कूटनीति के जानकार मौजूदा समय को भारत-चीन संबंध के लिहाज से काफी मुश्किल भरा मान रहे हैं। चीन ने डोकलाम से लेकर अरुणाचल तक सीमा को काफी दबाव बना रखा है। डोकलाम में पिछले साल चीन की सेना के आ धमकने के बाद सामान्य स्थिति को बनाने के लिए भारतीय राजनयिकों को तीन दर्जन से अधिक बैठके करनी पड़ी। दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा राष्ट्रपति शी जिनपिंग को आगे आना पड़ा।
इस दौरान चीन ने भारत को खुले तौर पर युद्ध की धमकी भी दी। अरुणाचल को लेकर चीन का सख्त रूख बना हुआ है। चीन 2013 में भारत के साथ बने सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए हुए बार्डर डिफेंस कोआपरेशन एग्रीमेंट को अमल में लाने में संकोच कर रहा है। दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए कई दर्जन बैठकों के दौर के बाद भी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं है। द्विपक्षीय व्यापार में लगातार असंतुलन का बढऩा, पाकिस्तान के आर्थिक गलियारे के विकास की चीन की योजना, वन बेल्ट वन रोड पर उसकी आक्रामकता को लेकर देश में मतभेद बना हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर
अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन के साथ अडंगा लगाने से बाज नहीं आता। पाकिस्तान के आतंकी संगठनों पर नकेल कसने के मामले में वह भारत के रूख के सामानांतर रुख अपनाता है। एनएसजी की सदस्यता को लेकर वह भारत का खुलकर सहयोग नहीं करता और पाकिस्तान को इसका सदस्य बनाने की वकालत करता है। भारत के पड़ोसी देशों में वह पैठ बढ़ा रहा है और मालदीव समेत अन्य देशों में भारत विरोधी गुट को समर्थन देता है। चीन एससीओ में भी भारत के मुकाबले पाकिस्तान को अहम दर्जा देने का प्रयास करता रहता है।
यह स्थिति तब है जब भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स जैसे फोरम के अहम सदस्य हैं। भारत, रूस, चीन के बीच में त्रिकोणीय संबंध को संतुलित करने के लिए आरआईसी मंच सक्रिय है। रूस भारत का मजबूत, विश्वसनीय सामरिक साझीदार देश है और भारत तथा चीन के बीच में समय-समय पर रिश्तों में संतुलन लाने में सहयोगी बना रहता है।
प्रधानमंत्री मोदी की चुनौती
कूटनीति के जानकारों के अनुसार मौजूदा समय में भारत और चीन के बीच में रिश्तों का संतुलन सबसे बड़ी चुनौती है। चीन अपनी तुलना अमेरिका के समकक्ष कर रहा है। वहीं राष्ट्रपति शी जिनपिंग का चीन और पूरी दुनिया में लगातार प्रभाव बढ़ रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी चीन को अमेरिका, उत्तरी कोरिया तथा दक्षिणी कोरिया के बीच में रिश्तों के संतुलन के लिए काफी अहम मान रहे हैं। इसके सामानांतर चीन के राष्ट्रपति शी और रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के बीच बन रही सहमति माने रखती है। इन तमाम परिदृश्यों के बीच में चीन एशिया, दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। चीन के रणनीतिकारों को भारत चीन के रास्ते में सबसे बड़ा अवरोध बनकर खड़ा दिखाई देता है। ऐसे में सीमा पर शांति, द्विपक्षीय व्यापार असुंतलन में कमी तथा बन बेल्ट वन रोड पर टकराव टालना एक बड़ी चुनौती है।