Chandrayaan 3 Location: चंद्रयान-3 मिशन 23 या 24 अगस्त को चंद्रमा की सतह पर उतरेगा। दरअसल, चंद्रयान में ईंधन की मात्रा सीमित है और अगर हम इसे सीधे चंद्रमा पर भेजेंगे तो सारा ईंधन खर्च हो जाएगा। इसके बजाय इसे पृथ्वी के चारों ओर घूमने के लिए छोड़ा जाता है। मिशन को कुल पांच कक्षाएं बदलने में करीब 40 दिन का वक्त लगेगा।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान सगंठन (इसरो) ने 14 जुलाई को अपने चंद्रयान-3 मिशन को लांच किया। अब चंद्रयान-3 अपने मिशन पर लगातार सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा है। इस बीच अंतरिक्ष एजेंसी ने जानकारी दी है कि मिशन अपने तय समय पर है और कक्षा बदलने की तीसरी प्रक्रिया (अर्थ बाउंड ऑर्बिट मैन्यूवर) बंगलूरू से सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
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चंद्रयान-3 भले ही प्रक्षेपित हो चुका है, लेकिन इसका मकसद चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित लैंडिंग करना है। इस बीच मिशन को लेकर कई अहम सवाल उठ रहे हैं कि क्यों खास है चंद्रयान-3 की यात्रा? मिशन को पहुंचने में 40 दिन का वक्त क्यों लग रहा? यह अभी कहां पहुंचा है? जानते हैं इनके जवाब...
चंद्रयान 3 लॉन्च।
- फोटो : ANI
पहले जानते हैं क्या है चंद्रयान-3 ?
चंद्रयान-3 मिशन चंद्रयान-2 का ही अगला चरण है, जो चंद्रमा की सतह पर उतरेगा और परीक्षण करेगा। इसमें एक प्रणोदन मॉड्यूल, एक लैंडर और एक रोवर है। चंद्रयान-3 का फोकस चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित लैंड करने पर है। मिशन की सफलता के लिए नए उपकरण बनाए गए हैं। एल्गोरिदम को बेहतर किया गया है। जिन वजहों से चंद्रयान-2 मिशन चंद्रमा की सतह नहीं उतर पाया था, उन पर फोकस किया गया है।
चंद्रयान-3 लॉन्च।
- फोटो : ANI
लॉन्चिंग कब हुई?
मिशन ने 14 जुलाई को दोपहर 2:35 बजे श्रीहरिकोटा केन्द्र से उड़ान भरी और अगर सब कुछ योजना के अनुसार होता है तो यह 23 या 24 अगस्त को चंद्रमा पर उतरेगा। मिशन को चंद्रमा के उस हिस्से तक भेजा जा रहा है, जिसे डार्क साइड ऑफ मून कहते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि यह हिस्सा पृथ्वी के सामने नहीं आता।
चंद्रयान-3
- फोटो : अमर उजाला
क्यों खास है चंद्रयान-3 की यात्रा?
फिलहाल मिशन चंद्रमा की अपनी यात्रा पर है, जो बेहद खास है। इससे पहले चंद्रयान-3 को इसरो के 'बाहुबली' रॉकेट एलवीएम3 से भेजा गया। दरअसल, पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने के लिए बूस्टर या कहें शक्तिशाली रॉकेट यान के साथ उड़ते हैं। अगर आप सीधे चांद पर जाना चाहते हैं, तो आपको बड़े और शक्तिशाली रॉकेट की जरूरत होगी। इसमें ईंधन की भी अधिक आवश्यकता होती है, जिसका सीधा असर प्रोजेक्ट के बजट पर पड़ता है। यानी अगर हम चंद्रमा की दूरी सीधे पृथ्वी से तय करेंगे तो हमें ज्यादा खर्च करना पड़ेगा। नासा भी ऐसा ही करता है लेकिन इसरो का चंद्र मिशन सस्ता है क्योंकि वह चंद्रयान को सीधे चंद्रमा पर नहीं भेज रहा है।
एक निश्चित दूरी के बाद चंद्रयान को आगे की यात्रा अकेले ही पूरी करनी होती है। चीन हो या रूस, सभी मिशन दो से चार दिन में पहुंच गए। सभी ने जंबो रॉकेट का इस्तेमाल किया। चीन और अमेरिका 1000 करोड़ से ज्यादा खर्च करते हैं लेकिन इसरो का रॉकेट 500-600 करोड़ में लॉन्च होता है। दरअसल, इसरो के पास ऐसा कोई शक्तिशाली रॉकेट नहीं है जो यान को सीधे चंद्रमा की कक्षा में ले जा सके। पृथ्वी से चंद्रमा तक की दूरी महज चार दिन की ही है।
चंद्रयान-3
- फोटो : अमर उजाला
चंद्रयान-3 को पहुंचने में 40 दिन से ज्यादा का वक्त क्यों लग रहा?
चंद्रयान-3 करीब 40 दिन बाद चंद्रमा की सतह पर उतरेगा जिसके पीछे कई बारीकियां हैं। दरअसल, चंद्रयान में ईंधन की मात्रा सीमित है और अगर हम इसे सीधे चंद्रमा पर भेजेंगे तो सारा ईंधन खर्च हो जाएगा। इसके बजाय इसे पृथ्वी के चारों ओर घूमने के लिए छोड़ा जाता है। इस दौरान ईंधन का इस्तेमाल बहुत कम होता है। आगे की प्रक्रिया को समझें तो यान को पृथ्वी की गति और गुरुत्वाकर्षण की मदद से आगे फेंका जाता है। ठीक वैसे ही जैसे जब हम चलती बस से उतरते हैं तो आगे की दिशा में दौड़ते हैं। पृथ्वी जिस गति से अपनी धुरी पर घूमती है उसका लाभ चंद्रयान-3 को मिल रहा है। धीरे-धीरे मिशन अपनी कक्षा बदल रहा है। इस तरह से देखें तो पांच कक्षाएं बदलने में वक्त लगेगा।
चंद्रयान-3 अभी कहां है?
सोमवार को चंद्रयान-3 ने सफलतापूर्वक पृथ्वी की दूसरी कक्षा में प्रवेश कर लिया था। इसके बाद इसरो ने सोमवार को ही को एक बार फिर कक्षा बदलने की प्रक्रिया (अर्थबाउंड-फायरिंग-2) सफलतापूर्वक पूरा कर चंद्रयान-3 को पृथ्वी की अगली और बड़ी कक्षा में भेज दिया। अब अगली फायरिंग 20 जुलाई को दोपहर दो से तीन बजे के बीच करने की योजना है। यान ने योजना के अनुसार, 51400 किमी x 228 किमी की कक्षा प्राप्त कर ली है।
इसरो के वैज्ञानिकों ने बताया है कि चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर अभी भी अपना काम कर रहा है, इसलिए इस मिशन में उसी ऑर्बिटर की मदद ली जा रही है। चंद्रयान-3 से भेजे गए लैंडर और रोवर चंद्रमा पर उतरेंगे। सॉफ्ट लैंडिंग के बाद रोवर लैंडर से बाहर आकर यह जांच करेगा कि चंद्रमा की सतह मानव जीवन के लिए कितनी उपयुक्त है। क्या वहां का पानी पीने योग्य है? वहां कौन सी गैसें और खनिज हैं। आंधी, तूफान या कंपन का चंद्रमा पर क्या प्रभाव पड़ता है?