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देश में बदलते सियासी समीकरण: विपक्ष की बैठक से इन दलों ने क्यों बनाई दूरी, तीसरा फ्रंट खुला तो क्या होगा?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Tue, 18 Jul 2023 05:36 PM IST

सार

विपक्ष की इस बैठक से कुछ अन्य विपक्षी दलों ने दूरी भी बना रखी है। ऐसे में सवाल ये उठ रहा है कि आखिर कितने दल हैं, जो न तो एनडीए और न ही विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बन रहे? इसके क्या सियासी मायने हैं? ये दल विपक्ष को कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं? आइए समझते हैं...  
 
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तीसरा फ्रंट - फोटो : अमर उजाला
आज बेंगलुरु में 26 विपक्षी दलों के नेता जुटे। इस बैठक में विपक्षी दलों के गठबंधन की रूपरेखा तय हुई। यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी, राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, अरविंद केजरीवाल, एमके स्टालिन, नीतिश कुमार, तेजस्वी यादव, शरद पवार, लालू प्रसाद यादव, अखिलेश यादव, जयंत चौधरी, सीताराम येचुरी, ममता बनर्जी समेत 26 दलों के कई बड़े नेता इस बैठक में शामिल हुए। बैठक के बाद गठबंधन के नाम का एलान हो गया। यूपीए को खत्म करके अब गठबंधन को INDIA नाम दिया गया है। 

विपक्ष की इस बैठक से कुछ अन्य विपक्षी दलों ने दूरी भी बना रखी है। ऐसे में सवाल ये उठ रहा है कि आखिर कितने दल हैं, जो न तो एनडीए और न ही विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बन रहे? इसके क्या सियासी मायने हैं? ये दल विपक्ष को कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं? आइए समझते हैं...  

 
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तीसरा फ्रंट - फोटो : अमर उजाला
आज बेंगलुरु में 26 विपक्षी दलों के नेता जुटे। इस बैठक में विपक्षी दलों के गठबंधन की रूपरेखा तय हुई। यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी, राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, अरविंद केजरीवाल, एमके स्टालिन, नीतिश कुमार, तेजस्वी यादव, शरद पवार, लालू प्रसाद यादव, अखिलेश यादव, जयंत चौधरी, सीताराम येचुरी, ममता बनर्जी समेत 26 दलों के कई बड़े नेता इस बैठक में शामिल हुए। बैठक के बाद गठबंधन के नाम का एलान हो गया। यूपीए को खत्म करके अब गठबंधन को INDIA नाम दिया गया है। 

विपक्ष की इस बैठक से कुछ अन्य विपक्षी दलों ने दूरी भी बना रखी है। ऐसे में सवाल ये उठ रहा है कि आखिर कितने दल हैं, जो न तो एनडीए और न ही विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बन रहे? इसके क्या सियासी मायने हैं? ये दल विपक्ष को कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं? आइए समझते हैं...  
 

पहले जानिए विपक्ष की बैठक में कौन-कौन से दल शामिल हुए? 
बेंगलुरु में चल रही विपक्ष की बैठक में कुल 26 दल शामिल हुए हैं। इसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (एम), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड), द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, आम आदमी पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, शिव सेना (यूबीटी), राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, सीपीआई (एमएल), राष्ट्रीय लोकदल, आईयूएमएल, केरल कांग्रेस (एम), एमडीएमके, वीसीके, आरएसपी, केरल कांग्रेस, केएमडीके, एआईएफबी शामिल है। 
 

एनडीए में कौन-कौन से दल शामिल हुए? 
भाजपा, एआईएडीएमके, शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट), एनपीपी (नेशनल पीपुल्स पार्टी), एनडीपीपी (नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी), एसकेएम (सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा), जेजेपी (जननायक जनता पार्टी), आईएमकेएमके (इंडिया मक्कल कालवी मुनेत्र कड़गम), आजसू (ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन), आरपीआई (रिपब्लिक पार्टी ऑफ इंडिया), एमएनएफ (मिजो नेशनल फ्रंट), टीएमसी (तमिल मनीला कांग्रेस), आईपीएफटी (त्रिपुरा), बीपीपी (बोडो पीपुल्स पार्टी), पीएमके (पतली मक्कल कच्ची), एमजीपी (महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी), अपना दल, एजीपी (असम गण परिषद), राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी, निषाद पार्टी, यूपीपीएल (यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल), एआईआरएनसी (ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस पुड्डुचेरी), शिरोमणि अकाली दल संयुक्त (ढींढसा), और जनसेना (पवन कल्याण)। ये ऐसे दल हैं, जो पहले से ही एनडीए का हिस्सा हैं। 

इसके अलावा हाल ही में एनसीपी (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अजित पवार गुट), लोक जन शक्ति पार्टी (रामविलास), एचएएम (हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा), आरएलएसपी (राष्ट्रीय लोक समता पार्टी), वीआईपी (विकासशील इंसान पार्टी), और एसबीएसपी (सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी) ओम प्रकाश राजभर भी शामिल हुए। 
 

विपक्षी दलों की बैठक में आज क्या-क्या फैसले लिए गए? 
  • विपक्षी दलों के गठबंधन का नाम INDIA होगा। इसका मतलब इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस है। 
  • सभी विपक्षी दलों ने लोकतंत्र को बचाने के लिए एकसाथ आने का फैसला लिया है। 
  • विपक्ष की अगली बैठक अब मुंबई में होगी। 
  • चुनाव के लिए दिल्ली में सचिवालय स्थापित किए जाएंगे। 
  • 11 सदस्यों की समन्वय समिति का गठन होगा।

सीट बंटवारे का फॉर्मूला क्या होगा?
अब तक की चर्चा में कहा जा रहा है कि चुनाव के वक्त जिस पार्टी का जिस भी राज्य या क्षेत्र में दबदबा हो वहां उसे लीड करने दिया जाएगा। मसलन बिहार में राजद-जदयू का प्रभाव है। ऐसे में यहां की ज्यादातर सीटों पर इन्हीं दो पार्टियों के उम्मीदवार उतारे जाएं। इसके अलावा अन्य पार्टी जिसका कुछ जनाधार हो, उन्हें भी कुछ सीटों पर मौका दिया जाए। 

इसी तरह यूपी में सपा को ज्यादा सीटें दी जा सकती हैं। राजस्थान-छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस लीड कर सकती है। जहां विवाद की स्थिति बने, वहां आपस में बैठकर मसला हल किया जा सकता है। कहा जा रहा है कि इस फॉर्मूले के दम पर विपक्ष 543 लोकसभा सीटों में से करीब 450 सीटों पर सीधे मुकाबले की तैयारी कर रहा है। 
 

किन दलों ने दोनों गठबंधनों से बनाई दूरी?  
कई ऐसे विपक्षी दल हैं जिन्होंने बेंगलुरु में चल रही बैठक से किनारा कर लिया है। इसमें सबसे बड़ा नाम तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर का है। केसीआर की पार्टी बीआरएस अभी तेलंगाना की सत्ता में है और कांग्रेस यहां विपक्ष में है। भाजपा भी इस बार पूरी विधानसभा के लिए पूरी ताकत झोंक चुकी है। मतलब तेलंगाना की लड़ाई त्रिकोणीय हो चली है। वहीं, ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी भी विपक्ष के इस बैठक में नहीं शामिल हुए। इसके अलावा यूपी से बसपा को भी इस बैठक के लिए कोई निमंत्रण नहीं मिला। 
 

विपक्ष पूरी तरह से एकजुट नहीं हुआ तो क्या पड़ेगा असर?
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह कहते हैं, 'अगर विपक्ष के सभी दल साथ नहीं आते हैं तो इसका सीधा असर विपक्ष के गठबंधन और फिर सीटों पर पड़ेगा। विपक्ष के बिखराव का फायदा भाजपा को मिल सकता है। मसलन यूपी में ऐसा नहीं है कि बसपा का वोट पूरी तरह से खत्म हो गया है। बसपा के पास अभी भी बड़ी संख्या में कैडर वोट हैं। अगर यूपी में बसपा अलग चुनाव लड़ती है तो कई सीटों पर वह विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार को नुकसान पहुंचाएगी। ऐसी स्थिति में भाजपा को ही फायदा मिलेगा। इसी तरह तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा जैसे राज्यों में भी विपक्ष के इस गठबंधन को नुकसान उठाना पड़ सकता है।'

प्रमोद कहते हैं, 'भाजपा के खिलाफ विपक्ष में बैठे सभी दलों के वोटर्स भी वैचारिक तौर पर एक ही हैं। ऐसे में अगर विपक्ष पूरी तरह से एकजुट नहीं हुआ तो इनके वोटर्स भी बंट जाएंगे। इनमें से ज्यादातर दल क्षेत्रीय हैं। इनका काडर वोटबैंक बिल्कुल ही अलग होता है। ऐसे में भाजपा की बजाय नुकसान विपक्ष के गठबंधन को ही होगा। ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का एक अलग काडर वोटबैंक है। ओडिशा में बीजद और आंध्र प्रदेश में वाईएसआर सत्ता में है। तेलंगाना में केसीआर की सरकार है। ये तीन बड़े राज्य विपक्ष की पहुंच से दूर हैं। ऐसे में इन राज्यों में विपक्ष को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।'
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