प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को मन की बात कार्यक्रम में कैशलैस सोसायटी की वकालत की। प्रधानमंत्री का कहना है कि पूरी दुनिया जब कैशलैश इकोनॉमी की ओर बढ़ तब हमें इसमें पीछे नहीं रहना चाहिए। उनकी दलील है कि इससे भ्रष्टाचार घटेगा और अर्थव्यवस्था में भी मजबूती आएगी। प्रधानमंत्री ने लोगों से अपील की है कि अपने मोबाइल फोन को ई-वॉलेट की तरह इस्तेमाल करना चाहिए जिससे वह अपनी जरूरत के तमाम लेनदेन कर सकें।
प्रधानमंत्री मोदी की यह दलील पहली नजर में बेशक बहुत लाभप्रद और आसान दिखाई देती हो, लेकिन सवा अरब की आबादी वाले देश में इसको लेकर तमाम चुनौतियां और खतरे भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खासकर ऐसे देश में जिसमें 80 फीसदी बाजार और उसकी अर्थव्यवस्था नकद लेनदेन पर टिकी हो। आइए डालते हैं उन्हीं चुनौतियों पर एक निगाह।
कितने लोगों को इसका लाभ मिल पाएगा
सबसे बड़ा सवाल ये है कि नकद लेनदेन को त्यागकर लोग अगर कैशलैस सोसायटी की ओर ट्रांसफर होते हैं तो कितने लोगों को इसका लाभ मिल पाएगा। भारत की आबादी सवा अरब का आंकड़ा पार कर चुकी है। ट्राई द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार में देश में 70 करोड़ के करीब लोगों के पास मोबाइल कनेक्शन है।
एक अनुमान के अनुसार देश में स्मार्टफोन रखने वालों की संख्या 20 करोड़ के आसपास है हालांकि यह मार्केट काफी तेजी से बढ़ रहा है लेकिन अभी भी मोबाइल इस्तेमाल करने वाले बहुत से लोगों के पास स्मार्ट नहीं हैं ऐसे में वो लोग कैसे कैशलैस सिस्टम में अपने आपको एडजस्ट कर पाएंगे और उनका क्या जिनके पास मोबाइल भी नहीं है? वो अपनी जरूरतों के लिए किस पर निर्भर रहें।
टेक्नोलॉजी की सीमाएं और उस पर सीमित निर्भरता
टेक्नोलॉजी की अपनी सीमाएं होती हैं यही कारण है कि उसकी निर्भरता भी सीमित है। ऐसे में देश की बड़ी आबादी तक उसका लाभ पहुंचाना भी मुश्किल काम है। कैशलैस सोसायटी के लिए जरूरी है कि बेहतर इंटरनेट व्यवस्था का होना जबकी हकीकत ये है कि जहां चीन जैसे पडोसी देश 5 जी तक पहुंच चुके हैं वहां भारत के बहुत सारे उपभोक्ताओं के लिए 4जी अभी भी हौव्वा है।
टेक्नोलॉजी में दुनियाभर का अगुवा होने का दम भरने वाला भारत इंटरनेट स्पीड़ के मामले में दुनिया में 114 वे नंबर पर है। कंटेंट डिलीवरी नेटवर्क अकामई टेक्नोलॉजीस द्वारा जारी की स्टेट ऑफ दि इंटरनेट रिपोर्ट के मुताबिक एशिया प्रशांत क्षेत्र में भारत की सबसे कम औसत कनेक्शन स्पीड 2.8 एमबीपीएस है, जबकि जापान जेसे देशों में यह 17.4 एमबीपीएस है।
यहां तक की भारत के पडोसी बांग्लादेश और फिलिपींस जैसे छोटे देशों में भी इंटरनेट की स्पीड भारत से बहुत बेहतर है। जबकि तस्वीर का दूसरा पहलू और चिंताजनक है। भारत में स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाली बड़ी आबादी अभी भी 2जी जैसी सस्ती सुविधा पर निर्भर है, ऐसे में अंदाजा लगाइए कि 2जी इस्तेमाल करने वाले मोबाइल उपभोक्ता के लिए डिजिटल ट्रांजेक्शन करना कितनी टेढ़ी खीर है।
अशिक्षित आबादी कैसे इसे चला पाएगी
भारत में साक्षरता दर 75.06 है, यानि एक चौथाई आबादी आज भी अनपढ़ है। देश में पुरुषों की साक्षरता दर 82.14 है जबकि महिलाओं में इसका प्रतिशत केवल 65.46 है। इसके अलावा पढ़े लिखी आबादी में भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो टेक्नोलॉजी को लेकर बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं रहते हैं।
ऐसे में कैशलैस सोसायटी की परिकल्पना कहां तक संभव है। एक सवाल ये भी है कि कम पढ़े लिखे लोगों को मोबाइल ट्रांजेक्शन या डिजिटल ट्रांजेक्शन के प्रति जागरूक और शिक्षित कौन करेगा? सरकार का दावा है कि देश में जनधन योजना के तहत 20 करोड़ खाते खुले हैं लेकिन सवाल ये है कि उन खाताधारकों में से कितने लोग खुद को ऑनलाइन सिस्टम में ढाल पाएंगे। वो भी तब जब इनमें से आधे लोग बैंक में अपना फार्म भरवाने के लिए भी दूसरे लोगों पर निर्भर हैं।
ताकतवर बैंकों और वित्तीय संस्थानों की मनमानी का डर
कैशलैस सिस्टम की एक बड़ी समस्या ये भी है कि इसमें हमेशा ताकतवर बैकों और वित्तीय संस्थानों की मनमानी का डर बना रहेगा। नोटबंदी के दौर में सरकार ने घोषणा की है फिलहाल डिजिटल ट्रांजेक्शन पर तमाम चार्जेज खत्म कर दिए गए हैं। लेकिन यह कब तक जारी रहेंगे ये कोई नहीं कह सकता?
बड़ा सवाल ये है कि क्या इससे बड़े बैकों और वित्तीय संस्थानों को मनमर्जी करने की छूट नहीं मिल जाएगी। यह सच किसी से छुपा नहीं है कि आनलाइन ट्रांजेक्शन के नाम पर बैंक तमाम टैक्स और भारी भरकम चार्जेज अपने ग्राहकों से वसूलते हैं। क्रेडिट कार्ड में तो समय से बिल न भरने के नाम पर लंबी चौड़ी पेनल्टी लगाई जाती रही हैं।
चेक बाउंस होने पर बैंक लगातार पेनल्टी बढ़ाए जा रहे हैं जबकि नकद देनदारी में यह खतरा न के बराबर ही होता है। ऐसे में इस बात की गारंटी कौन लेगा कि पूरा सिस्टम कैशलैश होने पर बैंकों और वित्तीय संस्थानों की मनमानी नहीं बढ़ जाएगी?
साबइर क्राइम और ऑनलाइन फ्रॉड
ज्यादा दिन नहीं हुए जब खबर आई थी कि एसबीआई ने अपने छह लाख से ज्यादा ग्राहकों के एटीएम कार्ड ब्लॉक किए हैं जबकि तीस लाख डेबिट कार्ड पर खतरा बताया गया था। वजह बताई गई थी एसबीआई के इन डेबिट कार्ड की सुरक्षा में सेंध का लगना। विदेश में तो यह समस्या आम है जहां पूरा सिस्टम ही कैशलैस पर टिका हुआ है।
इसके अलावा टेक्नोलॉजी के उपयोग के साथ ही देश में साइबर क्राइम भी काफी बढ़ा है। जिसका शिकार पढ़े लिखे लोग भी होते रहे हैं। अखबारों में शायद ही कोई दिन जाता हो जब ठगों द्वारा लोगों से ऑनलाइन फ्रॉड या उनसे बातचीत कर खाता नंबरों की जानकारी हासिल कर खाते से रकम उड़ाने की खबरें न दिखाई देती हों।
एनसीआरबी के आंकडों के अनुसार पिछले दस सालों में साइबर क्राइम में 14 गुणा बढोत्तरी हुई है जिसका शिकार पढ़े लिखे और अनपढ़ दोनों लोग हुए हैं। ऐसे में इस खतरे के बीच लोगों को अपना ऑनलाइन खाता बचाए रखना खासा चुनौतीपूर्ण होगा। राज्यसभा में पूर्व में एक सवाल के जवाब में सरकार ने जानकारी दी थी कि साल 2014-15 में एटीएम, क्रेडिट-डेबिट कार्ड और नेट बैंकिंग से संबंधित कुल 11,997 मामले दर्ज किए गए थे।
छोटे और मझोले उत्पादकों को नुकसान
कैशलैस सोसायटी का सबसे बड़ा नुकसान छोटे और मझोले उपभोक्ताओं को उठाना पड़ेगा जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था नकद आधारित लेनदेन पर टिकी है। एक अनुमान के मुताबिक सरकार द्वारा नोटबंदी के फैसले के दस दिन के अंदर ही दिल्ली एनसीआर के शहरों में पांच हजार से ज्यादा उद्योगों में फिलहाल अस्थायी तौर पर उत्पादन बंद करना पड़ा है।
इसके अलावा भारतीय बाजार की अवधारणा मूल रूप से नकदी पर ही टिकी हुई है जिसमें लोगों का मोलतोल करने का गुण और उधारी का चलन भी है। ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले ज्यातर घरेलू उत्पादन केवल नकदी व्यवस्था पर ही टिके हैं ऐसे में उनके सामने डिजिटाइलेशन अभी भी बड़ी चुनौती है।