स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय सहित दुनिया के कई प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा किए गए इस अध्ययन में बताया गया है कि जैसे-जैसे धरती गर्म होती जाएगी, वैसे-वैसे गेहूं, मक्का, सोयाबीन, जौ और कसावा जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार घटेगी।
दुनियाभर में तेजी से बढ़ता तापमान अब सिर्फ जलवायु संकट नहीं, बल्कि खाद्य संकट का भी कारण बनता जा रहा है। ताजा अध्ययन में खुलासा हुआ कि वैश्विक तापमान में हर एक डिग्री सेल्सियस वृद्धि के साथ हर व्यक्ति की थाली से औसतन 120 कैलोरी कम हो जाएंगी। यह वर्तमान दैनिक खपत का लगभग 4.4% है। इंटरनेशनल जर्नल नेचर में प्रकाशित अध्ययन ने चेताया कि सदी के अंत तक प्रमुख फसलों से मिलने वाली कैलोरी में 24 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है, जिससे करोड़ों लोगों की भूख और कुपोषण की स्थिति और भयावह हो जाएगी। भले ही किसान जलवायु के अनुरूप फसल तकनीक अपनाएं, फिर भी जलवायु परिवर्तन की मार से पूरी तरह बचा नहीं जा सकेगा।
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स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय सहित दुनिया के कई प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा किए गए इस अध्ययन में बताया गया है कि जैसे-जैसे धरती गर्म होती जाएगी, वैसे-वैसे गेहूं, मक्का, सोयाबीन, जौ और कसावा जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार घटेगी। प्रमुख शोधकर्ता प्रो. सोलोमन हसियांग का कहना है कि अगर तापमान तीन डिग्री तक बढ़ गया तो यह ऐसा होगा जैसे पूरी दुनिया ने अपना नाश्ता छोड़ दिया हो। इस गिरावट का सबसे ज्यादा असर गरीबों पर पड़ेगा, जिनमें से 80 करोड़ लोग पहले से ही भोजन की कमी झेलते हैं। उनका कहना है कि यह अध्ययन वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं के साथ हर उस इंसान के लिए एक चेतावनी है जो दिन में दो वक्त खाना चाहता है। अगर जलवायु परिवर्तन पर अब भी गंभीरता नहीं दिखाई गई तो आने वाले दशकों में दुनिया की थाली और भी खाली होती जाएगी।
खेती का भविष्य संकट में
अमेरिका का मिडवेस्ट जो आज मक्का और सोयाबीन उत्पादन का केंद्र है, भविष्य में सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में से होगा। जलवायु परिवर्तन से यहां तापमान में अत्यधिक वृद्धि, वर्षा के पैटर्न में अस्थिरता और हीटवेव की आवृत्ति बढ़ने की आशंका है। इसकी वजह से मिट्टी की नमी घटेगी, परागण में बाधा आएगी और फसलें समय से पहले पकेंगी या सूख जाएंगी। वहीं कनाडा, रूस और चीन जैसे ठंडे देशों में थोड़ी राहत की संभावना है।
2050 से पहले दिखने लगेगा असर
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि 2050 तक ही जलवायु परिवर्तन के कारण फसल उत्पादन में 8% की गिरावट आने की आशंका है, चाहे उत्सर्जन घटे या बढ़े। ऐसा इसलिए क्योंकि कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें वातावरण में सैकड़ों वर्षों तक बनी रहती हैं और जलवायु को लगातार प्रभावित करती रहती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अभी से ग्लोबल कार्बन उत्सर्जन में तेजी से कटौती की जाए और किसानों को जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकें, संसाधन और समर्थन दिया जाएं तो नुकसान को काफी हद तक टाला जा सकता है। लेकिन इसके लिए वैश्विक स्तर पर नीतिगत इच्छाशक्ति और तेजी से कार्रवाई आवश्यक है।