धर्म परिवर्तन पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय
- फोटो : amar ujala
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने धर्मांतरण को लेकर अहम टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में एससी/एसटी और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों का ईसाई धर्म में अवैध धर्मांतरण बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। इसे तत्काल रोका जाना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि लालच देकर धर्म बदलने का खेल जारी रहा तो देश की बहुसंख्यक आबादी एक दिन अल्पसंख्यक बन जाएगी।
आइये जानते हैं कि आखिर मामला क्या था जिस पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की है? इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने धर्मांतरण को लेकर क्या टिप्पणी की है? अपने फैसले में अदालत ने क्या-क्या कहा है?
आखिर मामला क्या था?
जिस मामले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की है वह उत्तर प्रदेश के हमीरपुर का है। एफआईआर में हमीरपुर निवासी शिकायतकर्ता रामकली प्रजापति के भाई रामफल को आरोपी कैलाश हमीरपुर से दिल्ली में आयोजित सामाजिक समारोह में भाग लेने के लिए ले गया था। मौदहा गांव के कई अन्य लोगों को भी सामाजिक समारोह में ले जाया गया और उनका धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई बना दिया गया। आरोपी कैलाश ने शिकायतकर्ता से वादा किया था कि उसके मानसिक रूप से बीमार भाई का इलाज कराया जाएगा और एक सप्ताह के भीतर उसे उसके पैतृक गांव वापस भेज दिया जाएगा। जब शिकायतकर्ता रामकली का भाई एक सप्ताह के बाद वापस नहीं लौटा, तो उसने आरोपी कैलाश से पूछा कि उसका भाई वापस नहीं आया है। इसका उसे कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
आरोपी के वकील ने अदालत के सामने तर्क दिया कि शिकायतकर्ता के भाई रामफल का धर्म परिवर्तन नहीं हुआ था, न ही वह ईसाई है। वह कई अन्य व्यक्तियों के साथ ईसाई धर्म और कल्याण समारोह में शामिल हुआ था। उन्होंने आगे कहा कि जांच के दौरान, पुलिस ने विभिन्न व्यक्तियों के बयान दर्ज किए थे, जिस पर इस स्तर पर भरोसा नहीं किया जा सकता है कि आरोपी कैलाश की कोई भूमिका नहीं है। सोनू पास्टर ही ऐसी सभा कर रहा था और उसे पहले ही जमानत पर रिहा किया जा चुका है।
धर्मांतरण कराने वालों को दिया जा रहा है भारी मात्रा में पैसा
राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दलील दी कि ऐसी सभा आयोजित करके इन लोगों द्वारा बड़ी संख्या में लोगों को ईसाई बनाया जा रहा है, जिन्हें भारी मात्रा में पैसा मुहैया कराया जा रहा है। इसके अलावा, उन्होंने न्यायालय के सामने गवाहों के विभिन्न बयानों का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि आरोपी कैलाश लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने के लिए गांव से ले जा रहा था और इस कार्य के लिए उसे भारी मात्रा में धन दिया जा रहा था। न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने मामले से जुड़े पक्षों के अधिवक्ताओं को सुना और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का अवलोकन किया।
इसके उपरांत अपने फैसले में न्यायमूर्ति रोहित ने अपने फैसले में कहा कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, अभ्यास और प्रचार का प्रावधान करता है, लेकिन यह एक धर्म से दूसरे धर्म में धर्मांतरण का प्रावधान नहीं करता है।
आरोपी के खिलाफ गंभीर आरोप लगे
फैसले में कहा गया कि 'प्रचार' शब्द का अर्थ है बढ़ावा देना, लेकिन इसका मतलब किसी व्यक्ति को उसके धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तित करना नहीं है। इस मामले में आरोपी के खिलाफ मुखबिर ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि उसके भाई को गांव से दूर दिल्ली में आयोजित कल्याण सभा में भाग लेने के लिए ले जाया गया था और उसके साथ गांव के कई लोगों को भी वहां ले जाया गया था और उन्हें ईसाई बनाया जा रहा था। मुखबिर का भाई कभी गांव वापस नहीं लौटा। अदालत ने कहा कि कई अन्य व्यक्तियों के दर्ज किए गए बयानों से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि आरोपी कैलाश लोगों को दिल्ली में आयोजित धार्मिक सभा में भाग लेने के लिए ले जा रहा था, जहां उन्हें ईसाई बनाया जा रहा था।
यह नहीं रुका तो भारत की बहुसंख्यक आबादी एक दिन अल्पसंख्यक हो जाएगी: अदालत
मामले में गंभीर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि यदि इस प्रक्रिया को जारी रहने दिया गया, तो इस देश की बहुसंख्यक आबादी एक दिन अल्पसंख्यक हो जाएगी। इसके साथ ही कहा गया कि ऐसे धार्मिक समागमों को तुरंत रोका जाना चाहिए जहां धर्मांतरण हो रहा है और भारत के नागरिकों का धर्म परिवर्तन हो रहा है।
न्यायमूर्ति रोहित ने कहा कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के संवैधानिक आदेश के विरुद्ध है। यह धर्म परिवर्तन का प्रावधान नहीं करता है बल्कि केवल अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, अभ्यास और प्रचार का प्रावधान करता है।
बड़े पैमाने पर हो रहीं धर्मांतरण की गैरकानूनी गतिविधियां: न्यायालय
न्यायालय ने कहा कि उसके संज्ञान में कई मामलों में यह बात आई है कि उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से गरीब व्यक्तियों सहित अन्य जातियों के लोगों का ईसाई धर्म में धर्मांतरण करने की गैरकानूनी गतिविधि बड़े पैमाने पर की जा रही है। न्यायालय ने कहा कि उसने प्रथम दृष्टया पाया है कि आरोपी जमानत के लिए हकदार नहीं है। इसलिए, इस मामले में शामिल आरोपी की जमानत याचिका को खारिज कर दिया जाता है।