ममता का मुकाबला
जुलाई 2019 में राज्यपाल बनने के बाद उसी साल दिसंबर में जाधवपुर यूनिवर्सिटी के बाहर छात्रों ने धनखड़ को रोककर काले झंडे दिखाए थे। इसके बाद से धनखड़ बंगाल की कानून व्यवस्था और वहां की सरकार की भूमिका को लेकर काफी मुखर रहे। वह सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट्स के जरिए यह लिखते रहे कि राज्यपाल के अधिकार क्या कहते हैं और किस तरह मुख्यमंत्री राज्यपाल को जानकारी देने के लिए बाध्य हैं।
बंगाल की राजनीतिक हिंसा पर भी की थी टिप्पणी
धनखड़ ने बंगाल में हुई राजनीतिक हिंसा के संदर्भ में एक बार यह भी कहा कि राज्य किस तरह लोकतंत्र का गैस चैम्बर बनता जा रहा है और वहां मानवाधिकार संकट में हैं। धनखड़ ने जब कहा कि मुख्यमंत्री ने कई मौकों पर उनकी तरफ से मांगी गई जानकारी नहीं दी और यहां तक कि विधानसभा में उनके संबोधन को दो बार ब्लैक आउट कर दिया तो नाराज ममता ने उन्हें ट्विटर पर ही ब्लॉक कर दिया। 2022 तक आते-आते ममता और धनखड़ के बीच रिश्तों में इतनी तल्खी आ गई कि राज्य सरकार यह विधेयक ले आई कि राज्य के विश्वविद्यालयों का चांसलर अब राज्यपाल नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री रहेगा।
जाट चेहरा और किसान
धनखड़ राजस्थान के रहने वाले हैं, किसान परिवार से हैं और जाट समुदाय से आते हैं। मोदी सरकार के खिलाफ किसान आंदोलन में जाट किसान भी बड़ी तादाद में शामिल थे। इसके अलावा राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट वोटरों और किसानों की संख्या अच्छी-खासी है। कई निर्वाचन क्षेत्रों में जाट वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। राजस्थान में तो अगले साल विधानसभा चुनाव भी होने हैं। गौर करने वाली बात यह है कि धनखड़ की उम्मीदवारी का एलान करते हुए भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उन्हें 'किसान पुत्र' कहकर संबोधित किया।
भाजपा के लिए धनखड़ इसलिए बेहतर उम्मीदवार
ममता का मुकाबला करने की क्षमता और जाट नेता होने की वजह से धनखड़ भाजपा के लिए उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में पहली पसंद बने। दरअसल, बंगाल में जहां-जहां भाजपा नहीं पहुंच पाई, वहां धनखड़ ने बतौर राज्यपाल ने संवाद साधने की कोशिश की। दूसरी तरफ, जब एक और जाट नेता व वर्तमान में मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक केंद्र सरकार के खिलाफ इन दिनों मुखर हैं तो धनखड़ को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने जाट समुदाय को साधने की कोशिश की है।
मुखर व्यक्तित्व
धनखड़ चौधरी देवीलाल के करीबी रहे हैं। वे वीपी सिंह के दौर में जनता दल में थे। खास बात यह है कि वे भाजपा या आरएसएस की मूल विचारधारा से नहीं आते, बल्कि किसान राजनीति से आते हैं। वे संवैधानिक पदों पर रहकर चुप रहने वाले नेता नहीं, बल्कि अहम मुद्दों पर अपनी टिप्पणी देने वाले नेता के तौर पर जाने जाते हैं।