डॉ. ओमप्रकाश बताते हैं, ये बात सही है कि लॉकडाउन 4.0 में पहले के मुकाबले अधिक छूट मिली हैं, तो लोग उनका गलत फायदा उठा रहे हैं। हवाई जहाज से बाहर निकलते ही सोशल डिस्टेंसिंग खत्म होने लगती है।
ट्रेन में सवार होने के बाद उसकी कोई परवाह नहीं करता। दूसरे पब्लिक ट्रांसपोर्ट का भी यही हाल है। श्रमिक स्पेशन ट्रेन से जब लोगों को क्वारंटीन सेंटर में ले जाया जाता है, तो वहां कोरोना संक्रमण के केस सामने आ रहे हैं।
अगर वहां से ओके रिपोर्ट मिल जाती है तो उसके बाद जब वे अपने घर पहुंचते हैं तो कई लोग कोरोना की चपेट में आ जाते हैं। इसका सीधा मतलब है कि लोगों ने कहीं न कहीं सुरक्षा चक्र तोड़ा है।
हमारे अस्पतालों की ओपीडी को ही लें। वहां मरीज आते हैं और हम उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग के हिसाब से बैठाते हैं। सड़क तक पूरी व्यवस्था की गई है, लेकिन लोगों को इतनी जल्दी होती है कि वे यह भूल जाते हैं, अभी कोरोना यहीं कहीं आसपास हो सकता है।
वे अपनी तय सीट पर नहीं बैठते, इधर-उधर घूमने लगते हैं। इसी तरह बाजारों का हाल देखिये, वहां भी सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल नहीं आ रहा है।
अगर हमें कोरोना से बचना है, तो खुद ही अपना ध्यान रखना होगा, इस बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ. ओम ने कहा, कोरोना से बचने के लिए हमें जो कुछ करना है, उसे अपने व्यवहार में शामिल करना होगा।
हमें यह मानकर चलना है कि कोरोना कहीं आसपास हो सकता है। सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क, कम से कम इन दो बातों का ख्याल रखना है। वैसे हमारे देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में लोग नियम तोड़ने को अपनी आदत बना लेते हैं।
पुलिस आकर उन्हें रास्ते पर ले लाए तो अलग बात है। लॉकडाउन पीरियड को लोगों ने एक कुंठा समझ लिया है। जब तक वह सख्ताई से लागू रहा, उसका पालन करते रहे। ढिलाई हुई तो उसे कुंठा मानकर उससे बाहर निकलने के छटपटाने लगे।
कोरोना से लड़ने के लिए लोगों को मजबूत इच्छाशक्ति दिखानी होगी। उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग की दीवार को गिराना नहीं है, बल्कि उसे मजबूती से खड़ा रखना है। मास्क लगाना है और साबुन से अच्छी तरह हाथ धोना।