कामकाजी महिलाओं का स्वागत दुनिया ने कभी भी खुले हाथों से नहीं किया है। दुनिया की 500 बड़ी कंपनियों में महज 21 से 25 महिलाएं ही शीर्ष स्थानों पर हैं। अगर 197 राष्ट्रप्रमुखों पर भी नजर डालें तो महिलाओं की स्थिति नगण्य ही मिलेगी। किसी भी क्षेत्र में टॉप लेवल पर इतनी कम महिलाओं के होने का कारण महिलाओं का इस रेस से बहुत जल्दी बाहर होना है, जिसका सबसे बड़ा कारण महिलाओं का मां बनना है।
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पेशेवर महिलाएं चाहें जितना भी अच्छा कर रही हों लेकिन जैसे ही उनका परिवार बड़ा होने लगता है परिवार की पूरी जिम्मेदारियां महिलाओं के कंधों पर आ जाती है। जिसकी वजह से महज 8 सालों में 1.97 करोड़ महिलाओं ने नौकरी छोड़ दी है। और पूरी दुनिया में भारतीय कामकाजी महिलाओं का आंकड़ा पिछड़ रहा है। भारत नेपाल की कामकाजी महिलाओं के मुकाबले 30 फीसदी कम है जबकि चीन से 25 फीसदी, श्रीलंका से 8 फीसदी और बांग्लादेश से 20 फीसदी कम है।
महिलाओं का काम न करने का बहुत बड़ा कारण अवसर की कमी
कामकाजी महिलाओं की हो रही उपेक्षा
- फोटो : अमर उजाला
बदलते वक्त में भले ही खेल से लेकर बैंकिंग, इंजीनियरिंग, वैज्ञानिकों के रूप में इतिहास रच दिया हो लेकिन उनकी हैसियत और सम्मान में आज भी पिछड़ी हुई हैं। आज भी घरेलू जिम्मेदारी, काना बनाना और बच्चों की देखभाल से लेकर घर और परिवार की सारी जिम्मेदारी महिलाओं का ही काम नाना जाता है।
यानि महिलाएं दोहरी जिंदगी जीते जीते जब थक जाती हैं तो वो हार कर घर में दुबक जाती हैं। इन सबके बीच एक महिलाओं का काम न करने का बहुत बड़ा कारण अवसर की कमी, महिलाओं का मां बनने के दौरान दी जाने वाली छुट्टियों से लेकर उनकी सुरक्षा की कमी होना भी है।
सुषमा पिछले पांच सालों से एक नौकरी की तलाश में हैं। उन्हें नौकरी इसलिए नहीं दी जा रही है क्योंकि वो सीनियर हो चुकी हैं। वो 35 की उम्र को पार कर चुकी हैं। कुछ ऐसा ही हाल रचना, संध्या , रितिका भी बताती हैं। रितिका जब मां बनी तो उन्हें अपनी बच्ची की देखभाल करने के लिए नौकरी छोड़नी पड़ी थी लेकिन जब वो दुबारा नौकरी की खोज में निकलीं तो उन्हें न तो उतना वेतन देने के लिए कंपनियां आगे आईं और न हीं वो अपनी दूध पीती बच्ची के साथ दस से 12 घंटे घर के बाहर ही रह सकती थीं।
कामकाजी महिलाओं के जीवन में कई अड़चने आती हैं
कामकाजी महिलाएं
एसोचैम द्वारा कामकाजी महिलाओं पर की रिसर्च पर चौंकाने वाली बातें सामने आईं की शादी और परिवार की जिम्मेदारी में डोलती हुई करीब 40 फीसदी महिलाएं हर वर्ष काम छोड़ देती हैं। इसी रिपोर्ट में करीब 78 फीसदी कामकाजी महिलाओं में लाइफस्टाइल डिसॉर्डर है। 42 फीसदी पीठदर्द, मोटापा, डिप्रेशन, डायबिटीज, ब्लडप्रेशर से पीड़ित भी पाई गईं।
कामकाजी महिलाओं के जीवन में कई अड़चने आती हैं। महिलाओं के साथ हो रहे लैंगिक भेदभाव से लेकर यौन उत्पीड़न झेल के लिए महिलाएं अपनी मंजिल तक पहुंचती हैं लेकिन इन अड़चनों से परेशान होकर वो रेस छोड़ देती हैं। अमेरिकी रिसर्च दिखाते हैं कि पुरुषों को उनकी क्षमता जबकि महिलाओं को उनकी पूर्व उपलब्धियों के आधार पर प्रमोशन मिलते हैं।