भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने गुरुवार को कहा कि समय की कमी के कारण नवंबर में सेवानिवृत्त होने तक उन्हें उपयुक्त आवास नहीं मिल पाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि नियमों के तहत निर्धारित समय सीमा के भीतर वे अपना सरकारी आवास निश्चित रूप से खाली कर देंगे।
9 अगस्त को सेवानिवृत्त होने वाले निवर्तमान न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया को विदाई देते हुए मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में उन्हें एक सहृदय व्यक्ति बताया, जिन्होंने अपना पूरा जीवन न्यायपालिका को समर्पित कर दिया।
'न्यायमूर्ति धूलिया अपनी सेवानिवृत्ति के एक दिन बाद अपना सरकारी आवास खाली कर देंगे'
वरिष्ठ वकीलों और उनके परिवार के सदस्यों के अलावा शीर्ष न्यायालय और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायमूर्ति धूलिया अपनी सेवानिवृत्ति के एक दिन बाद अपना सरकारी आवास खाली कर देंगे। उन्होंने कहा, 'हम न्यायपालिका में उनके योगदान को हमेशा याद रखेंगे। सेवानिवृत्ति के बाद वह दिल्ली में रहेंगे। वह उन न्यायाधीशों में से एक होंगे जो तुरंत यानी अपनी सेवानिवृत्ति के अगले दिन आवास खाली कर देंगे।
अगस्त में न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने आधिकारिक आवास खाली किया
यह टिप्पणी इसलिए लोगों का ध्यान खींच रही है, क्योंकि एक महीने पहले सर्वोच्च न्यायालय प्रशासन ने केंद्र सरकार को दिल्ली के कृष्ण मेनन मार्ग पर स्थित भारत के मुख्य न्यायाधीश के आधिकारिक आवास को खाली करने के लिए पत्र लिखा था। इसमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के तय अवधि से अधिक समय तक वहां रहने का जिक्र किया गया था। हालांकि, इससे पहले अगस्त में न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने न्यायपालिका के प्रमुख का आधिकारिक आवास खाली कर दिया था।
न्यायमूर्ति धूलिया ने एक बहुत अच्छी मिसाल कायम की
अपनी और न्यायमूर्ति धूलिया की स्थिति का जिक्र करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा, 'दरअसल, यह दुर्लभ है। काश मैं भी 24 नवंबर तक ऐसा कर पाता। मुझे उपयुक्त घर ढूंढ़ने का समय नहीं मिलेगा, लेकिन मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि नियमों के अनुसार जो भी समय मिलेगा, मैं उससे पहले ही वहां शिफ्ट हो जाऊंगा। हालांकि, न्यायमूर्ति धूलिया ने एक बहुत अच्छी मिसाल कायम की है। मुझे यकीन है कि हममें से कई लोग उनका अनुकरण कर सकते हैं।'
न्यायमूर्ति धूलिया के अहम फैसले
- न्यायमूर्ति धूलिया सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों में शामिल रहे हैं, जिनमें कर्नाटक का हिजाब प्रतिबंध मामला भी शामिल है, जिसमें उन्होंने बहुमत के फैसले से असहमति जताई थी। उन्होंने कहा था कि राज्य के स्कूलों और कॉलेजों में कहीं भी हिजाब पहनने पर कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए।
- जब वक्ताओं ने फैसले की सराहना की, तो न्यायमूर्ति धूलिया ने कहा, 'मैं आपको बता दूं कि मैं हिजाब का बचाव नहीं कर रहा था। मैं महिलाओं के हिजाब पहनने के विकल्प का बचाव कर रहा था। अगर मेरा कोई न्यायिक दर्शन है, तो मैं बस यही कह सकता हूं कि मेरा न्यायिक दर्शन यह है कि सब कुछ मनुष्य के इर्द-गिर्द है। जो कुछ भी मनुष्य के हित में है, वही मेरा न्यायिक दर्शन है।'
- इससे पहले अप्रैल में न्यायमूर्ति धूलिया की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने फैसला सुनाया था कि उर्दू भाषा का जन्म इसी धरती पर हुआ था। इसे 'गंगा जमुनी तहजीब' का सर्वोत्तम नमूना बताया था।
न्यायमूर्ति धूलिया के बारे में जानिए
न्यायमूर्ति धूलिया का जन्म 10 अगस्त, 1960 को हुआ था। उन्होंने देहरादून, इलाहाबाद और लखनऊ में स्कूली शिक्षा पूरी की। उन्हें 1 नवंबर, 2008 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया था। उन्होंने 9 मई, 2022 को शीर्ष न्यायालय में पदोन्नत होने से पहले उन्होंने 10 जनवरी, 2021 को गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी।