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चिंताजनक: ट्रांसजेंडर और दिव्यांग को MBBS में अब भी बताया जा रहा असामान्य, किताबों में किया जा रहा नजरअंदाज

Wed, 24 Dec 2025 04:18 AM IST
निर्मल कांत परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली।

सार

एक नई रिसर्च में सामने आया है कि एमबीबीएस की किताबें जेंडर, ट्रांसजेंडर और दिव्यांग पहचान को या तो नजरअंदाज करती हैं या असामान्य और अपवाद के रूप में पेश करती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसी पढ़ाई डॉक्टरों की सोच को प्रभावित करती है, जिससे इलाज में सम्मान, स्वायत्तता और मरीज की सामाजिक जरूरतों की अनदेखी होती है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारत में डॉक्टर बनने की पहली सीढ़ी एमबीबीएस की किताबें खुद भेदभाव सिखा रही हैं। एक नई रिसर्च में सामने आया है कि देश और दुनिया में पढ़ाई जाने वाली मेडिकल टेक्स्टबुक्स जेंडर, ट्रांसजेंडर और दिव्यांग पहचान को या तो पूरी तरह नजरअंदाज करती हैं या फिर उन्हें असामान्यता, विकार और अपवाद के रूप में पेश करती हैं।
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विशेषज्ञों का कहना है कि इसका सीधा असर डॉक्टरों की सोच और आगे चलकर मरीजों के इलाज पर पड़ता है। इस रिसर्च का केंद्रीय तर्क है कि मेडिकल किताबें सिर्फ जानकारी नहीं देतीं, वे डॉक्टर की नजर गढ़ती हैं। अगर, किसी मेडिकल छात्र को पढ़ाया जाता है कि जेंडर सिर्फ पुरुष और महिला, इंटरसेक्स या ट्रांस बॉडी अपवाद और दिव्यांगता कमी या विकार है तो वही नजर आगे चलकर ओपीडी और वार्ड में मरीज को देखती है। विशेषज्ञों का कहना है कि डॉक्टर वही नॉर्मल मानता है, जो किताब सिखाती है और जो किताब में नहीं है, वह मरीज भी अदृश्य हो जाता है।

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इलाज में सम्मान, स्वायत्तता, सामाजिक जरूरतों की अनदेखी
जर्नल ऑफ फैमिली मेडिसिन एंड प्राइमरी केयर में प्रकाशित दिल्ली हेल्थ यूनिवर्सिटी की इस रिसर्च में वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. सतेंद्र सिंह ने कहा है कि मेडिकल शिक्षा में दिव्यांगता को अब भी मेडिकल मॉडल के तहत पढ़ाया जा रहा यानी कमी, दोष या सुधार की जरूरत के रूप में। उन्होंने कहा, यह नजरिया दिव्यांग मरीजों को अधिकार संपन्न व्यक्ति के बजाय बीमार शरीर के तौर पर देखने की मानसिकता को बढ़ावा देता है। इसका नतीजा है कि इलाज में सम्मान, स्वायत्तता और सामाजिक जरूरतों की अनदेखी हो जाती है। इनका मानना है कि जब तक मेडिकल शिक्षा की बुनियाद नहीं बदलेगी, तब तक समावेशी और समान स्वास्थ्य सेवा का लक्ष्य हासिल करना मुश्किल रहेगा।

गलत शिक्षा, गलत इलाज...
प्रो. सिंह का कहना है कि यह स्थिति राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के उन दावों से मेल नहीं खाती, जिनमें मेडिकल शिक्षा को अधिक संवेदनशील, नैतिक और समावेशी बनाने की बात कही गई है। सवाल यह उठता है कि जब पाठ्यक्रम और मूल्यांकन में बदलाव किए जा रहे हैं तो एमबीबीएस की किताबों की सामाजिक और नैतिक समीक्षा क्यों नहीं हो रही?

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और गहरा होगा स्वास्थ्य अंतर...
रिसर्च के मुताबिक, मेडिकल पढ़ाई में मौजूद यह पक्षपात आगे चलकर ट्रांसजेंडर और दिव्यांग मरीजों के लिए गलत या देर से निदान, मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी और अपमानजनक भाषा जैसी समस्याओं को जन्म देता है। भारत जैसे देश में, जहां पहले से स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में असमानता है, यह भेदभाव स्वास्थ्य अंतर को और गहरा करता है।

पहली बार इक्विटी ऑडिट टूल का प्रस्ताव अध्ययन में समाधान के तौर पर मेडिकल टेक्स्टबुक्स के लिए एक इक्विटी ऑडिट फ्रेमवर्क का सुझाव भी दिया गया है, जिसके जरिये किताबों की भाषा, चित्र, उदाहरण और केस स्टडी को समावेशन के नजरिये से परखा जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल काउंसिल, विश्वविद्यालय और प्रकाशक इस दिशा में कदम उठाएं तो डॉक्टरों की ट्रेनिंग ज्यादा न्यायसंगत और मरीज केंद्रित हो सकती है। 

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