भारत में विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाले कानून विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में प्रस्तावित संशोधन इन दिनों चर्चा में है। इसकी वजह सिर्फ देश के भीतर की बहस नहीं, बल्कि अमेरिका की प्रतिक्रिया भी है। विपक्ष, सरकार और अब अमेरिकी सांसदों की टिप्पणियों के बाद यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुर्खियों में है।
ऐसे में सवाल उठता है कि एफसीआरए क्या है? इसमें क्या बदलाव प्रस्तावित हैं? क्या बदलाव लागू हो चुके हैं? इसे लेकर क्या भ्रम है? सरकार का क्या कहना है? आइए जानते हैं...
अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया से रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने मंगलवार को एफसीआरए में प्रस्तावित संशोधनों पर चिंता जताई है। उनका दावा है कि इन बदलावों से भारत सरकार को चर्च और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन में दखल देने का अधिकार मिल सकता है। उन्होंने इसे ईसाई समुदाय पर हमला बताते हुए कहा कि अगर विधेयक मौजूदा स्वरूप में पारित होता है तो इसका असर भारत-अमेरिका संबंधों पर भी पड़ सकता है।
केरल के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने बीते अप्रैल में आरोप लगाया था कि प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन से केंद्र सरकार को किसी संस्था का एफसीआरए लाइसेंस नवीनीकरण न करने और उसके बाद विदेशी फंड से बनी संपत्तियों पर नियंत्रण स्थापित करने की शक्ति मिल सकती है। उनका दावा था कि इससे चर्च, ईसाई शैक्षणिक संस्थानों और अन्य अल्पसंख्यक संस्थाओं के हित प्रभावित हो सकते हैं।
वहीं, तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भी विधेयक का विरोध करते हुए कहा था कि यह ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक संस्थानों को प्रभावित कर सकता है। उनका आरोप है कि मामूली प्रक्रियागत चूक के आधार पर पंजीकरण रद्द होने की स्थिति में स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और अनाथालय जैसी संस्थाओं की संपत्तियां भी प्रभावित हो सकती हैं।