महिला सशक्तिकरण के दावे करने वाले तमाम राजनैतिक दलों ने पिछले चुनावों में महिलाओं को टिकट देने में बेहद कंजूसी बरती थी। चुनाव आयोग और एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक पांच राज्यों के एक दशक के चुनाव में सिर्फ ढाई फीसदी ही महिलाओं उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी है। यह आंकड़ा इसलिए और हैरत में डालता है क्योंकि जहां संसद में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण बिल कई सालों से अटका है, वही इस चुनाव के घोषणा पत्र में पंजाब में कांग्रेस ने महिलाओं को आरक्षण देने की घोषणा की है।
चुनाव आयोग और गैर सरकारी संस्था असोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2007 और वर्ष 2012 के उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर विधानसभा चुनाव में महिलाओं उम्मीदवार की संख्या बहुत कम थी। रिपोर्ट के मुताबिक इन राज्यों में वर्ष 2012 के चुनाव में कुल 9210 उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरे थे इनमें से महिला उम्मीदवार सिर्फ 8.40 फीसदी (774) ही थी। वहीं वर्ष 2007 में 8393 उम्मीदवारों में से 6.02 फीसदी (506) ही महिला उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था।
एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय पार्टियों की अपेक्षा राष्ट्रीय राजनैतिक दलों ने महिला उम्मीदवारों को मौका ज्यादा दिया। बीएसपी ने 403 उम्मीदवारों में से सिर्फ सात फीसदी (27), बीजेपी ने 401 उम्मीदवारों में से 11 फीसदी (44), सपा ने 401 उम्मीदवारों में से आठ फीसदी (32), कांग्रेस ने 358 उम्मीदवारों में से 10 फीसदी (37) महिला उम्मीदवारों को ही चुनावी मैदान में उतारा था।
उत्तराखंड में बीजेपी, कांग्रेस और बसपा ने 2012 के विधानसभा चुनाव में सभी 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। कांग्रेस ने सबसे ज्यादा 11 फीसदी (8) महिला उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा था। जबकि भाजपा ने सिर्फ आठ फीसदी (6) और बसपा ने सिर्फ चार फीसदी (3) महिलाओं को चुनावी मैदान में उतारा।