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महागठबंधन के पैरोकार राहुल गांधी अब क्यों हैं 'एकला चलो' की राह पर

Thu, 14 Feb 2019 04:48 PM IST
शशिधर पाठक शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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राहुल गांधी - फोटो : Facebook
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जुलाई-अगस्त 2018 तक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी महागठबंधन के सबसे बड़े पैरोकार थे। कांग्रेस अध्यक्ष की खुली घोषणा थी कि सब मिलकर 2019 में मोदी जी को हराएंगे। राहुल गांधी ने इसकी कोशिश भी की और शरद यादव, शरद पवार की सलाह पर चले भी। फ्लेक्सिबिल भी रहे, लेकिन फिर राहुल गांधी बदलते चले गए। कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकार कहते हैं कि राहुल गांधी नहीं बदले, बल्कि उन्हें राजनीतिक परिस्थितियों और विपक्षी दलों के राजनेताओं ने बदलना शुरू किया। अब राहुल गांधी इस निष्कर्ष पर हैं कि सबकुछ सम्मानजनक तरीके से हो तो ठीक, नहीं तो 2019 के आम चुनाव में पार्टी को एकला चलो रे के लिए तैयार रहना चाहिए।
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क्यों बदलते गए राहुल

कर्नाटक विधानसभा चुनाव का नतीजा आने और मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह ने कांग्रेस पार्टी को महागठबंधन की उम्मीद से भर दिया। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले चंद्रबाबू नायडू की पहल ने इसे नये मुकाम पर पहुंचा दिया। चंद्रबाबू नायडू ने कांग्रेस की सरदारत में तेलंगाना विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए जमीन तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। 

इसी समय कांग्रेस पार्टी को बसपा से काफी उम्मीदें थीं। लेकिन बताते हैं कि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश में बसपा के रुख ने कांग्रेस अध्यक्ष को काफी निराश किया। बसपा राजस्थान में कांग्रेस पार्टी से कुछ सीट चाहती थी, लेकिन कांग्रेस उससे पहले छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश को क्लीयर करना चाहती थी। राजस्थान में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की टीम भी राज्य में अकेले चुनाव लड़ने के लिए तैयार थी। इससे पहले बसपा ने हरियाणा में इनेलो के साथ तालमेल कर लिया था और इसे राज्यों के स्तर तालमेल की श्रेणी में रखा गया। 
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मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के लिए गुलाम नबी आजाद, अहमद पटेल, कमलनाथ ने बसपा सुप्रीमों मायावती को तैयार करने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। बताते हैं इसके पीछे कांग्रेस के नेताओं को मजबूरी, सीबीआई का भय, सीटों के तालमेल का टसल समेत कई तर्क गिनाए गए। उत्तर प्रदेश को लेकर भी कांग्रेस को नाको चने चबाने पड़े और अखिलेश यादव-मायावती ने अचानक सीटों के तालमेल की घोषणा कर दी। हालांकि इन विषयों पर समाजवादी पार्टी और बसपा की तरफ से कोई प्रतिक्रिया देने को तैयार नहीं है। इतना ही नहीं राष्ट्रीय लोकदल के चौधरी अजीत सिंह अभी भी बहुत कुछ नहीं समझ पाते। 

उत्तर प्रेदश का दर्द

सबसे बड़ा झटका कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में लगा। कांग्रेस राज्य में सपा-बसपा-रालोद के साथ तालमेल की उम्मीद लगाकर बैठी थी। महागठबंधन में 10-12 सीट तक समझौता कर लेने का मन बना लिया था, लेकिन सपा-बसपा के बीच में तालमेल की घोषणा होने के बाद तमाम नेताओं को सांप सूंघ गया। तत्कालीन उत्तर प्रेदश महासचिव गुलाम नबी आजाद के पास कहने के लिए शब्द नहीं थे और पूर्व गृहराज्य मंत्री आरपीएन सिंह जैसे नेता भीतर तक हिल गए थे। 

राज्यसभा सांसद संजय सिंह, प्रदेश के कद्दावर नेता प्रमोद तिवारी, बनारस से कांग्रेस के पूर्व सांसद राजेश मिश्रा सब उत्तर प्रदेश में 2019 में आने वाले नतीजों पर बोलने को लेकर तंग थे। लेकिन जैसे ही कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा और ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्य का प्रभारी बनाया गया, तस्वीर बदलने लगी। अब पार्टी के भीतर नया जोश है। इस जोश को होश में रहकर अब वोट में बदलने की रणनीति तैयार हो रही है और लक्ष्य साफ दिखाई देने लगा है। 

तृणमूल कांग्रेस और पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और वामदल के साथ कांग्रेस का शुरू से सॉफ्ट कार्नर रहा। माकपा महासचिव सीताराम येचुरी और भाकपा के डी राजा संसदीय राजनीति में कांग्रेस का साथ देते रहे। हालांकि तृणमूल कांग्रेस और वामदल का राजनीति में छत्तीस का रिश्ता रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष ने इसके लिए पश्चिम बंगाल के प्रदेश कांग्रेस नेताओं की राय ली। कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने तृणमूल के जनाधार को देखकर सलाह दी। 

प्रदेश अध्यक्ष मित्रा ने शार्ट टर्म के लिए तृणमूल से और लांग टर्म के लिए वामदल के साथ जाने की सलाह दी। इस सलाह के पीछे अहम कारण तृणमूल कांग्रेस द्वारा कांग्रेस को आधा दर्जन से भी लोकसभा की सीटों को देने की तैयारी रही। बताते हैं इस बीच ममता बनर्जी के सख्त तेवरों ने कांग्रेस और तृणमूल के बीच में व्यवहारिक दूरी बढ़ानी शुरू कर दी। हालांकि इन सब बदलाव के बाद भी कांग्रेस ने ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के साथ संसद से लेकर पश्चिम बंगाल तक तालमेल बनाए रखा। 
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राफेल पर मोदी सरकार का विरोध

कांग्रेस अध्यक्ष जुलाई 2018 से 2019 तक लगातार राफेल लड़ाकू विमान में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठा रहे हैं। बेहद आक्रामक हैं। चौकीदार (प्रधानमंत्री) चोर है का नारा लगवा रहे हैं, लेकिन विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर कांग्रेस को खुलकर अपना समर्थन नहीं दिया। गुरुद्वारा रकाबगंज में लगातार सक्रिय सूत्र की माने तो कांग्रेस मुद्दों पर विपक्षी दलों में एकता चाहती थी, लेकिन पिछले डेढ़ साल से ऐसा कोई मुद्दा नहीं रहा जिसपर पूरा विपक्ष एक साथ रह पाया हो। राजनीतिक लड़ाई में सब एक साथ रहे हों। राज्यसभा में उपसभापति के चुनाव में भी कांग्रेस को एकता की पूरी उम्मीद थी, लेकिन आखिरी समय में सबकुछ धराशाई हो गई। 

तीन राज्यों के चुनाव ने भर दी आक्सीजन

राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश का विधानसभा चुनाव नतीजा कांग्रेस के लिए उम्मीद लेकर आया। छत्तीसगढ़ में प्रचंड जीत, मध्यप्रदेश जैसे राज्य में भाजपा की हार ने कांग्रेस को काफी उत्साहित कर दिया। बिहार से कांग्रेस के टिकटार्थियों भीड़, उत्साह ने काफी आक्सीजन दे दी है। अब कांग्रेस अध्यक्ष युवा, किसान, मध्यवर्ग, निम्न वर्ग, अल्पसंख्यक सबको जोड़ने की राह पर हैं। उन्हें भी लग रहा है कि वह मोदी सरकार के विरोध की राजनीति के प्रतीक बनते जा रहे हैं। कांग्रेस प्रवक्ता और मीडिया विभाग के प्रभारी रणदीप सुरजेवाला का मानना है कि इसका कांग्रेस को भरपूर फायदा मिलना तय है।
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