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भारत में क्यों नहीं हो सकता तख्तापलट?

Sat, 18 Nov 2017 04:26 PM IST
बीबीसी हिंदी
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भारतीय सेना
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जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे को राजधानी हरारे में उनके घर में नजरबंद कर लिया गया है। दावा किया जा रहा है कि सेना ने वहां तख्तापलट कर सत्ता पर कब्जा कर लिया है। इससे पहले तुर्की और वेनेजुएला में तख्तापलट की असफल कोशिशें हो चुकी हैं। पाकिस्तान में देश की आजादी के कुछ ही दिनों बाद से तख्तापलट का जो सिलसिला चला वो हाल तक जारी रहा।
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लेकिन अफ्रीका और लातिन अमेरीका या फिर मध्यपूर्व के कुछ देशों की तरह भारत में तख्तापलट जैसी कोई घटना नहीं घटी। भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं इतनी मजबूत हैं कि भारत में सेना के लिए तख्तापलट करना बिल्कुल भी असंभव है। इसके बहुत स्वाभाविक कारण हैं। भारत की सेना की स्थापना अंग्रेजों ने की थी और उसका ढांचा पश्चिमी देशों की तर्ज पर बनाया था। इस बात पर गौर किया जा सकता है कि पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में तख्तापलट की घटनाएं नहीं हुईं।

हालांकि 1857 की जो बगावत के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने सेना का पुनर्गठन किया। उन्होंने पूरे भारत से सैनिकों की भर्ती की। हालांकि उन्होंने जाति आधारित रेजिमेंट भी बनाईं  लेकिन जो दस्तूर और अनुशासन उन्होंने बनाए वो बिल्कुल एंग्लो सेक्शन कल्चर की तर्ज पर थे।
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52 साल की पत्नी ग्रेस की वजह से देश की सत्ता से बेदखल हुए जिंबाब्वे के 93 साल के राष्ट्रपति

 

भारतीय फौज बहुत अनुशासनात्मक रही है

भारतीय फौज
अनुशासनात्मक फौज

यही कारण रहा है कि भारतीय फौज बहुत अनुशासनात्मक रही है। 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध तक भारती फौज की अच्छी खासी तादाद थी और ऐसा नहीं होता तो फौज को विद्रोह करने से कोई बात नहीं रोक सकती थी। लेकिन उस समय अलग अलग रजवाड़ों और रियासतों की वजह से उतनी एकता नहीं थी और सेना में भी क्षेत्र और जातीय आधार पर रेजिमेंटें बनीं थीं। यही कारण रहा कि भारतीय फौज बरकरार रही।

इसके बाद द्वितीय विश्वयुद्ध का समय आया। उस दौरान आजाद हिंद फौज के गठन की कोशिश हुई तब भी केवल 12 से 20 हज़ार सैनिक ही आईएनए का हिस्सा बने। जबकि 40 से 50 हजार भारतीय सैनिक विरोधियों के कब्जे में थे। पर सेना का अनुशासन नहीं टूटा। साल 1946 में बांबे में नेवी विद्रोह हुआ। लेकिन उस समय तक भारतीय सेना की तादाद 25 लाख के आस पास पहुंच चुकी थी। उस लिहाज से देखें तो नेवी विद्रोह भी एक अपवाद ही था क्योंकि उसमें केवल 10 हजार के करीब सैनिकों ने हिस्सा लिया वो भी नेवी के। एक बात ध्यान देने की बात है कि उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध का समय था, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन भी अपने चरम पर था और इससे सैनिक भी अछूते नहीं थे। नेवी विद्रोह का असर कई जगह रहा लेकिन कुल मिलाकर भारतीय फौज एकजुट ही रही।

अनबन के मामले

इसी तरह का अपवाद 1984 में सामने आया जब स्वर्ण मंदिर पर कार्रवाई के विरोध में कुछ सिख यूनिटों ने विद्रोह कर दिया था। लेकिन बाकी फौज एकजुट रही इसलिए इन विद्रोहों को दबा दिया गया। साठ के दशक में जनरल सैम मानेकशॉ और मौजूदा सरकार के बीच अनबन की खबरें आईं, लेकिन उसका भी स्वरूप कोई व्यापक नहीं था। असल में जब पहली बार अंतरिम सरकार बनी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय सेना को लोकतांत्रिक सरकार के नियंत्रण में रहने का सिद्धांत रखा। इसके लिए सबसे पहले उन्होंने कमांडर इन चीफ का पद खत्म कर दिया। इस पद पर अंग्रेजी हुकूमत में अंग्रेज अफसर तैनात होते थे और बाद में इस पद पर जनरल करियप्पा को नियुक्त किया गया था।

नेहरू ने कहा कि जब फौज का आधुनिकीकरण हो रहा है तो थल सेना, नौसेना और वायुसेना की अहमियत बराबर होगी और उसी समय तीनों के अलग अलग चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बना दिए गए।
इन तीनों के ऊपर रक्षामंत्री को रखा गया जो चुनी हुई सरकार के कैबिनेट के तहत काम करता है।

 
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लोकतांत्रिक सरकार ही सुप्रीम सत्ता

भारतीय फौज


जनरल करियप्पा को पहला थल सेना अध्यक्ष बनाया गया। उस समय कमांडर इन चीफ का आवास तीन मूर्ति होता था। बाद में नेहरू ने उसे अपना घर बनाया। ये एक बहुत ही सांकेतिक काम था और संदेश साफ था कि देश में लोकतांत्रिक सरकार ही सुप्रीम सत्ता रहेगी। एक बार जनरल करियप्पा ने सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना की तो नेहरू उन्हें पत्र लिखकर और बुलाकर नागरिक सरकार के कामों में दखल न देने की हिदायत दी थी। दरअसल भारत में लोकतंत्र की जो नींव रखी गई, सेना भी उसका हिस्सा बन गई। बाद में चुनाव आयोग, रिजर्व बैंक जैसी लोकतांत्रिक संस्थाएं खड़ी हो गईं, इसने लोकतंत्र की नींव को काफी मजबूत किया।

इसके बाद पाकिस्तान की तरह के तख्तापलट के खतरे लगभग समाप्त से हो गए। पाकिस्तान में तो 1958 में ही तख्तापलट हो गया। उसी दौरान अफ्रीकी और दक्षिणी अमेरिकी देशों में तख्तापलट हुए। भारतीय लोकतंत्र जब अपने पैर जमा रहा था, उस नाजुक दौर का खतरा खत्म हो गया। इसमें भारतीय फौज का अराजनीतिक प्रकृति और जनरल करियप्पा की बड़ी भूमिका रही। बाद के समय में जनरल सैम मानेक शॉ के साथ एक विवाद जुड़ा। दिल्ली में उस दौरान कोई प्रदर्शन चल रहा था और सैम मानेक शॉ ने सेना की एक ब्रिगेड की दिल्ली में तैनात की थी, ताकि किसी अप्रिय घटना से निपटा जा सके। हालांकि उन्होंने आलोचना करने वालों को जवाब देते हुए कहा था कि घबराने की कोई बात नहीं ये कोई तख्तालट की कोशिश नहीं है।

देश में सेना की सात कमान है और ये संभव नहीं है कि एक जनरल एक साथ सातों कमान को आदेश दे। तब जबकि इनके कमांडर सेनाध्यक्ष से महज एक या दो साल पीछे होते हैं। किसी आदेश को इतनी आसानी से वे नहीं मान सकते जो अनुशासन से संबंधित हो। बाद के समय में हम देखते हैं कि तत्कालीन जनरल वीके सिंह जोकि सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में आकर मौजूदा सरकार में मंत्री बन गए हैं, उन्होंने पूर्ववर्ती यूपीए सरकार को चुनौती दी थी, लेकिन वो भी कोर्ट में।

कब होता है तख्तापलट?

हालांकि एक अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने कुछ आर्मी टुकड़ियों के दिल्ली की ओर मार्च की खबर प्रकाशित की थी, लेकिन उसमें भी किसी तख्तापलट जैसा कुछ नहीं था। भले ही ये दावा किया गया हो कि सरकार में उस समय हड़कंप मच गया था और टुकड़ियों को तुरंत वापस जाने के आदेश दिए गए थे। असल में सेना को तख्तापलट का तब मौका मिलता है जब देश में बहुत अस्थिरता हो, राजनीतिक विभाजन चरम पर हो और लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हों या भेदभाव या अराजकता की स्थिति हो।

भारत में ऐसी स्थिति कभी पैदा ही नहीं हुई। यहां तक कि इमरजेंसी के दौरान भी सेना राजनीति से अलग रही और कुछ लोग इस बात के लिए उसकी आलोचना भी करते हैं कि तीनों सेनाध्यक्षों को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलकर इमरजेंसी के बारे में बात करनी चाहिए थी। फिर भी सेना राजनीति से दूर रही। क्योंकि नींव में अनुशासन का ऐसा सिद्धांत मौजूद है जो उसे एकजुट रखता है और साथ ही नागरिक प्रशासन में हस्तक्षेप से दूर रखता है।
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