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चिंताजनक: दुनियाभर के युवाओं में भारी आक्रोश, एक साल में 70 देशों में 128 आंदोलन; नवंबर में 35 उग्र प्रदर्शन

Tue, 23 Dec 2025 04:35 AM IST
निर्मल कांत अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।

सार

वर्ष 2025 के अंत तक दुनियाभर में युवाओं के नेतृत्व में सरकार-विरोधी आंदोलनों में तेजी से वृद्धि देखी गई, जो मौजूदा राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्थाओं से गहरी असंतुष्टि का संकेत है। ये आंदोलन बिना औपचारिक नेतृत्व के हुए, जिनमें महंगाई, बेरोजगारी, असमानता और सत्ता परिवर्तन जैसे अलग-अलग मुद्दे उठे।
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नेपाल में प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन को भी नहीं बख्शा - फोटो : पीटीआई (फाइल)
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विस्तार
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जाते-जाते वर्ष 2025 दुनियाभर में युवाओं के जबरदस्त आक्रोश का साक्षी बना। एशिया से अफ्रीका, यूरोप से लेकर अमेरिका तक, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सरकार- विरोधी प्रदर्शनों की बढ़ती संख्या एक साझा वैश्विक संकेत दे रही है। जेन जी यानी युवा पीढ़ी मौजूदा राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं से गहराई से असंतुष्ट है। इन आंदोलनों की सबसे अहम विशेषता यह है कि इनमें भाग लेने वालों में बहुसंख्यक युवा हैं, लेकिन उनके मुद्दे एक जैसे नहीं हैं। कहीं महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ आक्रोश है, तो कहीं सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक जवाबदेही की सीधी मांग।
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कार्नेगी के ग्लोबल प्रोटेस्ट ट्रैकर के आंकड़ों के अनुसार 1 नवंबर 2025 को ही दुनिया भर में 35 सरकार-विरोधी प्रदर्शन दर्ज किए गए। इससे पहले के 12 महीनों में 70 देशों में कुल 128 ऐसे आंदोलन हुए। यह आंकड़ा बताता है कि विरोध अब किसी एक क्षेत्र या राजनीतिक संस्कृति तक सीमित नहीं रहा। इन आंदोलनों की संरचना पारंपरिक राजनीतिक आंदोलनों से अलग है। अधिकांश प्रदर्शनों में न तो कोई औपचारिक नेतृत्व है और न ही कोई स्थापित राजनीतिक दल। ये आंदोलन मुद्दा-आधारित रहे हैं, सोशल मीडिया के जरिए संगठित होते हैं तेजी से फैलते हैं और उतनी ही तेजी से नए रूप लेते हैं। बांग्लादेश,नेपाल में अगस्त 2025 के छात्र आंदोलन हों या केन्या में जेन-जी युवाओं के दबाव में वापस लिए गए कर प्रस्ताव हर जगह युवाओं ने सीधे सत्ता को चुनौती दी।
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इतिहास की सबसे बड़ी युवा आबादी
रिपोर्ट के अनुसार यह वैश्विक बेचैनी ऐसे समय में उभर रही है, जब दुनिया में युवाओं की संख्या ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक है। अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय विकास एजेंसी (यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल एड) के अनुसार दुनिया में 10 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 2.4 अरब लोग हैं।यानी अब तक की सबसे बड़ी युवा पीढ़ी। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि 1990 के दशक के बाद विरोध-प्रदर्शनों में भाग लेने की इच्छा अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी है और इस बदलाव में युवाओं की भूमिका निर्णायक रही है।
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एजेंडा बदला, गुस्सा गहराया
पिछले दो दशकों में युवाओं के आंदोलनों का एजेंडा लगातार बदला है। 2000 के शुरुआती वर्षों में जहां वैश्वीकरण और उदारीकरण के खिलाफ विरोध दिखा, वहीं बाद के वर्षों में यह दायरा फैलता गया। जलवायु न्याय, खाद्य और ऊर्जा महंगाई, बढ़ती असमानता और अब सीधे सत्ता परिवर्तन की मांग। एक अध्ययन के अनुसार बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों में 1990 के बाद सत्ता-केंद्रित युवा आंदोलनों में स्पष्ट वृद्धि हुई है। दिलचस्प यह है कि ऐसे आंदोलन गरीब, विकासशील और विकसित तीनों तरह के देशों में सामने आए हैं। हालांकि बांग्लादेश का मौजूदा आंदोलन अब गलत हाथों में पहुंचकर कट्टरता की ओर बढ़ चला है। युवाओं का यह पहला आंदोलन है जिसने एकदम से यू टर्न ले लिया।





 
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