हिजबुल के कुख्यात आतंकी बुरहान वाणी को मुठभेड़ में मार गिराना बेशक सुरक्षाबलों के लिए बड़ी कामयाबी माना जा रहा हो लेकिन यह भी सच है इसके चलते पहले से ही अशांत चल रही कश्मीर घाटी अचानक एक बार फिर सुलग उठी है। राज्य का एक हिस्सा तो पूरी तरह हिंसक भीड़ और असामाजिक तत्वों के हवाले है।
बुरहान की मौत पर प्रदर्शन कर रहे लोग और सुरक्षाबल पूरी तरह आमने सामने हैं, भीड़ का निशाना सुरक्षाबल और सरकारी मशीनरी है। जानकारों की मानें तो घाटी के हालात एक बार फिर 2010 की ओर लौटते दिख रहे हैं जब 150 से ज्यादा लोगों की मौत महीनों तक चले हिंसक प्रदर्शनों में हो गई थी।
दूसरी ओर कश्मीर की इस अशांति का खामियाजा वहां की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है इसके चलते सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठने लगे हैं। सवाल राज्य सरकार पर भी है और केंद्र सरकार पर भी। सवाल ये भी है कि क्या सरकारें जनता के मिजाज को भांपने और भावी हालातों को समझने में हर बार चूक कर बैठती हैं। जिसके चलते करोडों की सरकारी संपति को तो नुकसान पहुंचता ही है लाखों लोगों को भी अनजानी दहशत के चलते घरों में कैद रहने को मजबूर होना पड़ता है।
महत्वपूर्ण सवाल ये है क्या सरकार को ऐसे प्रदर्शनों और परिस्थिति से और सख्ती से निपटना चाहिए या राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर इस समस्या का हल तलाशना चाहिए। आप भी रखिए इस पर अपनी राय।
कश्मीर में बिगड़ते हालात के लिए कौन जिम्मेदार?