फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

क्या विपक्षी ताकत पर चोट मारेगा 'कोरोना', अब कैसे चलेंगे कंधे से कंधा मिलाकर

Fri, 08 May 2020 05:45 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • कोरोना वायरस के कारण राजनीतिक आंदोलनों की रूपरेखा बदल जाएगी
  • सत्ता पक्ष को अब वह डर नहीं रहेगा कि विपक्षी कब क्या 'बवाल' कर दे
  • धरना, आंदोलन ने होने से सत्ता पक्ष को अपनी आलोचना का अहसास नहीं हो पाएगा
विज्ञापन
Anna Movement - फोटो : Amar Ujala
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

कोरोना वायरस, लोगों की जिंदगी में कई बड़े बदलाव लाने ला रहा है। अर्थव्यवस्था बदलेगी, शहरों और गांवों में काम करने का स्टाइल बदल जाएगा। परिवहन और सामाजिकता के क्षेत्र में कई अहम परिवर्तन देखने को मिलेंगे। ऐसे में राजनीतिक सिस्टम भी इससे अछूता नहीं रहेगा।

विज्ञापन

जेएनयू में समाजशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर और राजनीति के जानकार डॉ. आनंद कुमार कहते हैं कि कोरोना ने बहुत कुछ बदल दिया है। अब पता नहीं वह दौर कब लौटेगा, जिसमें कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष का बिगुल फूंका जाता था।

सामाजिक दूरी यानी सोशल डिस्टेंसिंग के चलते निश्चित तौर पर इसका महत्व घट जाएगा। खुले जन-हस्तक्षेप की अवधारणा बदलेगी। सत्ता पक्ष को अब वह डर नहीं रहेगा कि विपक्षी कब क्या 'बवाल' कर दे। मजदूरों और किसानों के संगठनों की पदयात्राएं कैसे निकलेंगी। कोरोना की वजह से लोकतंत्र में विरोध का तरीका ही बदल जाएगा।

हालांकि सूचना और संवाद का महत्व बना रहेगा

डॉ. आनंद कुमार का कहना है कि कोरोना अलग-अलग तरीकों से लोगों के जीवन पर प्रभाव डालेगा। संघर्ष, किसी संगठन का हो या राजनीतिक दल का, उसमें सदैव कंधे से कंधा मिलाकर चलने की भावना सबसे अहम होती थी।

विज्ञापन


रैली, प्रदर्शन या पदयात्रा, ये सब खुले जनहस्तक्षेप के प्रभावी माध्यम रहे हैं। अपने पक्ष को रखने की ये एक खास शैली होती है। कोरोना के बाद लंबे समय तक ये सब शायद ही देखने को मिले। हालांकि सूचना और संवाद का महत्व बना रहेगा, लेकिन माध्यम बदल जाएंगे।

ऐसे में मीडिया की भूमिका बढ़ेगी। सोशल मीडिया भी रहेगा, लेकिन उस पर लोग कम भरोसा करते हैं। पहले यही होता रहा है कि कोई मांग पूरी न होने के कारण लोग कहीं पर एकत्रित होते और बवाल करने लगते।

चाहे मस्जिद तोड़ना रहा हो या किसानों का दिल्ली में हल्ला बोल। किसान पंचायत कह देती थी कि जब तक मांग पूरी नहीं होगी, तब तक हम यहां से नहीं हिलेंगे। ये कंधे से कंधा मिलाने का ही उदाहरण है। कहीं पर सचिवालय घेरा तो कहीं विधानसभा।

संसद का घेराव करने का भी प्रयास होता होता रहा है। इसी वजह से बहुत लोग संसदीय प्रणाली को भीड़तंत्र भी कह देते थे। अब सोशल डिस्टेंसिंग उन्हें यह सब नहीं करने देगी। होगा तो बहुत कड़े नियम व शर्तों के साथ।

विज्ञापन

Prof. Anand Kumar - फोटो : Amar Ujala

सामाजिकता की परिभाषा भी बदल सकती है... 

हमारे देश में तो मिलना-जुलना एक जोशीला काम माना जाता रहा है। ब्याह शादी हो या कोई दूसरा समारोह, हर व्यक्ति उसमें शिरकत कर एक दूसरे का हालचाल जानने का प्रयास करता है। एक व्यक्ति का दूसरे के प्रति आकर्षण बना रहता है।

कॉफी हाउस कल्चर भी इसी सामाजिकता का हिस्सा रही है। नुक्कड़ समाज को हम कैसे छोड़ सकते हैं, लेकिन कोरोना के बाद जो बदलाव होंगे, उनमें ये सब बातें पिंघल जाएंगी। लोग इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के जरिए एक दूसरे की बात जानने का प्रयास करेंगे।

इसमें मीडिया की भूमिका अहम रहेगी, लेकिन उस पर अभी से सवालिया निशान लगने लगे हैं। वह बिना किसी पक्षपात के सूचना दे, यह एक बड़ी चुनौती है।

सामाजिकता के चलते सड़क रोको, रेल रोको या फलां बिल्डिंग का घेराव करो, ये सब बातें आंदोलन का हिस्सा रही हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर रोजाना होने वाले प्रदर्शन कैसे होंगे। रामलीला मैदान में रैली करना मुश्किल हो जाएगा।

विपक्ष की आवाज दबेगी, सत्ता पक्ष को आलोचना का पता कैसे चलेगा

डॉ. कुमार बताते हैं कि मजदूरों का संगठन गेट मीटिंग कर रहा है या किसानों की पदयात्रा चल रही है, ये सब सरकार के कान खोल देते थे। सत्ता पक्ष को अपनी आलोचना का अहसास हो जाता था। अब ये सब उतनी आसानी से संभव नहीं हो पाएगा। विपक्ष की आवाज दबेगी।

उसे खुले तौर पर अपनी बात कहने का मौका नहीं मिलेगा। सदन में अपनी बात कहे या मीडिया में आकर बोले, विपक्ष के पास ये ही माध्यम बचेंगे। यदि मीडिया अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाता है तो सत्ता पक्ष को अपनी आलोचना का पता नहीं चलेगा।

इस स्थिति में तकनीक का महत्व बढ़ेगा। स्क्रीन पर ही अधिक भरोसा करना होगा। मनुष्यों के बीच संवाद प्रक्रिया जारी रहेगी, लेकिन वह आमने सामने की नहीं होगी। आपस में मिलकर बात रखने की परंपरा आगे जारी रह पाएगी या नहीं, कहना बड़ा मुश्किल है।

लोकतंत्र में विरोध का तरीका बदल जाएगा।जब एक तरफ रोजाना ये खबरें आएंगी कि कोरोना से बचने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग जरूरी है तो लोग कैसे किसी आंदोलन का हिस्सा बनेंगे।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें