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Rahul Gandhi: क्या विपक्ष का चेहरा बनने में सफल होंगे राहुल गांधी? कौन बनेगा राह का रोड़ा

सार

Rahul Gandhi: राजनीतिक पंडित मानते हैं कि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को मिली जीत ने भी कांग्रेस की जरूरत को स्पष्ट कर दिया है। यदि इस साल होने वाले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और कर्नाटक के चुनावों में कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करती है तो राहुल गांधी की 2024 की दावेदारी को और ज्यादा मजबूती मिल जाएगी
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Rahul Gandhi - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की भारत जोड़ो यात्रा (Bharat Jodo Yatra) तीन जनवरी से फिर शुरू होने वाली है। लगभग 2800 किलोमीटर की यात्रा के बाद अब अगले चरण में राहुल गांधी पंजाब और जम्मू-कश्मीर में लोगों से जुड़ने की कोशिश करेंगे। इसके पहले वे 2020 में दंगों के शिकार हुए उत्तर-पूर्वी दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों से गुजरेंगे और पीड़ित परिवारों का दर्द समझने की कोशिश करेंगे। इस यात्रा ने राहुल का कद अचानक बड़ा कर दिया है। अभी से इस बात के संकेत मिलने लगे हैं कि जो विपक्ष 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के नाम पर एकजुट होने से कतराता था, अब वह कांग्रेस को साथ लेकर मैदान में उतरने की बात सोच रहा है। क्या राहुल गांधी विपक्ष का चेहरा बनने में कामयाब रहेंगे?

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अश्विन कुमार ने अमर उजाला से कहा कि केवल कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जो पूरे देश में हर जगह अपनी उपस्थिति रखती है। केंद्र की सत्ता में दो बार प्रचंड शक्ति के साथ सत्ता में पहुंचने के बाद भी भाजपा अभी देश के हर हिस्से तक नहीं पहुंच पाई है। कमजोर हालत में भी कांग्रेस को पूरे देश में वोट मिलते हैं और देश के हर कोने से उसके विधायक-सांसद चुने जाते हैं। कांग्रेस के इस राजनीतिक महत्त्व को विपक्ष भी समझता है और भाजपा भी। यही कारण है कि भाजपा के निशाने पर सबसे ज्यादा वही रहती है।

विपक्ष में नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, शरद पवार और अरविंद केजरीवाल जैसे कई बड़े नेता मौजूद हैं, लेकिन इनमें कोई भी नेता एक-दो राज्यों से ज्यादा में अपनी उपस्थिति नहीं रखता। विपक्ष इनके चेहरे पर पूरे देश में चुनाव लड़ने की बात नहीं सोच सकता। जबकि कांग्रेस की पूरे भारत में उपस्थिति है और राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, कर्नाटक और तेलंगाना में वह मजबूत स्थिति में है। यदि कांग्रेस के साथ पूरा विपक्ष इन राज्यों में मजबूत लड़ाई लड़े तो वह इन राज्यों में भाजपा के सामने एक मजबूत चुनौती पेश कर सकता है।

चेहरा और मुद्दा महत्त्वपूर्ण

राजनीतिक विश्वेषक सुनील पांडेय ने अमर उजाला से कहा कि भारत में चुनाव अकसर चेहरे पर आकर ठहर जाते हैं। लोग मुद्दों से ज्यादा चेहरे को महत्त्व देते हैं। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव इस बात के बड़े प्रमाण हैं कि देश की जनता मुद्दों से ज्यादा चेहरे को अहमियत देती है। ऐसी परिस्थिति में यदि विपक्ष मोदी के सामने कोई मजबूत चेहरा पेश करने में सफल रहता है तो उसकी राह कुछ आसान हो सकती है।

इस समीकरण पर विपक्षी खेमे में राहुल गांधी को छोड़कर कोई दूसरा बड़ा नेता इस समय मौजूद नहीं है, जो विपक्ष की ओर से चेहरे के रूप में पेश किया जा सके। नीतीश कुमार और अरविंद केजरीवाल एक लोकप्रिय चेहरे हैं और उनकी अपनी उपलब्धियां भी हैं, लेकिन उनके नाम पर पूरे देश में वोट नहीं मांगे जा सकते। साथ ही दूसरे दलों की ओर से इन्हें राष्ट्रीय चेहरे के तौर पर स्वीकार करने में भी परेशानी हो सकती है। जबकि कांग्रेस की हर राज्य में उपस्थिति और एक चेहरे के तौर पर लोगों के बीच पहचाने जाने के कारण एक समझौते के तहत राहुल गांधी को चेहरा बनाकर चुनावी लड़ाई में उतरा जा सकता है।

राजनीतिक पंडित मानते हैं कि भारत जोड़ो यात्रा ने राहुल गांधी की छवि को मजबूत करने का काम किया है। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को मिली जीत ने भी कांग्रेस की जरूरत को स्पष्ट कर दिया है। यदि इस साल होने वाले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और कर्नाटक के चुनावों में कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करती है तो राहुल गांधी की 2024 की दावेदारी को और ज्यादा मजबूती मिल जाएगी।

ये हैं चुनौतियां

हालांकि, राहुल गांधी को एक नेता के तौर पर स्वीकार करने में सबसे बड़ा रोड़ा विपक्ष के दूसरे दावेदारों की तरफ से ही आ सकता है। इसमें नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और केजरीवाल के साथ-साथ तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर भी हो सकते हैं। लेकिन जिस तरह नीतीश कुमार ने जमीनी स्थिति को देखते हुए राहुल गांधी के नाम पर अपनी सहमति दिखाने के संकेत दिए हैं, अन्य नेताओं को भी इस राह पर लाया जा सकता है। इसकी कोशिश विपक्ष के शरद पवार जैसे कद्दावर नेताओं के सहारे की जा सकती है, जो पहले भी कांग्रेस के बिना राष्ट्रीय स्तर पर कोई बड़ा गठबंधन बनने की संभावना से इनकार कर चुके हैं। चूंकि भाजपा 2024 को लेकर पहले ही अपने पत्ते फैंकना शुरू कर चुकी है, विपक्ष के लिए जरूरी है कि बिना समय गंवाए वह एक मंच पर आकर अपनी रणनीति बनाए और उस पर अमल करे।

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