हालांकि उस वक्त सोनिया गांधी ने गठबंधन को बचाकर रखने में अपनी अहम भूमिका निभाई। तब भी ममता बनर्जी मुखर थीं, लेकिन उन्होंने अपनी नाराजगी के बावजूद राहुल गांधी के नेतृत्व में गठबंधन से पूरी तरह किनारा नहीं किया। जानकारों का कहना है कि ममता 'दीदी' को भतीजे राहुल से भले ही गुरेज हो, लेकिन 'भाभी' यानी सोनिया गांधी से लगाव है। वजह, स्व: पीएम राजीव गांधी, ममता बनर्जी को अपनी छोटी बहन मानते थे। ममता बनर्जी और सोनिया गांधी के बीच स्नेहभाव रहा है।
बता दें कि बिहार के पूर्व सीएम एवं केंद्रीय मंत्री रहे लालू यादव ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के समर्थन में एक बयान दे दिया है। इसके बाद इंडिया गठबंधन की एकता को लेकर सवाल उठने लगे। यादव ने कहा है कि ममता बनर्जी को इंडिया गठबंधन का नेतृत्व दिया जाना चाहिए। कांग्रेस ने जब इस पर आपत्ति जताई तो लालू यादव ने कहा, इसका कोई मतलब नहीं है। हम ममता बनर्जी का समर्थन करेंगे। इस बयान पर शिवसेना-यूबीटी के सांसद संजय राउत ने कहा, इस बारे में इंडिया ब्लॉक में चर्चा चल रही है। इसमें सिर्फ कांग्रेस नहीं है, दूसरी भी पार्टियां हैं। राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से हमारे मधुर संबंध हैं। कांग्रेस के ज्यादा सांसद चुन कर आए हैं। ऐसे में सबको साथ में बैठकर नेतृत्व के बारे में चर्चा करनी चाहिए। राहुल गांधी के नेतृत्व पर कोई सवाल नहीं उठा रहा है। राहुल गांधी हमारे नेता हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ देश में जो माहौल बना है, उसमें राहुल गांधी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
इससे पहले संसद सत्र की शुरुआत में इंडिया गठबंधन की एकता खंडित नजर आ रही थी। तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने लोकसभा में अडानी मुद्दे पर कांग्रेस के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शन का हिस्सा नहीं बनने का निर्णय लिया था। ममता बनर्जी की पार्टी के सांसदों ने अडानी विवाद को ज्यादा प्राथमिकता नहीं दी। टीएमसी के सांसदों का तर्क था, संसद सत्र का उपयोग बेरोजगारी, मूल्य वृद्धि और केंद्र द्वारा विपक्षी शासित राज्यों के खिलाफ धन आवंटन में कथित भेदभाव जैसे मुद्दों को उठाने के लिए किया जाना चाहिए। लोकसभा सत्र में प्रश्नकाल के दौरान, सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 'संभल' हिंसा का मुद्दा उठाया। यादव ने कहा था, यह बहुत गंभीर मामला है। पांच लोगों की जान चली गई है।
लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और टीएमसी ने अलग अलग चुनाव लड़ा था। इसके चलते दोनों दलों के बीच दूरी बढ़ती चली गई। जून 2023 से लेकर अब तक इंडिया गठबंधन की सिर्फ पांच बैठकें हुईं हैं। इनमें से तीन बैठकें ऐसी थीं, जिनमें इंडिया गठबंधन के सभी सहयोगी एकसाथ नजर आए थे। बाकी की दो बैठकों में कई पार्टियों के नेताओं ने इंडिया गठबंधन से दूरी बना ली। महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के विधानसभा चुनाव के प्रचार में भी गठबंधन के सभी नेता सक्रिय नहीं दिखाई दिए। हरियाणा में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का गठबंधन नहीं हो सका। जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती भी अलग-थलग हो गईं। नीतीश कुमार भी इंडिया गठबंधन से बाहर होकर भाजपा के सहयोगी बन गए।
जेडीयू नेता केसी त्यागी कहते हैं, इंडिया गठबंधन की मौजूदा स्थिति ऐसी है कि आने वाले समय में ये सभी सहयोगी दल, एक दूसरे के खिलाफ ही चुनाव लड़ते हुए नजर आएं। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की सीट क्या बढ़ गई, सहयोगी दलों का महत्व ही कम हो गया। ममता दीदी तो जातिगत जनगणना के खिलाफ हैं, जबकि राहुल इसे अपना प्रमुख एजेंडा बनाए हुए हैं। गठबंधन की बैठकों में कांग्रेस के कर्मचारी तक आने लगे थे। दूसरे दलों से कहा गया कि वे एक दो नेताओं को ही बैठक में भेजें। सच यह था कि गठबंधन को खड़ा करने के लिए नीतीश कुमार ने कड़ी मेहनत की थी। उसके बाद कांग्रेस पार्टी ने सभी सहयोगियों को भरोसे में नहीं लिया। कांग्रेस की सोच है कि ये सहयोगी दल, थक हार कर हमारे पास ही आएंगे।
लोकसभा चुनाव से पहले भी पश्विम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के एक बयान ने 'इंडिया गठबंधन' की बड़ी दरार को सार्वजनिक कर दिया था। ममता ने कहा था, उनकी पार्टी अकेले ही लोकसभा चुनाव लड़ेगी। इसे इंडिया गठबंधन के लिए बड़ा झटका माना गया। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने ममता बनर्जी को अहंकारी और बेईमान कहा था। तब सोनिया और राहुल ने कुछ नहीं कहा। इतना ही नहीं, चौधरी ने यह भी कह दिया था कि जिन लोगों की वजह से वे (ममता बनर्जी) नेता बनी हैं, उन्हीं को आज अहंकार दिखा रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि ममता और भाजपा के बीच सांठगांठ हो चुकी है। वो पीएम मोदी को धोखा नहीं देंगी। इतना कुछ होने पर भी ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी और राहुल के प्रति कठोर शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया।
पूर्व प्रधानमंत्री स्व: राजीव गांधी के समय से ही ममता बनर्जी और सोनिया गांधी के बीच मधुर संबंध रहे हैं। राजीव गांधी उन्हें अपनी छोटी बहन मानते थे। उन्होंने ममता दीदी को यूथ कांग्रेस के महासचिव पद की जिम्मेदारी सौंपी थी। बाद में उन्हें मंत्री बनाया और मुसीबत के वक्त उनका साथ भी दिया। नब्बे के दशक में जब ममता पर बेरहमी से हमला किया गया तो राजीव गांधी ने उनके इलाज की व्यवस्था की थी। वे कई दिनों तक वुडलैंड्स अस्पताल में भर्ती रहीं। गांधी परिवार ने उनकी खूब देखभाल की। इसके बाद उनके रिश्ते और ज्यादा मजबूत हो गए। राजीव गांधी की हत्या के बाद 1996 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ी थी। इसके बाद भी सोनिया के साथ उनके रिश्ते कायम रहे। कई अवसरों पर देखा गया है कि पार्टी के बयानों से हटकर सोनिया और ममता, एक दूसरे का सम्मान करती रही हैं। पिछले साल कांग्रेस और टीएमसी के बीच जो तनातनी देखी गई, उससे पुराने रिश्तों में खटास आने की शुरुआत हो गई थी।
कांग्रेस से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी बताते हैं, अगर सोनिया गांधी, सीधे ममता से बात करतीं तो मामला इतना नहीं बिगड़ता। राजीव गांधी के निधन के बाद ममता और गांधी परिवार के बीच रिश्तों में उतनी तल्लखी नहीं आई थी। वजह, सोनिया गांधी बीच बचाव कर मामला संभाल लेती थी। 2019 के लोकसभा चुनाव और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के बाद, रिश्तों की दूरी बढ़ती चली गई। खरगे को पार्टी की कमान सौंपने के बाद सोनिया गांधी की राजनीतिक सक्रियता कम हो गई।
ममता बनर्जी पर जब अधीर रंजन चौधरी ने तीखी टिप्पणी की तो उस पर सोनिया या राहुल की तरफ से खंडन नहीं आया। कांग्रेस पार्टी की राजनीति को करीब से समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक रशीद किदवई कहते हैं, ये बात ठीक है कि सोनिया गांधी ने पहले भी विपक्ष को एक साथ लेकर चलने की कोशिश की है। वे इसी प्रयास में लगी रही कि एक समान विचारधारा वाले सभी दल साथ आ जाएं। साल 2004 की राजनीतिक परिस्थितियों में विपक्ष पूरी तरह बिखरा हुआ था। उस वक्त सोनिया गांधी ने विपक्ष को एकत्रित किया था। उसके बाद लगातार दस साल केंद्र में यूपीए की सरकार रही। साल 2014 में राजनीतिक स्थिति बदल गई। पॉलिटिक्स में नए प्लेयर आ गए। अब सोनिया गांधी का वैसा राजनीतिक प्रभाव भी नहीं रहा। हालांकि वे प्रयासों में लगी हैं। उनकी रणनीति सटीक है।
उन्होंने मल्लिकार्जुन खरगे को पार्टी अध्यक्ष बनाकर न केवल अपनी पार्टी के भीतर के असंतोष को शांत किया, बल्कि विपक्ष को भी एक संदेश दे दिया। विपक्ष के जो नेता किसी कारणवश राहुल गांधी को पसंद नहीं करते, मगर वे खरगे के साथ बातचीत करने में सहजता महसूस करने लगे। अब भी कई ऐसे नेता हैं, जिन्हें खरगे या राहुल की बजाए, सोनिया गांधी पर भरोसा है, वे वहां जाकर अपनी रख सकते हैं। ममता बनर्जी और सोनिया के बीच हमेशा से सौहार्दपूर्ण संबंध रहा है। अब देखना है कि मौजूदा समय में सोनिया गांधी, ममता बनर्जी व गठबंधन के दूसरे नेताओं को मनाने में कितनी कामयाब हो पाती हैं।