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Supreme Court: क्या एआई से गढ़े जा रहे फर्जी सबूत, वैवाहिक मामलों में झूठे आरोपों से क्यों चिंतित है कोर्ट?

Wed, 21 Jan 2026 12:45 PM IST
रिया दुबे न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में फर्जी और एआई से बने सबूतों के बढ़ते इस्तेमाल पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि सबक सिखाने की मानसिकता से झूठे आरोप गढ़े जा रहे हैं। अदालत ने हर मामले में पुलिस के पास जाने के बजाय पहले मध्यस्थता और काउंसलिंग को प्राथमिकता देने की सलाह दी। 
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वैवाहिक विवादों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में फर्जी और एआई से तैयार किए गए सबूतों के बढ़ते इस्तेमाल पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि पति-पत्नी के बीच मतभेद पैदा होते ही कई बार एक-दूसरे को किसी भी कीमत पर सबक सिखाने की मानसिकता हावी हो जाती है, जिसके चलते झूठे आरोप गढ़े जाते हैं और तकनीक का दुरुपयोग कर सबूत तक तैयार कर लिए जाते हैं।

न्यायमूर्ति राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने एक मामले में विवाह को अपरिवर्तनीय रूप से टूट जाने के आधार पर भंग करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि आज के दौर में तकनीक, खासकर AI, का सहारा लेकर झूठे साक्ष्य बनाना पहले से कहीं आसान हो गया है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।

 

वैवाहिक मामलों में हर विवाद पर पुलिस के पास जानें की आलोचना

पीठ ने कहा कि वैवाहिक विवाद होते ही यह तैयारी शुरू हो जाती है कि दूसरे पक्ष को कैसे सबक सिखाया जाए। सबूत जुटाए जाते हैं और कई मामलों में, खासकर AI के इस दौर में, उन्हें बनाया भी जाता है। झूठे आरोप आम हो गए हैं। अदालत ने वैवाहिक मामलों में हर विवाद पर पुलिस के पास जाने की प्रवृत्ति की भी आलोचना की और कुछ अहम सुझाव दिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सबसे पहले पक्षकारों को, अपने वकीलों के मार्गदर्शन में, मध्यस्थता के लिए गंभीर प्रयास करने चाहिए। कुछ मामलों में काउंसलिंग की भी आवश्यकता हो सकती है।

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पीठ ने यह भी कहा कि अगर भरण-पोषण जैसे मामूली मुद्दों पर जैसे बीएनएसएस, 2023 की धारा 144 (पूर्व में सीआरपीसी की धारा 125) या घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 12 के तहत मामला अदालत में दायर होता है, तो कोर्ट का पहला प्रयास आरोप-प्रत्यारोप मंगाने के बजाय मध्यस्थता की संभावना तलाशने का होना चाहिए, क्योंकि इससे विवाद और बढ़ जाता है।

छोटे-छोटे मामलों में गिरफ्तारी कई बार वापसी का रास्ता नहीं छोड़ती

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साधारण वैवाहिक विवादों में पुलिस में शिकायत दर्ज करने से पहले भी सुलह और पुनर्मिलन का प्रयास किया जाना चाहिए, संभव हो तो अदालतों के मध्यस्थता केंद्रों के जरिए। अदालत ने चेताया कि गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई कई बार वापसी का कोई रास्ता नहीं छोड़ती, भले ही गिरफ्तारी एक दिन के लिए ही क्यों न हो।

न्यायमूर्ति राजेश बिंदल द्वारा लिखे गए इस फैसले में बताया गया कि संबंधित विवाह 13 वर्षों से अधिक समय से पूरी तरह टूट चुका था। दंपति ने 2012 में शादी के बाद महज 65 दिन साथ बिताए, लेकिन इसके बाद वे एक दशक से अधिक समय तक कानूनी लड़ाइयों में उलझे रहे। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच 40 से अधिक मुकदमे चले, जिनमें तलाक, भरण-पोषण, घरेलू हिंसा, आईपीसी की धारा 498A के तहत आपराधिक मामले, निष्पादन याचिकाएं, झूठी गवाही से जुड़े आवेदन, रिट याचिकाएं और विभिन्न अदालतों में स्थानांतरण याचिकाएं शामिल थीं।

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