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RG Kar Case: अदालत ने क्यों कहा ये 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस' नहीं, जानें आरजी कर मामले में फैसले की खास बातें

Tue, 21 Jan 2025 12:25 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

पिछले साल अगस्त में महिला डॉक्टर के साथ बर्बरता मामले में आरोपी संजय रॉय को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। हालांकि दोषी रॉय को फांसी की सजा नहीं होने पर एक खेमे में नाराजगी भी है। इसको लेकर जब सवाल उठे तो कोर्ट ने इस मामले को 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' केस बताया है। 
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आरजी कर मामला - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर की दुष्कर्म के बाद हत्या करने वाला दरिंदा संजय रॉय अंतिम सांस तक जेल में रहेगा। अदालत ने उसे तीन धाराओं में अलग-अलग उम्रकैद की सजा सुनाई। तीनों सजाएं एकसाथ चलेंगी। अदालत ने रॉय पर 50,000 का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माना न चुकाने की स्थिति में उसे पांच माह अतिरिक्त कैद की सजा भुगतनी होगी। पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोलकाता पुलिस केस की जांच करती, तो दरिंदे को फांसी तक पहुंचाते।
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मौत की सजा नहीं देने पर कोर्ट का तर्क
सियालदह कोर्ट में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनिर्बान दास ने सोमवार को सजा सुनाते हुए कहा कि अपराध दुर्लभतम की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए दोषी को मौत की सजा देना उचित नहीं है। न्यायाधीश दास ने कहा, कोलकाता पुलिस के पूर्व वॉलंटियर रॉय को भारतीय न्याय संहिता की धारा 64 दुष्कर्म व 103 (1) के तहत हत्या में आजीवन कारावास दिया जाता है। साथ ही धारा 66 में मौत की वजह के लिए सजा के तहत दोषी को मृत्यु तक उम्रकैद की सजा सुनाई जा रही है। 

सीबीआई ने दोषी के लिए मौत की सजा की मांग की थी, जबकि बचाव पक्ष के वकील ने कैद की सजा का आग्रह किया था। गौरतलब है कि बीते साल 9 अगस्त को मेडिकल कॉलेज में जूनियर डॉक्टर की दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई थी। घटना को लेकर देशभर में प्रदर्शन हुए और डॉक्टरों ने महीनों तक आंदोलन किया।
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कोर्ट ने पुलिस की जांच पर उठाया सवाल
साथ ही सियालदह कोर्ट ने मामले में कोलकाता पुलिस की शुरुआती जांच की भी तीखी आलोचना की है। सुनवाई के दौरान न्यायाधीश अनिरबन दास ने प्रशासन पर सवाल उठाया कि पीड़िता के साथ हुई बर्बरता की सुबह रिपोर्ट किए जाने के बाद रात 11.30 बजे के बाद एफआईआर क्यों दर्ज की गई। न्यायाधीश ने अपने फैसले में दर्ज टिप्पणियों में अस्पताल के अधिकारियों की ड्यूटी पर मौजूद चिकित्सक के बलात्कार और हत्या को दबाने के प्रयासों के उद्देश्य पर भी सवाल उठाया। 

पुलिस की लापरवाही पर न्ययाधीश
सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने मामले में जांच के दौरान पुलिस की लापरवाही को लेकर कहा कि ताला पुलिस स्टेशन के अधिकारियों ने पहले मामले को गंभीरता से नहीं लिया, जिससे मामला जटिल हो गया। अगर पुलिस शुरुआत में सही कदम उठाती तो यह मामला इतनी समस्याओं में नहीं फंसता। साथ ही उचित कार्रवाई में देरी के लिए न्यायाधीश ने पुलिस अधिकारियों पर उदासीनता का आरोप लगाया। 

अस्पताल अधिकारियों की भूमिका
न्यायाधीश ने अस्पताल अधिकारियों की भी आलोचना की, जिन्होंने पहले इस अपराध को आत्महत्या के रूप में पेश करने की कोशिश की थी, ताकि अस्पताल को किसी भी परिणाम से बचाया जा सके। यह भी कहा गया कि जब अस्पताल के जूनियर डॉक्टरों ने इसका विरोध किया और प्रिंसिपल को शिकायत दी, तब पुलिस ने कार्रवाई शुरू की, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। इससे पीड़िता के माता-पिता को अपनी बेटी को देखने का मौका नहीं मिला।

साथ ही न्यायाधीश ने यह भी सवाल उठाया कि अस्पताल के अधिकारियों ने मामले की जानकारी पुलिस से छिपाने की कोशिश क्यों की और इस कृत्य से अस्पताल के प्रशासन की मंशा पर संदेह पैदा हुआ। इस तरह, न्यायाधीश ने पुलिस और अस्पताल दोनों की लापरवाही और अपराध की शुरुआत में हुई गलतियों की आलोचना की।

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