कोरोना काल के पहले साल के दौरान एक अच्छी और राहत भरी बात यह देखने को मिली कि हम चाहें तो अपनी प्रकृति को बिना नुकसान पहुंचाए बचाकर रख सकते हैं लेकिन संसाधनों के लालच में प्रकृति को अनजाने ही सही बहुत नुकसान पहुंचता है। यही वजह से दुनिया में ग्लोबल वॉर्मिंग तेजी से बढ़ रही है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरुकता पैदा करने और धरती को बचाने के संकल्प के साथ हर साल 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र में पृथ्वी दिवस को हर साल मार्च एक्विनोक्स यानी कि साल का वह समय, जब दिन-रात बराबर होते हैं, पर मनाया जाता है। इस परंपरा की स्थापना शांति कार्यकर्ता जॉन मक्कानेल द्वारा की गई थी। वैश्विक स्तर पर लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरुक बनाने के लिए 22 अप्रैल 1970 को पहली बार पृथ्वी दिवस बड़े स्तर पर मनाया गया था।
बता दें कि उसी दिन से हर साल 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाने का फैसला लिया गया। इससे पहले पृथ्वी दिवस साल में दो बार मनाया जाता था। पहले 21 मार्च और फिर 22 अप्रैल को इस दिन का आयोजन किया जाता था। लेकिन साल 1970 के बाद से इसे सिर्फ 22 अप्रैल को मनाने का ही निर्णय लिया गया।
21 मार्च को पृथ्वी दिवस उत्तरी गोलार्द्ध के वसंत और दक्षिणी गोलार्द्ध के पतझड़ के प्रतीक के तौर पर मनाया जाता था। 21 मार्च को मनाए जाने वाले पृथ्वी दिवस को संयुक्त राष्ट्र का समर्थन मिला हुआ है लेकिन इसे केवल वैज्ञानिक और पर्यावरणीय महत्व ही मिला हुआ है, जबकि 22 अप्रैल को मनाए जाने वाले पृथ्वी दिवस का पूरी दुनिया का राजनैतिक और सामाजिक महत्व है।
इस बार कोरोना काल के दौरान पृथ्वी दिवस का थीम पृथ्वी को फिर से अच्छी अवस्था में बहाल करना है। इसके लिए उन प्राकृतिक स्रोतों और उभरती हुई तकनीकों पर ध्यान देना होगा जो दुनिया के पारिस्थिति तंत्र को फिर से कायम करने में मददगार साबित होंगे।