सुप्रीम कोर्ट ने भले ही आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के कमरे में बैठने का अधिकार दे दिया है, मगर साथ ही उन पर 'किन्तु-परन्तु' भी लगा दिए हैं। अब बड़ा सवाल यह है कि आलोक वर्मा की बहुत छोटी वापसी के दौरान क्या 'राफेल' सीबीआई में लैंड कर पाएगा या नहीं। वर्मा की रिटायरमेंट में अब तीन सप्ताह ही शेष बचे हैं। उन्हें इस कार्यकाल में कितनी शक्तियां मिलेंगी, यह फैसला पीएम, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की सेलेक्ट कमेटी करेगी। यही समिति तय करेगी कि आलोक वर्मा पद पर बने रहेंगे या नहीं। उधर, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक बार दोहराया कि आलोक वर्मा को 'राफेल' मामले के चलते रात को हटाया गया था। वर्मा इस मामले की जांच शुरु कराने वाले थे।
कांग्रेस पार्टी जो कि शुरू से ही आलोक वर्मा के केस को राफेल से जोड़कर चल रही है, ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही केंद्र सरकार पर हमला बोल दिया। पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने पांच राज्यों के चुनाव में भी यह मुद्दा उठाया था। उन्होंने अपनी रैलियों और जनसभाओं में कहा था कि सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा राफेल के केस को आगे बढ़ाना चाहते थे। उन्होंने राफेल की फाइलें अपने पास मंगवा ली थी।
सरकार को जैसे ही यह भनक लगी कि वर्मा राफेल मामले पर जांच शुरु करा सकते हैं, उन्हें रात को छुट्टी पर भेज दिया गया। बाद में कई दूसरी राजनीतिक पार्टियों ने भी इस मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरने का प्रयास किया था।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निदेशक आलोक वर्मा को बहाल किया जाना प्रधानमंत्री पर सीधे कलंक लगना है। मोदी सरकार ने हमारे देश के सभी संस्थानों तथा लोकतंत्र को बर्बाद कर दिया है। उन्होंने सवाल किया है कि क्या सीबीआई निदेशक को आधी रात को गैरकानूनी तरीके से राफेल घोटाले की जांच रोकने के लिए नहीं हटाया गया, जो सीधे प्रधानमंत्री तक जाती है।
राफेल तय करेगा वर्मा को पिंजरे का तोता बनाकर रखा जाए या...
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद खासतौर पर, कांग्रेस पार्टी की ओर से जिस तरह की राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, उससे देखकर लगता है कि आलोक वर्मा को लेकर सेलेक्ट कमेटी में भी खूब माथापच्ची होगी। कांग्रेस पार्टी और आम आदमी पार्टी तो पहले से ही यह दावा करती रही हैं कि राफेल के चलते ही वर्मा को छुट्टी भेजा गया था। नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी इस मामले में आलोक वर्मा का पक्ष कमेटी में मजबूती के साथ रखने का इशारा कर चुके हैं।
कमेटी के अन्य सदस्यों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई हैं। खड़गे ने पहले भी प्रेसवार्ता कर कहा था कि सरकार ने वर्मा को छुट्टी पर भेजने से पहले उनका केस सेलेक्ट कमेटी के पास भेजना चाहिए था। यह बात अब साफ हो गई है कि वर्मा को सभी शक्तियां वापस मिलती हैं तो वे राफेल का केस उठा सकते हैं।
हालांकि कानूनी जानकारों का मानना है कि सेलेक्ट कमेटी वर्मा को उनकी रिटायरमेंट तक पद पर बने रहने का आदेश दे सकती है, लेकिन उनकी स्थिति पिंजरे के तोते ही तरह रहेगी। मतलब, उन्हें नीतिगत फैसले का लेने का अधिकार नहीं मिलेगा। वकील प्रशांत भूषण, जिन्होंने यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी के साथ मिलकर आलोक वर्मा को राफेल मामले की शिकायत दी थी, का कहना है कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि वर्मा को नीतिगत फैसले लेने से रोका जाए।