वर्ष 2015 से 2019 के बीच भारत की 3.51 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि बर्बाद हुई है। यह देश की कुल भूमि का 9.45 फीसदी भाग है। 2015 में यह 4.42 फीसदी था। यह जानकारी संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन (यूएनसीसीडी) की एक रिपोर्ट में सामने आई है।
भूमि निम्नीकरण मानव प्रेरित या प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो किसी पारितंत्र में भूमि को प्रभावशाली ढंग से कार्य करने की क्षमता को घटा देती है। यानी भूमि की जैविक अथवा आर्थिक उत्पादकता में कमी आ जाती है। फसलों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन घट जाता है। यूएनसीसीडी के अनुसार, 251.71 मिलियन भारतीय भूमि क्षरण की इस प्रक्रिया से प्रभावित हुए। यह भारत की कुल आबादी का 18.39 फीसदी है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि भारत की कुल बंजर भूमि 4 करोड़ 30 लाख फुटबॉल मैदानों के आकार के बराबर है।
तेजी से बढ़ता औद्योगीकरण और शहरीकरण
तेजी से हो रहे शहरीकरण के साथ-साथ देश के आर्थिक और उद्योगों के विकास के लिए खेती योग्य और हरे भरे मैदानों का उपयोग किया जा रहा है। इसके लिए वनों की अत्यधिक कटाई भी होती है और भूमि का उपयोग इस प्रकार होता है कि भूमि अपनी प्राकृतिक उन्नयन गुणवत्ता खो देती है।
खनन, अति पशुचारण सहित कई कारण
खनन भूमि निम्नीकरण का सबसे महत्वपूर्ण कारक है। खनन के उपरांत खदानों वाले स्थानों को गहरी खाइयों और मलबे के साथ खुला छोड़ दिया जाता है। खनन के कारण झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में वनोन्मूलन भूमि निम्नीकरण का कारण बना है। वहीं, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में अति पशुचारण भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण है।
मवेशियों के घास और अन्य हरे पौधों को अत्यधिक खाने से अवांछित पौधों की प्रजातियों की अत्यधिक वृद्धि हो जाती है, जिससे मिट्टी का कटाव होता है। इसके अलावा लकड़ी, ईंधन और वन उत्पादों की बढ़ती मांग के कारण वनों की कटाई तेजी से हो रही है, जिसके परिणामस्वरूप भूमि संसाधनों का क्षरण हो रहा है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में अधिक सिंचाई भूमि निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है।
दुनिया ने 10 करोड़ हेक्टेयर स्वस्थ भूमि खोई
यूएनसीसीडी की रिपोर्ट के अनुसार, 2015 से 2019 तक दुनिया ने हर साल कम से कम 10 करोड़ हेक्टेयर स्वस्थ और उत्पादक भूमि खो दी।
ठोस कार्रवाई आवश्यक
रिपोर्ट में प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए ठोस कार्रवाई को आवश्यक बताया गया है। भूमि क्षरण न केवल हमारे पर्यावरण को प्रभावित करता है, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका और कल्याण को भी प्रभावित करता है।