वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह समस्या मुख्य रूप से जनसंख्या वृद्धि और शहरी विस्तार के कारण चारागाहों को कृषि भूमि में परिवर्तित करने व भूमि उपयोग में अन्य परिवर्तनों, तेजी से बढ़ती खाद्य, फाइबर और ईंधन की मांग, अत्यधिक चराई और अतिदोहन को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों के कारण उत्पन्न हुई है।
धरती पर बढ़ते औसत तापमान, वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की भारी मात्रा और कई अन्य कारणों से दुनियाभर में लगभग 40 फीसदी फसल भूमि और चरागाह खतरे में हैं।
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वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह समस्या मुख्य रूप से जनसंख्या वृद्धि और शहरी विस्तार के कारण चारागाहों को कृषि भूमि में परिवर्तित करने व भूमि उपयोग में अन्य परिवर्तनों, तेजी से बढ़ती खाद्य, फाइबर और ईंधन की मांग, अत्यधिक चराई और अतिदोहन को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों के कारण उत्पन्न हुई है। वहीं, एक अनुमान के अनुसार 2050 तक दुनियाभर में भोजन की मांग 110 फीसदी तक बढ़ जाएगी। अपने निष्कर्ष की पुष्टि के लिए शोधकर्ताओं की टीम ने भारी मात्रा में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध आंकड़ों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का उपयोग किया। यह अध्ययन आईईईई एक्सेस में प्रकाशित हुआ है।
अरबों लोगों के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा
शोधकर्ताओं के अनुसार, चरागाह भूमि कुल भूमि का 54 फीसदी है। लगभग 50 फीसदी भूमि क्षरित हो चुकी है। इससे मानवता की 1/6 खाद्य आपूर्ति और पृथ्वी के 1/3 कार्बन भंडार को खतरा है। अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि अति प्रयोग, दुरुपयोग, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता की हानि के कारण पृथ्वी के विशाल प्राकृतिक चरागाहों और अन्य चरागाहों का क्षरण मानवता की खाद्य आपूर्ति और अरबों लोगों के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा है।