मोहिनी के असाधारण सौंदर्य को देखकर असुर लड़ना छोड़कर मोहिनी के पीछे चल पड़े। इस बीच मोहिनी-रूप में विष्णु ने असुरों से पहले देवताओं को अमृत-पान कराना आरंभ कर दिया।
एक दिन दुर्वासा ने देवराज इंद्र को सफेद पुष्पों की एक माला भेंट की, परंतु इंद्र ने वह माला अपने हाथी ऐरावत के दांत पर लटका दी। ऐरावत ने सूंड से माला को उठाकर नीचे फेंक दिया और पैरों तले रौंद डाला! यह देखकर दुर्वासा का क्रोध सातवें आसमान पर जा पहुंचा। वह इंद्र से बोले, 'पद और प्रतिष्ठा का इतना घमंड ! मैं तुम्हें शाप देता हूं कि तुम्हारी ऊर्जा, प्रतिष्ठा और तेज नष्ट हो जाए !' इस शाप के फलस्वरूप इंद्र का तेज और यश समाप्त होने लगा, तो दुर्वासा ने इंद्र को खोया तेज फिर से प्राप्त करने के लिए देवताओं और असुरों के साथ समुद्र-मंथन द्वारा अमृत प्राप्त करने का सुझाव दिया।
अमृत-पान से इंद्र को यश और तेज पुनर्प्राप्त होना था। इंद्र ने असुरों से बात की, तो अमृत में अपना हिस्सा पाने के लालच में असुर, देवताओं का साथ देने को तैयार हो गए। देवराज इंद्र ने समुद्र मंथन के लिए आवश्यक वस्तुओं का प्रबंध किया। अनंत नाग ने मंदार पर्वत को धरती से उखाड़कर समुद्र तट तक पहुंचाया। विष्णु ने कूर्मावतार लेकर मंदार पर्वत को पीठ पर धारण किया, जिससे मथनी बनी। वासुकि नाग ने स्वयं को मंदार के चारों ओर लपेटकर रस्सी का रूप धारण किया। देवताओं ने वासुकि को पूंछ की ओर से पकड़ा और असुरों ने उसके सिर को थाम लिया। फिर देवासुर मिलकर समुद्र को मथने लगे।
मंथन के फलस्वरूप पहले विष निकला, जिसे भगवान शिव ने अपने कंठ में रोक लिया और 'नीलकंठ' कहलाए। फिर अनेक मूल्यवान रत्न निकले। अंत में ऋषि धन्वंतरि अमृत कलश लेकर बाहर निकले। अमृत-पान करने वाले अनेक थे, किंतु कलश केवल एक था। असुरों और देवताओं में झगड़ा होने लगा। तब भगवान विष्णु ने 'मोहिनी' नामक सुंदर स्त्री का रूप धारण किया और अमृत-कलश लेकर खड़े हो गए। मोहिनी के सौंदर्य को देख असुर लड़ना भूल उसके पीछे चल पड़े। मोहिनी-रूप में विष्णु ने असुरों से पहले देवताओं को अमृत-पान कराना आरंभ कर दिया।
स्वरभानु नाम का एक असुर, देवताओं के बीच रूप बदलकर छिपा बैठा था। उसने भी अमृत की कुछ बूंदें चख लीं। परंतु सूर्य व चंद्र ने स्वरभानु को पहचान लिया और उसकी पोल खोल दी।
इससे पहले कि वह अमृत, स्वरभानु के कंठ से नीचे उतर पाता, मोहिनी बने विष्णु ने सुदर्शन चक्र से स्वरभानु का सिर, धड़ से अलग कर दिया। परंतु अमृत की कुछ बूंदें चखने के कारण स्वरभानु की मृत्यु नहीं हुई। उसके सिर और धड़ अलग-अलग जीवित रह गए ! स्वरभानु का सिर 'राहु' और धड़ 'केतु' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तभी से स्वरभानु नामक असुर, राहु और केतु बनकर आज भी विद्यमान है।
चूंकि सूर्य और चंद्र ने स्वरभानु की पोल खोली थी, इसलिए उन दोनों से स्वरभानु की स्थायी शत्रुता हो गई। यही कारण है कि वह समय-समय पर सूर्य और चंद्र को ग्रसता है, जिसे हम सूर्य-ग्रहण तथा चंद्र ग्रहण के नाम से जानते हैं।
अमृत-पान करने का देवताओं पर जादुई प्रभाव हुआ और वे नवीन ऊर्जा व उत्साह से भर उठे। उन्होंने सरलता से असुरों को पराजित कर दिया। असुरों के मन में देवताओं के प्रति पहले से विद्यमान कटुता एवं अविश्वास और दृढ़ हो गए। देवताओं ने असुरों के साथ छल किया था। परंतु वे बहुत थके हुए थे और उनमें प्रतिशोध लेने का साहस नहीं बचा था। इसलिए उन्होंने निश्चय किया कि वे अपनी पराजय का बदला अवसर आने पर अवश्य लेंगे। इधर, वासुकि नाग तथा मंदार पर्वत को उनके स्थान पर वापस पहुंचा दिया गया। देवराज इंद्र ने सभी देवताओं का आभार व्यक्त किया तथा विष्णु एवं शिव को समय पर सहायता के लिए कोटिशः धन्यवाद दिया। अमृत-पान करने के बाद इंद्र को भी उसका यश और तेज फिर से प्राप्त हो गया। देवलोक के सिंहासन पर इंद्र का अधिकार एक बार फिर सुरक्षित हो चुका था।