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शीतकालीन सत्र: संसद में 189 करोड़ हुए खर्च, हाथ आया सिर्फ हंगामा

Sat, 17 Dec 2016 10:28 AM IST
हिमांशु मिश्र/नई दिल्ली
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लोकसभा
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प्रतिदिन 9 करोड़ खर्च करने वाली संसद शीतकालीन सत्र में 189 करोड़ रुपये खर्च कर हंगामे के अलावा कुछ और हासिल नहीं कर सकी। लोकसभा में सत्र की 21 दिनों की बैठक में महज 19 घंटे तो राज्यसभा में महज 22 घंटे ही काम हुए।
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इस दौरान नोट बंदी पर सरकार और विपक्ष की सियासी खींचतान के कारण महज दो बिलों को ही कानूनी जामा पहनने का मौका हाथ लगा। इसमें से एक बिल कराधान संशोधन बिल था तो दूसरा नि:शक्त व्यक्ति अधिकार बिल को शुक्रवार को किसी तरह आनन फानन पारित कराया गया।

सत्र में एक देश एक कर के लिए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से संबंधित तीन बिलों को लाया तक नहीं जा सका। साल 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद संसद सत्र में कामकाज के घंटे में हुई उल्लेखनीय वृद्घि को वर्तमान शीत सत्र से पूरी तरह से धो कर रख दिया।
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एक भी मुद्दे पर चर्चा नहीं

पहले ही दिन से नोट बंदी पर सरकार और विपक्ष के बीच जारी खींचतान अंतिम दिन तक बनी रही। इस दौरान कई विपक्षी दलों ने दो बार राष्ट्रपति के समक्ष सरकार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई तो सरकार भी विपक्ष पर लगातार वार करने से पीछे नहीं रही।

अंतिम हफ्ते के बाकी बचे तीन दिनों के दौरान एकबारगी नोट बंदी पर चर्चा की संभावना तब बनती दिखी, जब विपक्ष ने मतविभाजन वाले नियम पर चर्चा की जिद छोडने की घोषणा की। हालांकि इसके बाद सरकार ने भी अचानक अपना स्टैंड बदलते हुए नोट बंदी से पहले अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले पर चर्चा की मांग कर दी।

एक भी मुद्दे पर चर्चा नहीं
संसद के दोनों सदनों की 21-21 बैठकों में एक भी मुद्दे पर चर्चा नहीं हुई। विवाद की वजह बने नोट बंदी के फैसले पर राज्यसभा में चर्चा अधूरी रही तो लोकसभा में एक भी सदस्य अपनी पूरी बात नहीं रख पाया।
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आडवाणी की नाराजगी प्रणब की नसीहत बनी चर्चा

आडवाणी की नाराजगी प्रणब की नसीहत बनी चर्चा
शीत सत्र में भाजपा के वयोवृद्घ सांसद लालकृष्ण आडवाणी की बार-बार नाराजगी चर्चा का विषय बनी। पहले तो उन्होंने विपक्ष के साथ-साथ स्पीकर और संसदीय कार्य मंत्री के काम करने के तरीके पर सवाल उठाए।

बाद में यहां तक कहा कि हंगामे के कारण उनका मन इस्तीफा देने का करता है। सत्र के दौरान ही राष्टï्रपति प्रणब मुखर्जी की भगवान के लिए संसद चलाने की अपील भी लगातार चर्चा में रही।

संसद चर्चा की जगह है। देश की सबसे बड़ी पंचायत पर लोगों की उम्मीदों का बोझ भी है। ऐसे में सांसदों और राजनीतिक दलों को आत्मचिंतन करना चाहिए।
हामिद अंसारी, सभापति राज्यसभा

हंगामे के कारण बाध्य हो कर मुझे कई बार कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। 92 घंटे का समय बर्बाद हो गया। इससे संसद की छवि धूमिल होती है। उम्मीद करती हूं कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा।
सुमित्रा महाजन, स्पीकर, लोकसभा
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