फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Youth: पिता की नृशंस हत्या तक क्यों पहुंच गए युवा, सोशल मीडिया कितनी जिम्मेदार?

सार

लखनऊ के एक 19 वर्षीय युवा ने अपने पिता की नृशंस हत्या कर लोगों को चौंका दिया है।  हमारे समाज के कुछ युवा इस हद कैसे पहुंच गए कि उन्हें अपने ही माता-पिता की हत्या करने में भी कोई संकोच नहीं हुआ? उनके इस हद तक पहुंचने के पीछे क्या कारण हैं?  
विज्ञापन
डॉ. लोकेश सिंह शेखावत, वरिष्ठ मनोचिकित्सक - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

लखनऊ के एक 19 वर्षीय युवा ने अपने पिता की नृशंस हत्या कर लोगों को चौंका दिया है। युवा ने जिस तरह अपने पिता का शव क्षत-विक्षत कर उसे ठिकाने लगाने का प्रयास किया, उसे सुनकर लोगों के रोंगटे खड़े हो गए। समाज में माता-पिता के साथ बच्चों के गहरे भावनात्मक संबंधों को देखते हुए कोई यह विश्वास नहीं कर पा रहा है कि हमारे समाज के कुछ युवा इस हद कैसे पहुंच गए कि उन्हें अपने ही माता-पिता की हत्या करने में भी कोई संकोच नहीं हुआ? उनके इस हद तक पहुंचने के पीछे क्या कारण हैं?  
विज्ञापन


मनोचिकित्सक और समाज वैज्ञानिक इस घटना के पीछे के कारणों की तलाश अपने-अपने तरीकों से कर रहे हैं। सभी इस बात से सहमत हैं कि बदलते परिवेश में बिल्कुल अलग-थलग पड़ रहे युवाओं के पास अपनी परेशानियों और भावनात्मक संवेदनाओं को व्यक्त करने के उपयुक्त साधन नहीं मिल रहे हैं। जब तक संयुक्त परिवार होता था, बच्चे अपने से बड़ों के साथ अपनी बातें साझा कर उनका हल निकाल लेते थे। लेकिन आज पति-पत्नी दोनों के कामकाजी होने से बच्चे बिल्कुल एकाकी पड़ गए हैं। उनका ज्यादातर समय स्मार्ट फोन और वीडियो गेम की दुनिया में बीत रहा है। वे एक आभासी दुनिया में जीने लगे हैं जहां नैतिकता का कोई मूल्य नहीं है, लेकिन उनके अहम को ठेस पहुंचाने वाली कोई बात उन्हें अंदर तक आहत कर देती है। ऐसे में कोई भावनात्मक सहारा न मिलने पर वे अतिवादी कदम उठाने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। 

संयुक्त परिवार की सीख से वंचित युवा हो रहे अतिवादी सोच के शिकार- डॉ. लोकेश सिंह शेखावत
डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल, दिल्ली में वरिष्ठ मनोचिकित्सक प्रोफेसर डॉ. लोकेश सिंह शेखावत ने अमर उजाला से कहा कि जब बच्चे संयुक्त परिवार में बड़े होते थे, तब वे अपने सामने अपने पिता को दादा से, या अपने चाचा को अपने पिता से डांट खाते हुए देखते थे। ऐसे में वे बचपन में यह सीख जाते थे कि उनके गलत होने पर उनके परिवार के बड़े लोग उन्हें डाटने और सुधारने का अधिकार रखते हैं। लेकिन अब बिल्कुल अलग-थलग पड़ रहे युवा ऐसी कोई बात नहीं सीख पा रहे। यही कारण है कि उनके अहम को चोट पहुंचाने वाली कोई भी चीज उन्हें गहरे तक आहत कर जाती है जिससे वे कई बार अतिवादी कदम उठा लेते हैं। 
विज्ञापन


स्मार्ट फोन और इंटरनेट कितना जिम्मेदार
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्मार्ट फोन और इंटरनेट की दुनिया को बच्चों में बढ़ती आक्रामकता के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कई देशों में 16 वर्ष तक के किशोरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल करने पर रोक तक लग चुकी है। यह कितना सही है? अमर उजाला के इस प्रश्न पर डॉ. लोकेश सिंह शेखावत ने कहा कि स्मार्ट फोन और इंटरनेट की दुनिया बच्चों को एक सीमित दायरे में देखने-सोचने और प्रतिक्रिया करने तक सीमित कर रही है। लेकिन अहम बात यह है कि माता-पिता स्वयं बच्चों को समय नहीं दे रहे हैं। दोनों के कामकाजी होने से बच्चों के पास एक लंबा समय अकेले बिताने के लिए मिल रहा है। कई माता-पिता स्वयं बच्चे को शांत करने के लिए मोबाइल थमा रहे हैं। 

मोबाइल को अपने व्यक्तित्व का हिस्सा मानने लगते हैं बच्चे
इसका मिला जुला परिणाम यह हुआ है कि बच्चे अपना बड़ा समय स्मार्ट फोन के साथ बिता रहे हैं। जो बातें कल तक वे अपने माता-पिता, चचेरे भाई-बहन से करते थे, आज वही बातें सोशल मीडिया पर एक अनजान व्यक्ति से कर रहे हैं। अपनी भावनाओं को संतुष्ट करने की इस कोशिश में वे इसे अपने एक हिस्से के रूप में देखने लगते हैं। ऐसे में जब उन्हें इससे अलग किया जाता है तो उन्हें लगता है कि उनके अस्तित्व से छेड़छाड़ की जा रही है। इसका एक ही इलाज हो सकता है कि माता-पिता बच्चों के साथ समय बिताएं, उन्हें आदेश देने की बजाय उनकी बात को समझते हुए समस्या का समाधान निकालने के अप्रोच से बात करें। 

बच्चों की क्षमता समझना जरूरी  
डॉ. लोकेश सिंह शेखावत ने कहा कि माता-पिता बच्चों को पढ़ने के लिए तो कहें, लेकिन इसके लिए उन पर अतिरिक्त दबाव न डालें। पड़ोसी बच्चे से अपने बच्चे की तुलना न करें। यह समझने की कोशिश करें कि हर बच्चे की क्षमता, पसंद-नापसंद और उनके काम करने का तरीका बिल्कुल अलग होता है। ऐसे में बच्चे की क्षमता और पसंद को देखते हुए उनके बेहतर एप्टिट्यूड वाले क्षेत्र में उन्हें आगे बढ़ाने का प्रयास करें। दुनिया में लाखों उदाहरण हैं जहां कम पढ़े-लिखे लोगों ने सफलता के अद्भुत इतिहास रचे हैं। ऐसे में केवल उन्हें पढ़ने-लिखने के लिए बहुत दबाव डालना सही नहीं है।    
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें