पूर्व आईपीएस प्रकाश सिंह का कहना है कि सीबीआई निदेशक और उनके अधिकारी सादी वर्दी वाले अफसर हैं। इनके साथ चार-पांच लोग ही होते हैं, कोई सुरक्षा का बड़ा तामझाम नहीं होता। यह कोई सरकार का तख्तापलटने या संसद पर कब्जा करने नहीं जा रहे थे। सरकार के पास इस तरह की कोई आपात स्थिति नहीं थी कि आनन-फानन ये निर्णय लिया जाये। मुझे समझ में नहीं आता कि सरकार इतनी हड़बड़ी में क्यों एक के बाद एक गलत निर्णय ले रही है। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि उसने(सरकार) किसी मुसीबत को भांपकर दोनों अफसरों को छुट्टी पर भेजा है।
दो स्थान पर हुई गफलत
सीवीसी(केंद्रीय सतर्कता आयोग) में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। सीबीआई के दोनों अफसरों को जबरिया छुट्टी पर भेजने को लेकर सीवीसी द्वारा भेजी गई रिपोर्ट उसकी(सीवीसी) की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर रही है। सीवीसी, सीबीआई की निगरानी करती है। यह सीवीसी को पता है कि सीबीआई के निदेशक और अंतरिम निदेशक में ठनी हुई है। सालभर से इसी तरह के हालात हैं। इसके बाद भी सीवीसी चुप बैठी है। अंतिम समय में सीवीसी रिपोर्ट दे रही है कि सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा ठीक ढंग से सहयोग नहीं कर रहे हैं। यह तो पूरा मजाक है।
दूसरी गफलत लोक कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग(डीओपीटी) ने की है। आखिर यह विभाग कर क्या रहा था। सीबीआई में स्थिति दिन प्रतिदिन खराब हो रही थी और यह विभाग किनारे खड़ा होकर तमाशा देख रहा था। इसे सबकुछ करने की आधी रात को ही समझ आई। सचमुच यह बड़ा ही हास्यास्पद मामला है। यह केंद्र सरकार की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
राकेश अस्थाना को क्यों बचा रही सरकार
सीबीआई के अंतरिम निदेशक नियुक्त हो गए हैं। निदेशक ने राकेश अस्थाना के खिलाफ मामले की जांच कर रहे अफसरों में किसी को नागपुर तो किसी को पोर्ट ब्लेयर भेज दिया। यह किसी की भी समझ में नहीं आया। विपक्ष का कहना है कि इससे तो यही संदेश जा रहा है कि जैसे सरकार सीबीआई निदेशक के आरोप को दरकिनार करके एजेंसी के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना को बचाना चाह रही है।