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असम में एनआरसी की क्यों पड़ी जरूरत, देश के अन्य राज्यों में क्यों नहीं होता लागू

Mon, 30 Jul 2018 06:23 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गुवाहाटी
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अमर उजाला ग्राफिक्स
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असम में एनआरसी यानी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस ने अपनी फाइनल लिस्ट जारी की है। जिसमें 40 लाख लोगों को भारतीय नागरिकता नहीं मिली है। जबकि 2 करोड़ 89 लाख लोगों को एनआरसी ने भारतीय नागरिक माना है। इसके बाद अब राज्य के अल्पसंख्यकों में भय का माहौल है कि क्या उन्हें अब देश से बाहर भेजा जाएगा। आइए जानते हैं आखिर क्या है एनआरसी? और यह अन्य राज्यों में क्यों लागू नहीं होती है।
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क्या है एनआरसी? 

दरअसल नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) में जिनके नाम नहीं होंगे उन्हें अवैध नागरिक माना जाएगा। इसमें उन भारतीय नागरिकों के नामों को शामिल किया जा रहा है जो 25 मार्च 1971 से पहले असम में रह रहे हैं। उसके बाद राज्य में पहुंचने वालों को बांग्लादेश वापस भेज दिया जाएगा। एनआरसी उन्हीं राज्यों में लागू होती है जहां अन्य देश के नागरिक भारत में आ जाते हैं। एनआरसी की रिपोर्ट ही बताती है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं। बता दें कि 1947 में जब भारत पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो कुछ लोग असम से पूर्वी पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनकी जमीन असम में थी और लोगों का दोनों और से आना-जाना बंटवारे के बाद भी जारी रहा।

तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और अब बांग्लादेश से असम में लोगों का अवैध तरीके से आने का सिलसिला जारी रहा। इससे वहां पहले से रह रहे लोगों को परेशानियां होने लगीं। साथ ही राज्य की स्थिति दिन पर दिन बदल रही थी। जिसके बाद असम में विदेशियों का मुद्दा तूल पकड़ने लगा। तभी साल 1979 से 1985 के बीच 6 सालों तक असम में एक आंदोलन चला। तब यह सवाल उठा कि यह कैसे तय किया जाए कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन विदेशी।
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असम समझौता

इसके बाद 15 अगस्त 1985 को आसू (ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन) और दूसरे संगठनों के साथ भारत सरकार का समझौता हो गया। इसे असम समझौते के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के तहत ही 25 मार्च 1971 के बाद असम आए लोगों की पहचान की जानी थी। इसके बाद उन्हें वापस भेजा जाना तय हुआ। आसू ने 1979 में असम में अवैध तरीके से रह रहे लोगों की पहचान और उन्हें वापस भेजे जाने के लिए एक आंदोलन की शुरुआत की थी। असम समझौते के बाद आंदोलन से जुड़े नेताओं ने असम गण परिषद नाम के राजनीतिक दल का गठन कर लिया जिसने राज्य में दो बार सरकार भी बनाई।

2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1951 के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप को अपडेट करने का फैसला किया। उन्होंने तय किया कि असम समझौते के तहत 25 मार्च 1971 से पहले असम में अवैध तरीके से भी दाखिल हो गए लोगों का नाम नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजनशिप में जोड़ा जाएगा। लेकिन यह विवाद सुलझने की बजाय बढ़ता गया। इसके बाद यह मामला कोर्ट पहुंच गया। इसके बाद साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में आईएएस अधिकारी प्रतीक हजेला को एनआरसी अपडेट करने का काम दे दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर असम नागरिकों के सत्यापन का काम 2015 में शुरू किया गया। इसके लिए रजिस्ट्रार जनरल ने समूचे राज्य में कई एनआरसी केंद्र खोले। तय हुआ कि उन्हें भारतीय नागरिक माना जाएगा जिनके पूर्वजों के नाम 1951 के एनआरसी में या 24 मार्च 1971 तक के किसी वोटर लिस्ट में मौजूद हों। इसके अलावा 12 दूसरे तरह के सर्टिफिकेट या कागजात जैसे जन्म प्रमाण पत्र, जमीन के कागज, स्कूल-कॉलेज के सर्टिफिकेट, पासपोर्ट, अदालत के पेपर्स भी अपनी नागरिकता प्रमाणित करने के लिए पेश किए जा सकते हैं। 
     
गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने क्या कहा

बता दें कि एनआरसी की अंतिम सूची का प्रकाशन 30 जून को ही किया जाना था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी के राज्य समन्वयक प्रतीक हजेला की रिपोर्ट के आधार पर राज्य में बाढ़ की स्थिति को देखते हुए एक महीने के लिए बढ़ा दिया था। एनआरसी को लेकर असम के कुछ हलकों में गहरी चिंता है। रिपोर्ट के जारी होने से सप्ताहभर पहले केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि 30 जुलाई को जो लिस्ट जारी होगी वह महज एक ड्राफ्ट होगा। उन्होंने कहा था कि फाइनल ड्राफ्ट को जारी करने से पहले सभी भारतीयों को अपनी नागरिकता साबित करने का मौका दिया जाएगा।

राजनाथ सिंह ने कहा था कि चिंता की कोई बात नहीं है, एनआरसी के जारी होने के बाद प्रभावित लोगों को अपने दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का पूरा मौका मिलेगा। साथ ही कहा कि असम सरकार उन लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करे जिनके नाम एनआरसी की सूची में नहीं हैं।

नाम नहीं होने पर घबराने की जरूरत नहीं 

एनआरसी के कोऑर्डिनेटर प्रतीक हजेला ने कहा है कि ड्राफ्ट में जिनके नाम मौजूद नहीं होंगे उन्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि जिनके नाम नहीं है वो घबराएं नहीं बल्कि संबंधित सेवा केंद्र पर जाएं और वहां मिलने वाले फॉर्म को भरें। ये फॉर्म 7 अगस्त से 28 सितंबर के बीच उपलब्ध होंगे। लेकिन अधिकारियों को उन्हें इसका कारण बताना होगा कि ड्राफ्ट में उनके नाम क्यों छूटे। इसके बाद उन्हें एक अन्य फॉर्म भरना होगा जो 30 अगस्त से 28 सितंबर तक उपलब्ध होगा।
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