आजीवन असहनीय दर्द, पैरों में कंपन, कूल्हे में सूजन
यहां अलर्ट हो जाएं...
बीच में छोड़ देते हैं इलाज
नई दिल्ली स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के निदेशक डॉ. अजय कुमार शुक्ला बताते हैं... उनके पास ऐसे कई मरीज आते हैं, जिनकी इतिहास देखने के बाद पता चलता है कि वह रुमेटोलॉजी का रोगी है और उसने अपना इलाज बीच में ही छोड़ दिया। कुछ साल बाद फिर से दर्द होने लगता है तो वह
अस्पताल आते हैं।
विश्व ऑटोइम्यून ऑर्थराइटिस दिवस (सांकेतिक तस्वीर)।
आर्थराइटिस यानी गठिया किसी एक बीमारी का नाम नहीं है। यह शब्द 200 से भी ज्यादा बीमारियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आमतौर पर यह परेशानी 60 साल या उसके बाद लोगों में होती है, लेकिन यह बीमारियां 20 से 30 साल की आयु वाले युवाओं को भी बुजुर्ग जैसा बना देती हैं। एक समय बाद दर्द निवारक गोलियां भी असर बंद करने लगती हैं। - डॉ. उमा कुमार, रुमेटोलॉजी विभागाध्यक्ष, एम्स, नई दिल्ली
सालों तक भ्रम में रहते हैं मरीज
इन ऑटोइम्यून बीमारियों का सबसे बड़ा नुकसान समय पर रोग की पहचान नहीं होना है। एक मरीज सालों तक इसी भ्रम में रहता है कि उसे दर्द सर्वाइकल या फिर मांसपेशियों में खिंचाव की वजह से हो रहा है। वह दर्द निवारक गोलियों का सेवन करता है। व्यायाम करता है। जब इनमें से किसी से आराम नहीं मिलता, तब इलाज कराने डॉक्टर के पास पहुंचता है। तब तक यह बीमारियां उसके शरीर खासतौर पर जोड़ों को काफी नुकसान पहुंचा चुकी होती हैं।
दिनचर्या सुधारने की जरूरत
जो लोग इन बीमारियों से पीड़ित हैं, उन्हें दवाओं के साथ-साथ अपनी दिनचर्या को भी सुधारने की जरूरत है।''