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अब शहरों से गुजरने वाली सड़कों के किनारे मिलेगी शराब

Thu, 24 Aug 2017 04:09 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
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supreme court
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाईवे के 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानों पर पाबंदी के आदेश का असर शहर की सड़कों पर नहीं पड़ेगा। शीर्ष अदालत ने कहा है कि अगर कोई हाईवे किसी शहर के बीच होकर गुजरता हो और उसे पुनर्वर्गीकरण किया जाता है तो इसमें कुछ गलत नहीं है।
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शीर्ष अदालत ने कहा है कि 31 दिसंबर का फैसला नेशनल और स्टेट हाईवे को ध्यान में रखते हुए दिया गया था। चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने अपने 11 जुलाई के आदेश को स्पष्ट करते हुए कहा कि शहर से होकर गुजरने वाली हाईवे यानी नगर निगम या नगरपालिका के तहत आने वाली सड़कों को पुनर्वर्गीकरण किया जाता है तो हाईवे के 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानों पर पाबंदी का आदेश प्रभावी नहीं होगा। यानी निगम या नगरपालिका के तहत आने वाली सड़कों पर बार, पब और शराब की दुकानों पर पाबंदी नहीं होगी।

पढ़ेंः- शराब बैनः सुप्रीम कोर्ट ने दी राहत, शहर के बीच गुजरने वाले हाईवे पर फिर से खुलेंगी दुकानें

11 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने एक गैर सरकारी संगठन द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें आरोप लगाया गया था कि हाईवे के 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानों पर पाबंदी के आदेश को धता बताने के लिए चंडीगढ़ की सड़कों को डीनोटिफाई किया गया था।
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चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने बुधवार को 11 जुलाई के फैसले को स्पष्ट करते हुए कहा कि अगर शहर के भीतर की सड़कों (स्टेट व नेशनल हाईवे) का अगर पुनर्वर्गीकरण किया जाता है तो इसमें कुछ गलत नहीं है।

गत 16 मार्च को केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ ने एक अधिसूचना जारी कर शहर के भीतर से होकर गुजरने वाली 12 हाईवे के विस्तार को डीनोटिफाई कर दिया था। इन सड़कों को ‘मुख्य जिला सड़क’ का दर्जा दिया गया। इस निर्णय से इन सड़कों के 500 मीटर के दायरे में स्थित शराब की दुकानें शीर्ष अदालत के आदेश के दायरे से बाहर हो गईं।

पढ़ेंः- शराबबंदी: न खिसकी दुकान, न खिसका हाईवे, फिर भी दूरी हुई 500 मीटर से ज्यादा

इस अधिसूचना को ‘अराइव सेफ इंडिया’ नामक एनजीओ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी थी लेकिन वहां से राहत न मिल पाने के कारण उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में कहा गया था कि चंडीगढ़ प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निष्प्रभावी बनाने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया है। याचिका में इस अधिसूचना को अवैध करार देने की गुहार की गई थी।
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