उन्होंने जीवनयापन के लिए कई तरह के काम किए।
इसी दौरान उन्होंने एमए, पीएचडी की और दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ वोकेशनल स्टडीज में प्राध्यापक नियुक्त हुए जहां आगे तीन दशकों तक अध्यापन कार्य किया।
रमेश लघु पत्रिका आंदोलन से भी गहरे रूप से जुड़े थे। स्वयं उनके द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका 'कथन' कई दशकों तक हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका के रूप में लोकप्रिय रही। रमेश के अब तक 15 से अधिक कहानी, पांच उपन्यास, तीन नाटक, कई नुक्कड़ नाटक, आलोचना की कई पुस्तकें और अंग्रेजी व गुजराती में कई पुस्तकों के अनुवाद भी प्रकाशित हुए हैं।
लेखन के लिए उन्हें केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान और हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा भी पुरस्कृत किया गया था। वहीं, जनवादी लेखक संघ के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, संयुक्त महासचिव राजेश जोशी और संजीव कुमार ने उनकी मौत पर दुख जताया।