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जानिए कौन मानते हैं जिहाद को जन्नत का रास्ता

Wed, 06 Jul 2016 03:25 PM IST
शिराज मेहर/ बीबीसी
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इस्लामिक स्टेट - फोटो : BBC
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रविवार को बगदाद में हुए चरमपंथी हमलों में पहले 165 लोगों की मौत की खबर आई जो अब बढ़कर 250 हो गई है। सुरक्षा सेवाओं के मुताबिक इस्लामिक स्टेट की ओर से रमजान में किए गए आठ अलग-अलग हमलों में से ये एक था। ऑरलैंडो, ढाका से लेकर इस्तांबुल तक ऐसे हमलों में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई है।
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इस बात की भी आशंका है कि सोमवार को सऊदी अरब के मदीना शहर में पैगंबर मोहम्मद की मस्जिद के बाहर हुए हमले में भी इस्लामिक स्टेट का ही हाथ है। इस्लामिक कैलेंडर में रमजान को सबसे मुबारक और आध्यात्मिक महीना माना जाता है। तीस दिन के लिए मुसलमान दिन के वक्त खाना नहीं खाते और पानी नहीं पीते।

उनका मानना है कि इस दौरान अल्लाह उन्हें हर भूल के लिए क्षमा कर देता है। मस्जिद में नमाजियों की भीड़ होती है, जो ऊपर वाले से क्षमा और दुआ मांगने आते हैं। उसके उलट कुछ कट्टरपंथी ऐसा भी मानते हैं कि 'इस महीने में जीत दर्ज करनी और लूट मचानी चाहिए।'
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वो मानते हैं कि ये सही मौका है

इस्लामिक स्टेट - फोटो : BBC
वो मानते हैं कि ये सही मौका है जब लड़ाई को दोगुना तेज कर देना चाहिए। इसलिए इस दौरान वो सामान्य से ज्यादा हमले करते हैं। सीरिया में अल कायदा के आधिकारिक संगठन नुस्रा फ्रंट ने रमजान को 'विजय अभियान का महीना' बताया है।

रमजान के नजदीक आते ही आईएस के प्रवक्ता अबु मोहम्मद अल-अदनानी ने दुनियाभर के अपने समर्थकों से कहा था, "तैयार हो जाओ। काफिरों के लिए इसे आपदा का महीना बनाने के लिए तैयार हो जाओ, विशेष रूप से यूरोप और अमरीका में खिलाफत के समर्थकों के लिए।"

शायद यही वो अपील थी जिसने उमर मतीन जैसे अकेले लड़ाकों को फ्लोरिडा के ऑरलैंडो में समलैंगिक पुरुषों के एक क्लब में 49 लोगों की हत्या के लिए प्रोत्साहित किया। उमर मतीन ने अबू बकर अल-बगदादी के प्रति अपनी निष्ठा दिखाते हुए इस वारदात को अंजाम दिया था। वैसे रमजान को युद्ध का महीना मानने की प्रथा इस्लामिक इतिहास से ही आती है।

वर्ष 624 में रमजान के महीने में ही लड़ी थी

इस्लामिक स्टेट - फोटो : BBC
पैगंबर मोहम्मद ने अपनी पहली जिहाद, जिसे बद्र की लड़ाई के नाम से जाना जाता है, वर्ष 624 में रमजान के महीने में ही लड़ी थी। इसके आठ साल बाद उन्होंने रमजान के ही महीने में मक्का पर जीत हासिल की थी।

पैगंबर मोहम्मद की कब्र वाले स्थल के बाहर सोमवार को हुए हमले ने पूरी इस्लामिक दुनिया को हिलाकर रख दिया। इस घटना से सवाल उठने लगे कि आखिर क्यों इस्लामिक स्टेट ने इस्लाम के पैगंबर की कब्र वाली जगह के बाहर धमाका कराया? पैगंबर की कब्र उसी मस्जिद परिसर में मौजूद है, इसलिए मुसलमान इस जगह को पाक स्थल मानते हैं।

लेकिन आईएस जिस कट्टरवादी इस्लाम में यकीन रखता है, उसमें उन्हें लगता है कि इस दरगाह के होने की वजह से लोगों का ध्यान अल्लाह से परे हट रहा है, इसलिए इसे ढहा देना चाहिए।

"मॉर्डन जिहाद के गॉडफादर" माने जने वाले अब्दुल्ला अजाम ने 1980 के दशक में अफगानिस्तान में अरब विदेशी लड़ाकों का नेतृत्व किया था। वो तर्क देते हैं, "जिहाद की उपेक्षा करना उपवास और नमाज छोड़ने के बराबर है।"
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"जिहाद, इबादत करने का सबसे बेहतरीन तरीका है

इस्लामिक स्टेट - फोटो : BBC
बाद में उन्होंने लिखा, "जिहाद, इबादत करने का सबसे बेहतरीन तरीका है। इस रास्ते मुसलमान को जन्नत हासिल हो सकती है।" जिहाद और रमजान से उसके संबंध की इन व्याख्याओं को लेकर आम मुसलमान बेहद निराश हैं।

उनके लिए ये महीना है संयम और खुद के अंदर झांकने का, लेकिन आधुनिक इस्लाम में संकट कुछ ऐसा है कि चरमपंथियों की व्याख्या प्रामाणिक समझ से परे है।

कट्टरपंथी तो ये भी मानते हैं कि रमजान के महीने में अगर ज़्यादा नमाज पढ़ने और दान देने को प्रोत्साहन दिया जाता है तो ज्यादा रक्तपात को क्यों नहीं? यदि इसको इस तरीके से देखेगे तो समझ में आएगा कि आखिर क्यों इस साल रमजान के मुबारक महीने में इतनी भयानक घटनाएँ हुई हैं।
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