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15 ऐसी महिलाएं जिन्होंने अपने कार्यों से बनाया खास मुकाम

Tue, 08 Mar 2016 04:41 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली

सार

  • ये सभी महिलाएं पेज थ्री की दुनिया से दूर रहकर और सामाजिक सरोकारों के साथ खुद को इस योग्य बनाया जिससे दूसरों के लिए मिसाल बन सकें।
  • ये सभी महिलाएं समाज में अलग-अलग कार्यों में सक्रिय हैं। 
  • अमर उजाला रूपायन अचीवर्स अवार्ड से इन्हें सम्मानित किया गया।
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विस्तार
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महिला दिवस के खास मौके पर हम आपके सामने लाए हैं 15 ऐसी महिलाएं जो शायद इतनी चर्चित नहीं हुई लेकिन उन्होंने अपने कार्यों से समाज में खास मुकाम हासिल किया है।
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ये सभी महिलाएं पेज थ्री की दुनिया से दूर रहकर और सामाजिक सरोकारों के साथ खुद को इस योग्य बनाया जिससे दूसरों के लिए मिसाल बन सकें।

इन्होंने कठिन और प्रतिकूल स्थितियों में न सिर्फ अपने जीवन को संवारा बल्कि समाज के लिए प्रेरणा का विषय बनीं। ये सभी महिलाएं समाज में अलग-अलग कार्यों में सक्रिय हैं।

अपने क्षेत्र में किए इनके कार्यों की बदौलत ही अमर उजाला रूपायन अचीवर्स अवार्ड- 2015 से इन्हें सम्मानित किया गया। बॉक्सर मैरीकॉम ने उन महिलाओं को सम्मानित किया। आइये जानते हैं इनके बारे में...।
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अंजनी मल्लाह, बस्ती

बचपन से दौड़ती रहीं, अब एक विचार बनकर दौड़ रही हैं। राष्ट्रीय स्तर की धाविका अंजनी मल्लाह के प्रयास से उनके गांव को पचास शौचालय मिले हैं। पूरे इलाके की सोच को बदल देने का सफर जारी है।

काम आसान नहीं था। ऐसे काम आसान भी नहीं होते। लेकिन, राष्ट्रीय स्तर की धाविका रह चुकी अंजनी मल्लाह भी कहां थकने वाली थीं। हाथ-पांव जोड़े, खुशामद की, बीमारी का डर दिखाया, कहीं खुद भी डराया फिर भी गांव में शौचालय बनवाने को जल्दी राजी नहीं होते थे लोग। शाम को राजी हुए, तो अगली सुबह मुकर गए। पैसों का रोना अलग। वैसे भी गांवों में बहाने की कमी होती है क्या? लेकिन अंजनी मल्लाह ने भी तो जिद ठान ली थी कि अपने गांव रानीपुर  को शौचालय के मामले में आदर्श बनाकर रहूंगी। अंजनी का प्रयास ही रहा कि बस्ती जिले के रुधौली विकास क्षेत्र का गांव रानीपुर धीरे-धीरे बदलने लगा, क्योंकि अंजनी की बातों में दम था।
 
अंजनी का सपना सीआरपीएफ में प्रवेश पाना था। उसने दौड़ना शुरु किया। लेकिन लंबाई कम होने के कारण वह चूक गई। इसके बावजूद वह रुकी नहीं। थकी नहीं। दौड़ती रही। वर्ष 2011 में बस्ती के हरैया में मिनी मैराथन का आयोजन हुआ, इसमें 300 लड़कों में अकेली दौड़ने वाली लड़की अंजनी थीं। दौड़ी भी और जीती भी। 2014 में पुणे इंटरनेशल गेम्स में भी उन्होंने अपनी काबिलियत को दिखाया। इलाहाबाद में आयोजित नेशनल मैराथन में 42 किलोमीटर की दौड़ में 13वां स्थान पाने वाली अंजनी ने रफ्तार को ही अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया था। लेकिन सुबह अभ्यास के लिए निकलती, तो खुले में शौच करते लोगों को देखकर परेशानी होती। साथ ही महिलाओं को खुले में शौच जाते देख दुख भी होता।  अंजनी ने तभी ठान लिया कि वह गांव में लोगों के लिए शौचालय बनवाकर रहेगी।

इस मुहिम का झंडा हाथ में लेकर अंजनी ने अपने साथ अन्य महिलाओं को भी जोड़ा। ब्लॉक स्तर पर धरना प्रदर्शन से बात नहीं बनी, तो तहसील पर अपनी मांग रखी। यहां से भी बात न बनी, तो डीएम कार्यालय पर बैठ गईं। आखिर प्रयास सफल हुआ।  उनके गांव में शौचालय बनने लगे। आज उनके गांव में पचास से ज्यादा शौचालय बन चुके हैं और कुछ पर काम चल रहा है। अंजनी के इस कदम से गांव की महिलाओ को अब खुले में शौच के लिए नहीं जाना पड़ता। अपने इस अभियान को अंजनी ने अपनी ससुराल संत कबीरनगर के मेडरापार गांव में भी चला रखा है। यहां डीएम से लेकर विधायक और सांसद तक का घेराव वह कर चुकी हैं। उन्हें मेडरापार में 26 शौचालय, एक आंगनबाडी, एक स्कूल बनाने का आश्वासन मिल चुका है।  अंजनी इन गांवों को शौचालय दिलाने के बाद शराबबंदी और शिक्षा के लिए स्कूल खुलवाने के अभियान की शुरुआत करना चाहती हैं। अंजनी कहती हैं,`ये लड़ाई हम नहीं लड़ेंगे, तो कौन लड़ेगा। समाज को बदलना है, तो शुरुआत तो करनी ही पड़ेगी।’   

बहराइच की डॉक्टर बलमीत कौर

ये हैं बहराइच की डॉक्टर बलमीत कौर। इन्होंने शारीरिक और मानसिक रूप से अशक्त बच्चों के प्रति संवेदना तो सब रखते हैं, लेकिन डॉ. बलमीत कौर संवेदना से आगे जाकर मूक-बधिर बच्चों के लिए बड़ी बहन की भूमिका में आ जाती हैं। अब बड़ी बहन बन गईं, तो उन्हें पढ़ाने-लिखाने और नए सिरे से जिंदगी को बसाने का प्रयास तो करना ही पड़ेगा।

संसार का हर काम पुरस्कार के लिए तो नहीं होता। 22 साल पहले बलमीत के मन में यह ख्याल तब आया था, जब आसपास के लोग जिंदगी का एक ही मकसद बताते थे, ढेर सारे रुपये, बड़ा-सा ओहदा और राज सम्मान...पुरस्कार और न जाने क्या-क्या? बलमीत भी चाहतीं, तो ये सब पा सकती थीं। अच्छी खासी डिग्री थी। हाथ में रिजल्ट था।

बहराइच की इस पीएचडी-होल्डर को बड़ी-सी नौकरी मिल सकती थी, लेकिन बलमीत ने ऐसे बच्चों के लिए काम करना पसंद किया, जो शारीरिक रूप से अक्षम थे। हालांकि, यह ख्याल उनको अपने छोटे भाई गुरविंदर की विकलांगता को देखकर आया। उन्होंने महसूस किया कि अगर इन बच्चों की तरफ कोई ध्यान दे, तो ये भी समाज के विकास में योगदान दे सकते हैं। इसी सोच के साथ बलमीत ने शुरू किया अपना सफर।

अपने 22 साल के सफर में आर्थिक और अन्य तरह की परेशानियों ने बलमीत के हौसलों को ध्वस्त करना चाहा, लेकिन बलमीत ने हार नहीं मानी। अपने पिता के बसाए `बाबा सुंदर शिक्षा समिति’ के जरिये बलमीत अब तक सैकड़ों मूक-बधिर, मानसिक और शारीरिक रूप से निशक्त बच्चों को शिक्षित कर चुकी हैं और उनको आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। मूक-बधिर बच्चों के लिए एक स्कूल भी खोला है। यही नहीं, वह बच्चों के रहने, खाने, पढ़ने की व्यवस्था भी खुद करती हैं। गरीब और असहाय बच्चों का खर्चा बलमीत खुद उठाती हैं। आय का कोई साधन न होने के बावजूद भी वह पूरी हिम्मत के साथ अशक्त बच्चों के साथ खड़ी हैं। दूसरों के भले के लिए, अपने शरीर के दान की घोषणा कर चुकीं बलमीत की जिंदगी का एक ही मकसद है,`जो मेरे पास आए, कुछ बनकर जाए, कुछ सीखकर जाए।’

फातिमा शाहिद, मेरठ

मेरठ के एक किसान परिवार की फातिमा ने शिक्षा के जो बीज बोए हैं, उनसे दूसरों के हिस्से में रोशनी आई है और फातिमा की मुट्ठी में ढेर सारी खुशबू। उम्र कम थी। क्लास भी छोटी, लेकिन खुद से कही गई वह बात बहुत बड़ी थी। इतनी बड़ी कि न सिर्फ मेरठ के किसान परिवार से जुड़ी फातिमा शाहिद की जिंदगी बदल गई, बल्कि और भी कई घर बदले, जिंदगियां बदलीं। स्कूल के वक्त अपनी हमउम्र सहेलियों को यूं ही इधर-उधर भटकते देख फातिमा को समझ में नहीं आता था कि उनको स्कूल न जाने के लिए बहानों की जरूरत क्यों नहीं पड़ती। मम्मी-पापा उन्हें डांटते क्यों नहीं? कुछ ही दिनों में सारा माजरा समझ में आ गया। तब एक दिन स्कूल जाते वक्त फातिमा ने खुद से कहा था-`जब मैं बड़ी हो जाऊंगी, तो इन लोगों को बताऊंगी कि स्कूल जाना क्योंत जरूरी है।’

कई बरस बीत गए, फिर भी खुद से किया हुआ अपना वादा फातिमा को याद है। मेरठ के छोटे से गांव जानीकलां की रहने वाली फातिमा शाहिद खुद तो पढ़ ही रही हैं, साथ ही बच्चों को भी शिक्षित  कर रही हैं।  बच्चों  को स्कूल न भेजने वाले अभिभावकों को शिक्षा का महत्व भी समझा रही हैं। अपनी कोशिश से फातिमा 2006 से अब तक वह 50 बच्चों को स्कूल में दाखिल करवा चुकी हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को फातिमा अपने परिवार की मदद से पाठ्य सामग्री उपलब्ध करा रही हैं।

यही नहीं, बीए में पढ़ने वाली फातिमा अपने घर पर भी बच्चों को पढ़ाती हैं। इसके लिए वे बच्चों से कुछ फीस नहीं लेती हैं। यहां तक कि इन बच्चों लिए पाठ्य-सामग्री की व्यवस्था भी फातिमा खुद के खर्चे पर ही करती हैं। `बचपन बचाओ’ आंदोलन की मुहिम शुरू करने वाले कैलाश सत्यार्थी भी फातिमा से मिलकर उनके काम की प्रशंसा कर चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन भी फातिमा को उनके कार्य के लिए सम्मानित कर चुका है। वैसे देेखें, तो फातिमा का परिवार खेती से जुड़ा है, लेकिन फातिमा शिक्षा के बीज बोने में लगी हैं। कहती हैं,`किसी को अक्षरदान देकर लगता है, मानो अपनी मुट्ठी में खुशबू भर आई हो।’

गिरिजा त्रिपाठी, देवरिया

देवरिया की गिरिजा त्रिपाठी के पास कोई बड़ा बैंक बैलेंस तो नहीं था, एक अच्छी आदत की जमा-पूंजी जरूर थी-दूसरों की मदद करना। वह अच्छी आदत अब उनके एक अभियान का हिस्सा है। ससुराल से पीड़ित कोई लड़की, घर से निकाली गई कोई बुजुर्ग या कोई असहाय मां की मदद करना, देवरिया की गिरिजा त्रिपाठी के लिए ये सब जिंदगी का मकसद है।

किसी महिला को मुसीबत में देखकर वह ढाल की तरह सामने खड़ी हो जाती हैं और पीड़ित महिलाओं के लिए तब तक मदद की मुहिम चलाती रहती हैं, जब तक उनकी समस्या का समाधान न हो जाए। 1988 से जारी अपनी मुहिम से गिरिजा अब तक ढेर सारी महिलाओं को आश्रय दे चुकी हैं, कई महिलाओं को रोजगार दिला चुकी हैं। ...और ये सब वह कर पाई हैं अपनी एक अच्छी आदत की बदौलत, जो बचपन से उनकी जमा-पूंजी थी- दूसरों की मदद करना। पिता फौज में थे।

1971 की लड़ाई के बाद असम में गिरिजा ने कई ऐसी महिलाओं के दर्द को नजदीक से देखा था, जिनके अपने युद्ध में मारे गए थे या युद्ध की आंच उन महिलाओं के परिवार तक पहुंची थी। तभी मन-ही-मन निर्णय लिया कि महिलाओं के लिए कुछ करना है। एमए (मनोविज्ञान) कर चुकी गिरिजा के लिए यह काम इतना आसान भी न था, लेकिन महिलाओं को जागरूक करने की जो मुहिम गिरिजा ने शुरू की, उसे रुकने नहीं दिया। उनके हौसले से अन्य महिलाएं भी उनके साथ जुड़ती गईं। इसके लिए उन्होंने 1993 में ‘मां विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण समाज सेवा संस्थान’ की नींव रखी।

आज वह महिला शिक्षा, स्वरोजगार प्रशिक्षण, घर से निकाली गई बुजुर्गों को वापस परिवार में शामिल कराने, भटकी हुई बालिकाओं को आश्रय देने, बालिकाओं की शादी कराने आदि कार्य निस्वार्थ भाव से कर रही हैं। यही नहीं, असहाय महिलाओं के लिए वे 2002 से अल्पवास गृह चला रही हैं, वहां स्वरोजगार प्रशिक्षण देने के साथ-साथ आश्रय भी दिया जाता है। गिरिजा अपने खर्च पर वह अब तक 45 बेटियों का विवाह करा चुकी हैं। जेल में बंद असहाय व जरूरतमंद  महिलाओं के लिए भी वह देवरिया जेल में काउंसलिंग का काम कर रही हैं। कई ऐसी महिलाएं, जिन्हें परिवार ने त्याग दिया था या वह विधवा होने के चलते घर से निकाल दी गई थीं, गिरिजा ने उनकी फिर से शादी करवाकर उनका घर बसाया है या फिर परिवार में उन्हें दोबारा शरीक किया है। दूसरों की मदद करने की यह आदत अब भी उनकी जमा-पूंजी है।

कमलेश कु. पालीवाल, इलाहाबाद

दर्द से भरी और हताशा से घिरी जिंदगी में मुस्कान घोलना आसान काम नहीं, लेकिन कमलेश कुमारी पालीवाल इस कठिन कार्य को बेहद आसानी से कर रही हैं। अशक्त बच्चों को आत्म-निर्भर बनाने का बीड़ा उठाकर कमलेश ने समाज को एक नया रास्ता दिखाया है।

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी  की असिस्टेंट प्रोफेसर (कॉमर्स विभाग) कमलेश कुमारी पालीवाल ने कॉलेज के दिनों में ही साथियों के साथ मिलकर एक ग्रुप बना लिया था और मलिन बस्तियों के गरीब बच्चों को शिक्षित करने का काम करने लगी थीं। इससे पहले अपने बुलंदशहर के सतोहा गांव में कमलेश ने सांप्रदायिक दंगों के दौरान `पीस प्रोग्राम’ भी चलाया था, जिसके लिए 1991 में उन्हें पुलिस विभाग से सद्भावना पुरस्कार मिला था। उसके बाद नेहरू युवा केंद्र और यूथ हॉस्टल एसोसिएशन से जुड़कर कमलेश सामाजिक कार्यों से जुड़ी रहीं।

आज वह इलाहाबाद में मूक-बधिर बच्चों के चेहरे पर मुस्कान लाने का कार्य कर रही हैं। 2012 में कमलेश ने चिराग हेल्पिंग आॅर्गेनाइजेशन की शुरुआत की। यह संस्था निर्माणाधीन इमारतों में मजदूरी कर रहे परिवारों के बच्चों को शिक्षित करने के साथ-साथ मूक-बधिर बच्चों  को शिक्षा देने और स्किल डेवलपमेंट की दिशा में कार्य कर रही हैं। अब तक 100 से अधिक बच्चे इस प्रोग्राम से लाभान्वित हो चुके हैं।  मूक-बधिर बच्चों की शिक्षा पर उनका ज्यादा जोर है।

अपनी संस्था और सरकार की मदद से वह विकलांग बच्चों के लिए एक साल का स्पेशल एजुकेशन प्रोग्राम, स्किल डेवलपमेंट और हॉबी क्लासेज प्रोग्राम भी चला रही हैं, जिससे अशक्त बच्चे आत्मनिर्भर होकर समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें। महिलाओं पर बढ़ते एसिड अटैक की घटनाओं से आहत कमलेश, एसिड की खुली बिक्री को रोकने की कवायद में भी जुटी हैं। 2010 में उन्होंने एक संस्था  के साथ मिलकर हाईकोर्ट में एसिड की खुली बिक्री के खिलाफ पीआईएल दाखिल किया था। हाईकोर्ट से सफलता मिलने के बाद वह सुप्रीम कोर्ट भी गईं और खुले में बिकने वाले एसिड पर रोक भी लगवाईं। कमलेश कहती हैं, `मेरा मकसद अक्षम बच्चों को शिक्षित और स्वरोजगार की दिशा में सक्षम बनाना है। समाज को यह समझाना चाहती हूं कि शारीरिक रूप से अक्षम होना कोई अपराध नहीं।’

माधवी सेंगर, कानपुर

निःसंतान रहने की शपथ लेकर कानपुर की माधवी सेंगर अब तक सैकड़ों कन्याओं की मां बन चुकी हैं, जो उनके `बेटी बचाओ अभियान’ की बदौलत इस दुनिया में आईं। माधवी शादी में सात फेरे लेने वाले नव युगलों को 'आठवां वचन'  भी दिलाती हैं कि वे कन्या-भ्रूण हत्या नहीं करेंगे, बेटी को जन्म लेने देंगे।

कहानी 22 साल पहले शुरू हुई है। एक नवजात बच्ची को बस से फेंक देने की खबर ने कानपुर की माधवी सेंगर को झकझोर कर रख दिया था। तब माधवी ने प्रण लिया कि वह निःसंतान रहेंगी और बेटियों को बचाने के लिए कुछ करेंगी। और फिर 2008 से `बेटी बचाओ’ अभियान से जुड़ गईं। अपने देह दान की घोषणा कर चुकीं माधवी ने `युग दधीचि देहदान संस्थान’ की नींव रखकर कानपुर के `गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कॉलेज’ के छात्रों को पढ़ाई के लिए मानव शरीर की उपलब्धता को आसान तो बनाया ही, साथ में मेडिकल कॉलेज के सारे छात्रों को शपथ भी दिलाई कि वह न तो कन्या-भ्रूण हत्या करेंगे, न ही लिंग जांच करेंगे।

यूपी के सभी मेडिकल कॉलेजों से जुड़ी उनकी संस्था अब तक 145 ह्यूमन बॉडी मेडिकल कॉलेजों को पढ़ाई के लिए दान करा चुकी है। उनकी संस्था के अथक प्रयास से 2,500 लोगों ने मृत्यु पश्चात अंतिम पारिवारिक संस्कार की बजाय देहदान के लिए पंजीकरण भी कराया है। 2010 से माधवी ने बेटी बचाने के लिए एक अनोखा प्रयास शुरू किया। वह शादी में सात फेरे लेने वाले नव युगलों को 'आठवां वचन' दिलाती हैं कि वे कन्या-भ्रूण हत्या नहीं करेंगे, बेटी को जन्म लेने देंगे। `बेटी बचाओ अभियान’ को 22 साल दे चुकीं माधवी की संस्था ने अब तक एक हजार नई जोड़ियों को उनकी संस्था `आठवां वचन’ दिला चुकी है।

100 से ज्यादा जागरूकता रैली और गोष्ठी कर वह समाज को संदेश दे चुकी हैं कि बेटी नहीं होगी, तो हम नहीं होंगे। कन्या-भ्रूण हत्या पर सख्त कानून बनाने की मांग को लेकर माधवी की संस्था इस वर्ष की शुरुआत में दस हजार पत्र लिखकर पीएम को भेज चुकी है। 700 लोगों के निःशुल्क नेत्र प्रत्यारोपण जैसा कार्य भी माधवी की संस्था ने किया है। निःसंतान रहने की शपथ लेकर माधवी अब तक उन हजारों कन्याओं की मां बन चुकी हैं, जो उनके इस जागरूकता अभियान की बदौलत इस दुनिया में आईं।

डॉ. लक्ष्मी गौतम, वृंदावन

वृंदावन की पावन भूमि पर भक्ति के सुर तो बहुत गूंजते हैं, लेकिन यहां एक कॉलेज की शिक्षिका डॉ. लक्ष्मी गौतम सेवा के सुर भी लगा रही हैं।

वृंदावन में विधवाओं और लाचार बुजुर्ग महिलाओं के दर्द को अपना बना लेने वाली डॉ. लक्ष्मी गौतम वैसे तो वृंदावन के एक कॉलज में एसो. प्रोफेसर के पद पर काम कर रही हैं, लेकिन कॉलेज से समय मिलने के बाद वह वृंदावन में दर-दर भटकने वाली लाचार और असहाय महिलाओं की मदद करने निकल पड़ती हैं।

पिछले 19 सालों से वह इस काम को कर रही हैं। सड़क पर पड़ी बीमार महिला को अस्पताल पहुंचाना, भूखी महिला को भोजन उपलब्ध कराना, उनकी पेंशन बनवाना, राशन कार्ड बनवाना, वस्त्र, भोजन उपलब्धे कराना लक्ष्मी की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। उनकी मेहनत और इस जज्बे को वृंदावन के रिक्शे और तांगे वाले भी समझते हैं। तभी तो वे किसी लाचार महिला को देखते हैं, तो तुरंत उसे उठाकर लक्ष्मी के दरवाजे छोड़ जाते हैं। लक्ष्मी भी पूरे मन से पीड़िताओं की सेवा करने में कोई कसर नहीं छोड़तीं।

राज्य सरकार, राज्य महिला आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग की मदद से वह महिलाओं को न्याय दिलाने का कार्य कर रही हैं। लगभग 50 बुजुर्ग महिलाओं को लक्ष्मी काउंसलिंग कर पुनः परिवार का हिस्सा बनवा चुकी हैं। समाज सेवा के लिए डॉ. लक्ष्मी को कई सम्मान भी मिल चुके हैं। आध्यात्मिक नगरी वृंदावन में जहां सिर्फ कृष्ण भक्ति की धुन गूंजती है, वहां डॉ. लक्ष्मी गौतम सेवा के सुर लगा रही हैं।

सहारनपुर की डॉ. कुदसिया अंजुम

समाज के चेहरे पर हंसी और खुशी पैसों से नहीं आती। समाज चहकता है शिक्षा के सुर से। इस सुर के लिए सहारनपुर की डॉ. कुदसिया अंजुम ने अपनों से भी लड़ाई लड़ी और गैरों से भी।

बरसों बीत गए, लेकिन बात ही कुछ ऐसी थी कि सहारनपुर की डॉ. कुदसिया अंजुम को आज भी अच्छी तरह  याद है। वह कॉलेज की पढ़ाई पूरी करेंगी, उनकी यह घोषणा रिश्तेदारों और सगे-संबंधियों के बीच 'एटम बम' के विस्फोटक की तरह थी। लेकिन लगन हो, तो मुश्किलें आसान हो जाती हैं। जिस समाज में घर से निकलने की मनाही थी, वहां अंजुम  पीएचडी की डिग्री घर लेकर आई।

अंजुम के लिए यह कोई मंजिल नहीं, बस एक पड़ाव भर था। अब वह दूसरी लड़कियों को भी पढ़ते देखना चाहती थीं। चाहत अच्छी थी, मगर आसान नहीं। डॉ. अंजुम ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद 1982 में सहारनपुर के `महाराज सिंह डिग्री कॉलेज’ में पढ़ाने का काम शुरू किया।

इसके बाद जब 1984 में `इंडस्ट्रीयल मुस्लिम गर्ल्स इंटर कॉलेज’ में राजनीति शास्त्र पढ़ाना शुरू किया, तो बालिकाओं की शिक्षा पर लगी सामाजिक पाबंदी देखकर उनकी चाहत ने जिद का रूप ले लिया। वह अपने समाज की लड़कियों को पढ़ाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने लगीं। फिर 1999 में कुछ साथियों के साथ मिलकर 'परचम' संस्था की नींव रखी और इसी माध्यम से आर्थिक और बाल मजदूरी के कारण पढ़ाई छोड़ चुकी लड़कियों और बच्चों को दोबारा शिक्षा से जोड़ने के लिए `दस्तक' नाम से अभियान शुरू किया।

यही नहीं, डॉ. कुदसिया, जबरन पढ़ाई रुकवाने वाले परिवारों की भी काउंसलिंग करने लगीं। आज उसी का नतीजा है कि उनके इलाके में सैकड़ों बच्चियों को दोबारा स्कूल जाने का मौका मिल पाया और वे अपने सपनों को पूरा कर रही हैं। अंजुम अपनी संस्था `परचम’ के माध्यम से असहाय व गरीब बालिकाओं को स्वरोजगार के लिए छह माह का प्रशिक्षण भी उपलब्ध करा रही हैं।

सद्भाव मंच के माध्यम से वह सम्प्रदायिकता के खिलाफ भी अभियान चला रही हैं। अपने अभियान से अंजुम ने स्कूल-कॉलेजों के छात्रों को जोड़ा है, जो लोगों को शिक्षा और सद्भाव की बात समझाते हैं। राशन कार्ड बनवाने से लेकर सरकारी योजनाओं का लाभ दिलवाने तक डॉ. अंजुम मदद करती हैं।

छोटी-छोटी बातों पर टूटते परिवारों को जोड़ने के लिए अंजुम पुलिस लाइन में काउंसलिंग भी करती हैं। अब तक वह सौ से अधिक परिवारों को जोड़ चुकी हैं। पर्यावरण जागरूकता, साम्प्रदायिकता के खिलाफ जागरूकता, बालिकाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें शिक्षित करने के अपने इस प्रयास पर वह बस इतना भर कहती हैं-`मैं समाज के हर एक चेहरे पर खुशी देखना चाहती हूं। मुझे खिले चेहरों के गुलदस्ते पसंद हैं।’
 

शारदा सिंह, गाजियाबाद

खुद पर भरोसा हो जाए, तो पहले खुद की जिंदगी बदलती है, फिर घर और फिर पूरा समाज। शारदा सिंह ने अपने इलाके की सैकड़ों महिलाओं को भरोसे का क्रेडिट कार्ड थमाकर परिवर्तन की एक लहर चला दी है।

'बेटियों को पढ़ा-लिखाकर क्या कलेक्टर बनाना है?' यह वाक्य शारदा सिंह के कानों में आज भी गूंजता रहता है। शारदा की पढ़ाई को लेकर गांव के लोग उनके पिता को ताने मारते थे। तभी बुलंदशहर में जन्मीं शारदा सिंह को महसूस हुआ था कि घर में सोलह से अठारह घंटे काम करने वाली महिलाएं इतना लाचार इसलिए हैं कि वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं। शारदा के मन में एक विचार आया कि क्यों न महिलाओं को आर्थिक स्तर पर जागरूक किया जाए।

शादी के बाद जब वह गाजियाबाद आईं, तो यहां कमोबेश यही स्थिति थी। यहीं से उनके सपनों को बल मिला और वो निकल पड़ीं अपनी मंजिल कि ओर।  2007 में ‘शांति शिक्षा एवं नारी उत्थान समिति’ की नींव रख, महिलाओं को जागरूक करने का काम शुरु किया और आज वह लगभग आज छह हजार महिलाओं को आत्मनिर्भर बना  चुकी हैं। लगभग 2,600 महिलाओं को उनकी पसंद के कामों का प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार शुरू करा चुकी हैं। उनका स्वयं सहायता समूह अभियान गजब का है।

उनकी प्रेरणा से दस से पंद्रह महिलाएं अपना समूह बनाती हैं और बचत कर पैसे जुटाती हैं। इस पैसे से वह कोई छोटा उद्योग स्थापित करती हैं। हुनरमंद महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई, अचार, कंप्यूटर ट्रेनिंग, ब्यूटी पार्लर ट्रेनिंग, टॉय मेकिंग आदि का निःशुल्क प्रशिक्षण देकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया जाता है। महिलाओं द्वारा बनाए गए उत्पादों को बड़े मेलों में स्टॉल लगाकर बेचा जाता है और मुनाफे को उत्पाद बनाने वाली महिलाओं को दिया जाता है। शारदा कहती हैं,`महिलाएं अपनी मदद तो खुद करती हैं, मैं सिर्फ उन्हें भरोसे का क्रेडिट कार्ड थमाती हूं।’

शबनम खान, रामपुर (यूपी)

हुनर को हेल्पलाइन मिल जाए तो लाइफलाइन बड़ी हो ही जाती है। घर-आंगन में उम्मीदों की धूप उतर आती है। उत्तर प्रदेश के रामपुर में उम्मीदों की इस धूप से इंद्रधनुष सजाने का काम कर रही हैं शबनम। हाथ में हुनर हो, तो बस उसे तराशने भर की जरूरत होती है, जिंदगी को रास्ता मिल जाता है। लेकिन, तराशे कौन? कौन रास्ता दिखाए? ऐसे सवालों से रामपुर में न जाने कितनी महिलाएं जूझ रही थीं। तभी शबनम खान को लगा कि कुछ करना चाहिए।

मुरादाबाद में जन्मीं शबनम को बचपन से ही दूसरों की मदद करना अच्छा लगता था। शादी होने के बाद जब वह रामपुर अपने ससुराल पहुंचीं, तो ससुराल वालों ने दूसरों की मदद करने से उन्हें रोका नहीं, बल्कि प्रोत्साहित करना शुरू किया। ससुराल वालों का साथ पाकर शबनम ने `समाज सेवा जन-कल्याण समिति’ नाम की एक संस्थात बनाई। इस संस्ा्रा ा ने रामपुर में जरी आदि का काम करने वाले दस हजार से ज्यादा हस्तशिल्प कारीगरों के लिए हस्तशिल्प कार्यालय बरेली से पहचान पत्र जारी कराया, जिनमें महिलाओं की संख्या ज्यादा है।


शबनम इन कारीगरों को बैंकों से लोन दिलाकर अपना व्यवसाय शुरू कराने का भी काम कर रही हैं। 19 साल से समाज सेवा में लगी शबनम ने 2005 से बालश्रम के खिलाफ  एक अभियान छेड़ रखा है। बाल श्रमिकों के लिए रामपुर में चार स्कूल खोलकर, शबनम उन्हें निःशुल्क शिक्षा और साथ में स्वरोजगार का प्रशिक्षण भी दे रही हैं, जैसे पतंग, टेडीबियर बनाना, सिलाई-कढ़ाई, फ्लावर मेकिंग आदि का काम। मुरादाबाद, रामपुर, टांडा, बरेली आदि क्षेत्र की दस हजार महिलाएं शबनम के साथ जुड़ी हैं।

शबनम इन महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने, स्वयं-सहायता समूह बनाकर बचत करने, स्वरोजगार के लिए बैंकों से लोन दिलाने और वेश्यावृति में फंसी युवतियों को मुक्ति दिलाने की मुहिम चला रही हैं। शबनम बेशक मुस्लिम परिवार से हैं, लेकिन वह अपने काम न जाति देखती हैं और न ही धर्म। हुनरमंद हाथों को पहचान दिलाने वाली शबनम आज रामपुर की एक सशक्त पहचान बन चुकी हैं। शबनम ने पीड़ित महिलाओं के लिए एक हेल्पलाइन भी शुरू की, जिस पर फोन करने वालों को मदद भी मिलती है, परामर्श भी।

रानी अवस्थी, इलाहाबाद

डॉ. रानी अवस्थी मानती हैं कि हर बच्चा एक तारा है और अगर वह शारीरिक और दिमागी रूप से अशक्त है, तो भी उनकी उपेक्षा का अधिकार किसी को नहीं। डॉ. रानी 35 सालों से जमीं के इन तारों के साथ हैं।

पैंतीस साल तक कोई संकल्प जीवित रहे, ऐसा कम ही होता है। डॉ. रानी अवस्थी की तरह जिद भी तो सबकी नहीं होती। इलाहाबाद की डॉ. अवस्थी 1980 में अयोध्या घूमने गई थीं। वहां मंदबुद्धि बच्चों को भीख मांगते देख, उनका मन पीड़ा से भर गया। तभी उन्होंने सोच लिया कि इनके लिए कुछ करना है। जब उन्होंने अपने मन की बात पति को बताई, तो वे भी इस काम में मदद करने के लिए तैयार हो गए।

इस तरह 1981 में फैजाबाद में मंदबुद्धि और मूक-बधिर बच्चों के लिए एक स्कूल खोला। इसके बाद तो मानो रानी की जिंदगी ऐसे बच्चों को ही समर्पित हो गई हो। वह अब तक करीब दस हजार शारीरिक और दिमागी रूप से अशक्त बच्चों को शिक्षा एवं रोजगार प्रशिक्षण दे चुकी हैं। वह कहती हैं,`हर बच्चा जमीं पर तारे के रूप में आता है। ऐसे में शारीरिक और दिमागी रूप से अशक्त बच्चों की उपेक्षा क्यों?  उन्हें भी पढ़ने का अधिकार है, वे भी समाज की मुख्य धारा से जुड़े।’

इन तारों के बीच एक मां और एक शिक्षिका की भूमिका निभाती रानी को अपने काम पर संतोष है। इलाहाबाद छोड़ा था, तो मन में एक डर था। अब तो फैजाबाद ही घर लगता है। लाचार और अक्षम बच्चों को शिक्षित करने और रोजगार दिलाने के साथ-साथ वे अनाथ बच्चों, पैदा होते ही फेंक दी गई कन्याओं के पुनर्वास, बुजुर्गों को सहारा देने और अपंगों को तिपहिया साइकिल आदि देने का कार्य भी निःशुल्क कर रही हैं। उन्हें इस सराहनीय कार्य के लिए कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। राज्य सरकार भी उन्हें तीन बार सम्मानित कर चुकी है।

नेहा मेहरोत्रा, इलाहाबाद

इलाहाबाद की नेहा मेहरोत्रा ने जिद ठानी, तो उम्मीदों का आसमान व्हीलचेयर पर झुक आया। और आज नेहा पर टिकी हुई हैं प्रदेश के सैकड़ों ऐसे बच्चों की नजरें, जो शारीरिक अक्षमता को अभिशाप मानकर चुप बैठ गए थे।

इलाहाबाद की नेहा मेहरोत्रा की उम्र भले ही छोटी हो, पर इरादे इतने बड़े कि मुश्किलें भी घुटने टेक दें।  नेहा `स्पाइनल मस्कुलर डिस्ट्रॉफी’ नाम की बीमारी से पीड़ित हैं। इस वजह से उनके शरीर का 80 प्रतिशत हिस्सा विकलांग हो गया। सामान्य बच्चों की तरह वह न तो ठीक से बैठ पाती हैं, न ही चल पाती हैं। पैर और हाथ दोनों से लाचार हैं, लेकिन यह उसका जज्बा ही है कि अपनी शारीरिक अक्षमता को कभी खुद के हौसलों पर हावी नहीं होने दिया।

शारीरिक अक्षमता को हराने वाली नेहा को वैसे तो मां-बाप का सहारा है, फिर भी होश संभालने के बाद नेहा ने खुद से वादा किया कि वह बोझ नहीं बनेगी।  बचपन से ही नेहा पढ़ाई के साथ-साथ अन्य कई क्विज प्रतियोगिताओं में भी अव्वल आती रही हैं। उनकी प्रतिभा को देश ने भी पहचाना। 

2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने नेहा को राष्ट्रीय बालश्री सम्मान से सम्मानित भी किया था। इस पुरस्कार ने देश और दुनिया को दिखा दिया कि जिद हो, तो शारीरिक अक्षमता के वावजूद जीत होती है। सीबीएसई की बारहवीं की परीक्षा में नेहा ने ऑल इंडिया में दूसरा स्थान पाकर अच्छे-अच्छों को हैरान कर दिया था। यही नहीं, सीबीएसई की नेशनल इन्टेल साइंस एग्जीबिशन में भी नेहा सम्मानित हो चुकी हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने साहस दिखाने के लिए नेहा को वर्ष 2013 में रोल मॉडल सम्मान से भी नवाजा है। `अमूल इंडिया’ भी नेहा को विद्याश्री सम्मान से सम्मानित कर चुका है। उम्मीदों का आसमान नेहा के व्हीलचेयर पर टिका हुआ है और नेहा पर टिकी हुई हैं प्रदेश के सैकड़ों ऐसे बच्चों की नजरें, जो शारीरिक अक्षमता को अभिशाप मानकर चुप बैठ गए थे। नेहा आईएएस बनना चाहती हैं।

कंचन खन्ना, मुरादाबाद

बचपन में पोलियो जैसी बीमारी की वजह से मुरादाबाद की कंचन खन्ना के शरीर का 80 प्रतिशत हिस्सा काम नहीं करता है, इसके बावजूद कंचन ने अपनी जिंदगी में एक लंबी छलांग लगाई और आज वह एक अच्छी अध्यापिका और लेखिका हैं, साथ में बहुतों के लिए मार्गदर्शक भी।

बचपन में कंचन को देखकर कई स्कूलों ने एडमिशन देने से मना कर दिया। मुरादाबाद की इस लड़की के शरीर का 80 प्रतिशत हिस्सा काम नहीं करता है। फिर भी कंचन ने हार नहीं मानी। खुद घर बैठकर पढ़ती और बच्चों को कोचिंग भी कराती। यह सफर यूं ही चलता रहा। कक्षा 9वीं तक की पढ़ाई घर पर बैठकर की।

कक्षा दस में जब परीक्षा देने की अनुमति न मिली, तो कोर्ट का सहारा लेकर परीक्षा में शामिल हुई। इसी तरह बीए, एमए तक की शिक्षा पूरी करने के बाद कंचन ने कक्षा 6 से 10वीं  तक के छात्रों के लिए अंग्रेजी ग्रामर और वर्कबुक लिखीं, जो किताबें अब मुरादाबाद के स्कूलों में छात्रों का भविष्य संवार रही हैं। अपनी शारीरिक अक्षमता से हार न मानने वाली कंचन आज मुरादाबाद में अक्षम बच्चों के लिए निःशुल्क कोचिंग सेंटर भी चलाती हैं। वह अपने कोचिंग सेंटर से अक्षम व गरीब छात्रों को कम्प्यूटर शिक्षा देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में लगी हुई हैं। सच! कंचन का यह कार्य बेहद सराहनीय है, जो विकलांग होते हुए भी दूसरों के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं। कंचन के भाई आशीष भी शारीरिक रूप से अक्षम हैं।

सन् 2010 में कंचन ने ऐसे शारीरिक रूप से अशक्त बच्चों को सम्मानित करने का काम भी किया, जो अपने-अपने क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। कंचन के हौसले को राज्य सरकार ने भी माना है। 2009 में राज्य सरकार उन्हें `दक्ष विकलांग व्यक्ति’ पुरस्कार से सम्मानित भी कर चुकी है। अपनी लाचारी पर जीत हासिल करने की इस सफलता को कंचन एक लंबी छलांग के रूप में देखती हैं-,`जिंदगी को ऐसी लंबी छलांग चाहिए तो हिम्मत तो जुटानी पड़ेगी।’

सीमा त्रिपाठी, गोरखपुर

`शिक्षा हर बच्चे का हक है’ दीवारों पर लिखे ऐसे सरकारी नारे गोरखपुर की सीमा त्रिपाठी के दिलों में बसते हैं। गरीब बच्चों को स्कूल भेजना सीमा के लिए किसी प्रार्थना से कम नहीं।

सरकारी योजनाएं आती थीं, चली जाती थीं। शिक्षा से जुड़े सरकारी वादे दीवारों पर वैसे ही पड़े रह जाते और वैसे ही खाली स्लेट की तरह पड़ी रह जाती थी उन गरीब बच्चों की जिंदगी, जो या तो कूड़ा बीनते थे या फिर मजदूरी करते थे। तभी गोरखपुर की रहने वाली सीमा त्रिपाठी ने सोचा था-` शिक्षा तो हर किसी का अधिकार है।’ इसी के बाद सीमा ने उन कारणों पर ध्यान देना शुरू किया, जिसकी वजह से गरीब घरों के बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे। एक दिन वह रुस्तमपुर के स्लम एरिया में मजबूत इरादे के साथ पहुंचीं। शहर के इस इलाके में कई ऐसे बच्चे थे, जो स्कूल तो जाना चाहते थे, लेकिन गरीबी आड़े आती थी। वैसे भी स्लम एरिया के उन बच्चों की तरफ बहुत कम लोगों का ध्यान जा पाता है, लेकिन सीमा ने स्लम एरिया के उन बच्चों को शिक्षित करने का जिम्मा उठाया।

गरीबों की मदद करने की प्रेरणा सीमा को अपने पिता से मिली है। सीमा के पिता गोरखपुर में वकील थे, जो  गरीब और असहाय लोगों के केस मुफ्त में लड़कर उनकी मदद किया करते थे। आज उनके पिता इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन सीमा अपने पिता के नक्शेप-कदम पर चलते हुए समाज सेवा के कार्यों में लगी हुई हैं। पिता के गुजरने के बाद सीमा ने `गणेश बिहारी मेमोरियल संस्था’ की स्थापना की और तभी से गरीब बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा करने का कार्य कर रही हैं।

समाज सेवा के साथ-साथ सीमा एन्वायरमेंटल एक्शन ग्रुप में नौकरी भी कर रही हैं। सबसे खास बात यह कि सीमा गरीब बच्चों को पाठ्य-सामग्री, भोजन, कपड़े जैसी जरूरतों को भी पूरा करती हैं आैर वह भी निशुल्क। सीमा कहती हैं,`किसी गरीब बच्चों को स्कूल भेज कर लगता है, मानो जिंदगी में एक और प्रार्थना शरीक हो गई हो।’
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डॉ. रंजना गुप्ता, कानपुर नगर/झांसी

शूटिंग रायफल किराये की जरूर थी, हौसला नहीं। नवावाद झांसी की महिला थानाध्यक्ष रंजना गुप्ता ने एक निशाना लगाया, पूरे उत्तर प्रदेश ने उन्हें सिर आंखों पर बिठा लिया।

कानपुर में पली-बढ़ी रंजना को बचपन से ही  (निशानेबाजी) का शौक था, घरवालों को यह बात पसंद न थी।  पिता को भी यह पसंद नहीं था कि रंजना इंटर के बाद कॉलेज की पढ़ाई जारी रखे। रंजना ने अपनी जिद व विश्वास से परिवार को आगे की पढ़ाई  के लिए मना लिया। बीएड, एमफिल और पीएचडी की डिग्री हासिल तो कर ली, लेकिन अपने पसंदीदा खेल को भूलना पड़ा। परिवार वाले तो निशानेबाजी के एकदम  खिलाफ थे।
 
तभी रंजना की जिंदगी में उम्मीद की एक रोशनी आई। उत्तर प्रदेश पुलिस (2005) में सब इंस्पेक्टर के पद पर चयन हो गया। ट्रेनिंग के दौरान रायफल चलाने की प्रैक्टिस में रंजना हर लक्ष्य को आसानी से भेदती गईं और फिर शुरू हुई निशानेबाजी की प्रैक्टिस। प्रैक्टिस खुद की थी, किसी अनुभवी का साथ नहीं था।  हां, खुद पर भरोसा जरूर था। वर्ष 2008 में एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उनका चयन हो गया। अब सामने मुश्किल यह थी कि रंजना के पास अपनी शूटिंग रायफल नहीं थी।

हैदराबाद के एक शूटर से किराये की रायफल लेकर उन्होंने `ऑल इंडिया शूटिंग स्पोर्ट्स चैम्पियनशिप’ में पहला पदक जीत कर साबित कर दिया कि दिल में जज्बा हो, तो नामुमकिन को भी मुमकिन बनाया जा सकता है।  इसके बाद रंजना ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

इंडो-भूटान इंटरनेशनल शूटिंग चैम्पियनशिप, अमेरिका में आयोजित वर्ल्ड पुलिस इंटरनेशनल शूटिंग चैम्पियनशिप-2015 में तीन स्वर्ण, दो रजत और एक कांस्य पुरस्कार समेत कई और पुरस्कार जीतकर रंजना ने न सिर्फ उत्तर प्रदेश पुलिस का मान बढ़ाया है, बल्कि प्रदेश का भी नाम रोशन किया है।  इस उपलब्धि के लिए राज्य सरकार ने उन्हें रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार से भी सम्मानित किया है। भारत सरकार भी उन्हें सम्मानित कर चुकी है।

डॉ. रंजना की काबिलियत देखकर लोगों ने 13.50 लाख की रायफल भेंट कर उन्हें देश-प्रदेश का मान बढ़ाने का उपहार दिया है। सच तो यह है कि रंजना की काबिलियत को देखकर लोगों में यह जागरूकता आई है कि बेटियां किसी से कम नहीं। रंजना कहती हैं, `मेरी कहानी सुनने के बाद कई लड़कियां खेल में आ रही हूं। एक बड़ी बहन की तरह मैं उनके साथ हूं।'
 
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