संघ प्रमुख के इस बयान को राजनीतिक दृष्टि से भी देखा जा रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि ये बयान 2024 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए दिए जा रहे हैं। इसके जरिये दलित समुदाय के उन जमीनी मुद्दों से भी लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है जिससे वह लगातार जूझता रहा है।
इन आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच यह प्रश्न गंभीर हो चला है कि इस तरह का बयान देने का संघ प्रमुख का उद्देश्य क्या है? 2024 में उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं का रुख किस ओर रहेगा? 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में लगभग 22 फीसदी संख्या दलित मतदाताओं की है जो किसी भी दल की हार-जीत में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। माना जाता है कि मायावती के राजनीतिक तौर पर कुछ कमजोर होते ही यह मतदाता सपा और भाजपा में बंट गया है।
दलित समुदाय के लोगों के लिए विशेष कार्य करने का दावा करने वाली भाजपा को अब कांग्रेस से भी कड़ी चुनौती मिलने की उम्मीद है जो राष्ट्रीय स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक पर भी दलित नेतृत्व देकर अपने इस पुराने वोट बैंक को अपने खेमे में वापस लाने की कोशिश कर रही है। मायावती के नेतृत्व में बसपा भी अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने के लिए कड़ा संघर्ष कर रही है। बसपा ने 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद 2022 में भी हार मिलने के बाद नये स्तर की तैयारियां करने में जुट गई है। ऐसे में बड़ा प्रश्न है कि इस बार दलित मतदाताओं की प्राथमिकता में कौन रहेगा?
हालांकि, यूपी में सपा-बसपा-कांग्रेस के साथ आने का प्रयोग असफल साबित हुआ है, लेकिन जिस तरह विपक्षी दलों के खेमे में नई कोशिशें हो रही हैं, कांग्रेस के नए नेतृत्व के साथ यदि ऐसा कोई गठबंधन बनता है तो उसका यूपी के दलित मतदाताओं पर क्या असर रहेगा, इस पर भी राजनीतिक पंडितों में मतभेद हैं।
संघ का कार्य समाज निर्माण: आरएसएस
आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने अमर उजाला से कहा कि संघ प्रमुख के किसी भी बयान को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखना एक बड़े उद्देश्य को संकुचित दृष्टि से देखने जैसा है। आरएसएस अपनी स्थापना (25 सितंबर 1925) काल से ही व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण, और समाज निर्माण से राष्ट्र निर्माण की बात करता रहा है। जबकि जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर 191 को दिल्ली में पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीन दयाल उपाध्याय और प्रो. बलराज मधोक की अगुवाई में की गई थी। भाजपा की स्थापना 06 अप्रैल 1980 के दिन अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में की गई। इससे यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि जनसंघ-भाजपा जैसे राजनीतिक दलों के निर्माण से कई दशकों पहले से आरएसएस इसी विचारधारा को आगे रखकर चलता रहा है।
इस नेता के मुताबिक, आरएसएस यह मानता है कि समाज के सभी वर्गों को साथ लाये बिना राष्ट्र का संपूर्ण विकास संभव नहीं है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत के सामने जो गंभीर चुनौतियां पैदा हो रही हैं, उससे निबटने के लिए यह पहले की तुलना में कहीं ज्यादा आवश्यक हो गया है कि देश के सभी वर्गों में आपसी सामंजस्य बना रहे। उन्होंने कहा कि केवल दलित या आदिवासी समुदाय ही नहीं, इसके लिए संघ मुस्लिमों को भी साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में हर बात को राजनीतिक शंका की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संघ प्रमुख के द्वारा वाल्मिकी समुदाय के युवाओं को संघ शाखाओं में आमंत्रित करना एक बयान मात्र है। सच्चाई यह है कि इन वर्गों के हजारों युवा आज भी हमारे साथ जुड़े हुए हैं। यह उन्हें बड़े स्तर पर राष्ट्रीय-सामाजिक भूमिकाओं के लिए तैयार करने की कोशिश है जिसे सकारात्मक दृष्टि से देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि संघ की शाखाओं में बिना किसी जातिगत भावना के सभी को साथ रहना, खाना और समाज की चिंता करना सिखाया जाता है, यही कार्य इन युवाओं को समाज में करना है जिससे राष्ट्र मजबूत हो।
नेता के मुताबिक, यह भी भ्रम है कि आरएसएस से जुड़े लोग केवल भाजपा के ही सदस्य बनते हैं। उन्होंने कहा कि संघ अपनी शाखाओं में केवल व्यक्ति निर्माण की दीक्षा देता है। इसके बाद वे किस संगठन से जुड़ते हैं, यह उनका अपना व्यक्तिगत अधिकार होता है। उन्होंने कहा कि यदि दूसरे राजनीतिक दल भी स्वयं सेवकों को उनके राष्ट्रीय विचारों के साथ अपनाने को तैयार हों तो वे उन दलों में भी जाने को तैयार हैं।
‘दलितों की असली हितैषी कांग्रेस’
वहीं, आल इंडिया दलित महिला कांग्रेस की अध्यक्ष ऋतु चौधरी ने मोहन भागवत के इरादों पर प्रश्न खड़ा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि संघ के सर्वोच्च सांगठनिक निकाय में आज भी दलित-आदिवासी समुदाय के लोगों की कोई भागीदारी नहीं है। यदि संघ सभी वर्गों को साथ लेकर समाज निर्माण की बात करता है तो उसे सबसे पहले यह कार्य अपने अंदर करके दिखाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज बीजेपी-संघ को आदिवासियों-दलितों की बात केवल इसलिए याद आ रही है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनावों में उन्हें अपने वोट दरकते नजर आ रहे हैं।
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि भाजपा शासित राज्यों में दलितों के ऊपर गंभीर अपराध हुए हैं। ये घटनाएं हाथरस से शुरू होकर प्रयागराज से लेकर लखीमपुर खीरी तक जारी रही हैं और अभी भी हो रही हैं। कई जगहों पर लिंचिंग जैसी खतरनाक घटनाएं घटी हैं। लेकिन इसी दौरान भाजपा-संघ ने इन मुद्दों पर न केवल चुप्पी साधे रखी, उलटे आरोपियों को बचाने का प्रयास तक किया। उन्होंने कहा कि ऐसे में अब दलित समुदाय कांग्रेस को एक विकल्प की तरह देख रहा है जिससे भाजपा में घबराहट है और उसी का परिणाम आज मोहन बगावत के बयानों में दिखाई पड़ रहा है।
दलित मायावती के साथ: बसपा
बहुजन समाज पार्टी (BSP) नेता सुधीन्द्र भदौरिया ने अमर उजाला से कहा कि ‘दलित, आदिवासी, गरीब और अल्पसंख्यकों के कल्याण की बात भारतीय राजनीति का मुहावरा’ है जिसे चुनाव आने पर हर राजनीतिक दल बोलता है, लेकिन असलियत यह है कि केवल इन बयानों से किसी वर्ग का वोट किसी राजनीतिक दल को नहीं मिल जाता। इसके लिए उस समाज के लोगों के लिए कार्य करने पड़ते हैं और उनमें अपने लिए विश्वास पैदा करना पड़ता है। किसी वर्ग विशेष का वोट ही जीत तय नहीं करता, बल्कि इसके साथ समाज के अन्य समुदायों को भी साथ लेना पड़ता है।
सुधीन्द्र भदौरिया ने कहा कि जहां तक दलितों की बात है, विशेषकर उत्तर प्रदेश में, मायावती को छोड़कर आज भी पूरे देश में दलितों का कोई सर्वमान्य नेता नहीं है। उन्होंने कहा कि भाजपा के द्वारा कुछ दलितों को मंत्री बनाने, या कांग्रेस के द्वारा दलित प्रदेश अध्यक्ष बनाने से यह मुगालता नहीं पाल लेना चाहिए कि उन्हें इन वर्गों के वोट मिल जाएंगे। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी आज भी दलित समुदाय के बीच लगातार काम कर रही है और आने वाले चुनाव में यह दिखेगा कि दलितों का समर्थन उनके साथ बना हुआ है।
'सबकी पोल खुल चुकी, दलित भाजपा के साथ'
वहीं, भारतीय जनता पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चे के राष्ट्रीय महामंत्री संजय निर्मल ने दावा किया कि यूपी ही नहीं, पूरे देश के दलित मतदाता अब भाजपा की ओर देख रहे हैं। इसका बड़ा कारण है कि भाजपा ने केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल, भाजपा शासित राज्यों के मंत्रिमंडल, संगठन और राष्ट्रपति-राज्यपाल के रूप में नियुक्तियों में भी अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के लोगों को भागीदारी दी है। इन वर्गों को उन स्थानों पर भी स्थान दिया गया है जहां किसी तरह का आरक्षण न होने के कारण किसी वर्ग विशेष के व्यक्ति को बिठाना कोई मजबूरी नहीं थी।
भाजपा नेता ने दावा किया कि केंद्र-राज्य सरकारों में दलितों-आदिवासियों को विशेष तरजीह दी जा रही है। गरीब और पिछड़ा होने के कारण कल्याणकारी योजनाओं का सबसे ज्यादा लाभ भी इन्हीं वर्गों को मिल रहा है। इन वर्गों ने पहली बार देखा है कि इनसे जो वायदा किया गया है, उससे ज्यादा बढ़कर उन्हें दिया जा रहा है। जबकि इनके नाम पर अब तक कांग्रेस-सपा-बसपा नेताओं ने केवल अपने परिवार के लोगों का ही हित किया। यही कारण है कि अब दलितों-आदिवासियों की प्राथमिकता भाजपा है। उन्होंने कहा कि इन वर्गों की यह प्राथमिकता 2014 से अब तक लगातार दिख रही है और आगे भी दिखती रहेगी।