चल रहा है तेजी से काम
माधवन ने बताया कि 10 हजार करोड़ रुपये की लागत वाले गहरे समुद्र अभियान से जुड़ा वैज्ञानिक व तकनीकी काम पहले ही शुरू हो चुका है। इसके लिए इसरो और एनआईओटी के बीच एमओयू हो चुका है। एनआईओटी को मानवीय पनडुब्बी वाहन के लिए इलेक्ट्रोनिक्स और नेविगेशन से जुड़ी तैयारियों की जिम्मेदारी दी गई है। इनके अलावा भी गोवा स्थित राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं समुद्री शोध संस्थान, कोच्चि स्थित सेंटर फॉर मैरीन लिविंग रिसोर्सेज एंड इकोलॉजी और हैदराबाद स्थित भारतीय राष्ट्रीय समुद्री सूचना सेवा केंद्र को इस अभियान में शामिल किया गया है।
सामान्य पनडुब्बी से कैसे है अलग
बता दें कि सामान्य पनडुब्बियां जहां समुद्र में तकरीबन 200 मीटर गहराई तक ही गोता लगा सकती हैं, वहीं खासतौर पर खोज अभियान के लिए बनाया गया पनडुब्बी वाहन करीब 6000 मीटर की गहराई तक भी खोजबीन करने में सक्षम रहेगा। इसके जरिए भारत को गहरे समुद्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन करने में सफलता मिलेगी, वहीं अपनी समुद्री सीमा की गहराई में मौजूद हाइड्रोकार्बन और खनिज तत्वों का भी सर्वे किया जा सकेगा।