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लॉकडाउन 4.0 में क्यों गिरने लगी सोशल डिस्टेंसिंग की दीवार, खुद लड़नी होगी कोरोना से आगे की लड़ाई

Wed, 27 May 2020 08:32 PM IST
Harendra Chaudhary डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

हर जगह सरकार नहीं होगी और न ही नियमों का कड़ाई का पालन कराने वाली पुलिस। जिस तरह सदियों से यह बात मानव व्यवहार में शामिल है कि पेट भरना है, अब वैसे ही सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क जैसी वस्तुओं को हमें अपनी दिनचर्या या व्यवहार में शामिल करना होगा...
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बाजार में उमड़ी भीड़ - फोटो : अमर उजाला (सांकेतिक)
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कोरोना जैसी वैश्विक महामारी अभी चरम पर नहीं पहुंची है, लेकिन उससे पहले लोग उन उपायों से दूर हटने लगे हैं, जिनकी मदद से कोरोना को मात दी जा सकती है। लॉकडाउन 4.0 खत्म नहीं हुआ है, मगर सोशल डिस्टेंसिंग की दीवार गिरने लगी है।

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मास्क को भी लोग पहले जितना उपयोगी नहीं मान रहे। मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास) के डॉक्टर ओमप्रकाश कहते हैं, लोगों को यह समझना होगा कि अब कोरोना से आगे की लड़ाई उन्हें खुद लड़नी होगी।

हर जगह सरकार नहीं होगी और न ही नियमों का कड़ाई का पालन कराने वाली पुलिस। जिस तरह सदियों से यह बात मानव व्यवहार में शामिल है कि पेट भरना है, अब वैसे ही सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क जैसी वस्तुओं को हमें अपनी दिनचर्या या व्यवहार में शामिल करना होगा।
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इन बातों को जितना जल्दी आत्मसात कर लेंगे, उतनी ही जल्दी कोरोना वायरस को हरा देंगे।

अधिक छूट का गलत फायदा

डॉ. ओमप्रकाश बताते हैं, ये बात सही है कि लॉकडाउन 4.0 में पहले के मुकाबले अधिक छूट मिली हैं, तो लोग उनका गलत फायदा उठा रहे हैं। हवाई जहाज से बाहर निकलते ही सोशल डिस्टेंसिंग खत्म होने लगती है।

ट्रेन में सवार होने के बाद उसकी कोई परवाह नहीं करता। दूसरे पब्लिक ट्रांसपोर्ट का भी यही हाल है। श्रमिक स्पेशन ट्रेन से जब लोगों को क्वारंटीन सेंटर में ले जाया जाता है, तो वहां कोरोना संक्रमण के केस सामने आ रहे हैं।

अगर वहां से ओके रिपोर्ट मिल जाती है तो उसके बाद जब वे अपने घर पहुंचते हैं तो कई लोग कोरोना की चपेट में आ जाते हैं। इसका सीधा मतलब है कि लोगों ने कहीं न कहीं सुरक्षा चक्र तोड़ा है।

हमारे अस्पतालों की ओपीडी को ही लें। वहां मरीज आते हैं और हम उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग के हिसाब से बैठाते हैं। सड़क तक पूरी व्यवस्था की गई है, लेकिन लोगों को इतनी जल्दी होती है कि वे यह भूल जाते हैं, अभी कोरोना यहीं कहीं आसपास हो सकता है।

वे अपनी तय सीट पर नहीं बैठते, इधर-उधर घूमने लगते हैं। इसी तरह बाजारों का हाल देखिये, वहां भी सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल नहीं आ रहा है।

अब खुद ही अपना ध्यान रखना होगा

अगर हमें कोरोना से बचना है, तो खुद ही अपना ध्यान रखना होगा, इस बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ. ओम ने कहा, कोरोना से बचने के लिए हमें जो कुछ करना है, उसे अपने व्यवहार में शामिल करना होगा।

हमें यह मानकर चलना है कि कोरोना कहीं आसपास हो सकता है। सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क, कम से कम इन दो बातों का ख्याल रखना है। वैसे हमारे देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में लोग नियम तोड़ने को अपनी आदत बना लेते हैं।

पुलिस आकर उन्हें रास्ते पर ले लाए तो अलग बात है। लॉकडाउन पीरियड को लोगों ने एक कुंठा समझ लिया है। जब तक वह सख्ताई से लागू रहा, उसका पालन करते रहे। ढिलाई हुई तो उसे कुंठा मानकर उससे बाहर निकलने के छटपटाने लगे।

कोरोना से लड़ने के लिए लोगों को मजबूत इच्छाशक्ति दिखानी होगी। उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग की दीवार को गिराना नहीं है, बल्कि उसे मजबूती से खड़ा रखना है। मास्क लगाना है और साबुन से अच्छी तरह हाथ धोना।

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ये सभी आदतें दिनचर्या का हिस्सा बनानी होंगी। अगर ये संभव हो जाता है तो आगे कोरोना की लड़ाई आसानी से जीत लेंगे।

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