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40 साल पहले सुलगी थी असम में विरोध की चिंगारी, ऐसे पड़े थे एनआरसी के बीज 

Fri, 13 Dec 2019 08:33 PM IST
अमित कुमार अमित कुमार, नई दिल्ली
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असमिया अभिनेत्री बरशारानी बिषया और जाफिरा वाहिद ने शुक्रवार को गुवाहाटी में हुए अनशन में हिस्सा लिया। - फोटो : PTI
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असम एक बार फिर से जल उठा है। नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध की चिंगारी ने असम ही नहीं मेघालय और त्रिपुरा को भी अपनी चपेट में ले लिया। हर किसी के मन में एक ही सवाल उठ रहा है कि एनआरसी का समर्थन करने वाले असम को नागरिकता संशोधन बिल से क्यों आपत्ति है। आखिर इस विवाद की शुरुआत कहां से और कब हुई? 
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इन सवालों का जवाब ढूंढने के लिए हमें 40 साल पीछे जाना होगा। 

यह समय आपातकाल के बाद का था। उस समय केंद्र में जनता पार्टी की सरकार थी और प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई थे। असम में बेरोजगारी के अलावा बाहरी लोगों की वजह से सीमित संसाधनों पर बढ़ते बोझ का मुद्दा जोर पकड़ने लगा था। अगस्त 1978 में असम में विरोध-प्रदर्शन जोर पकड़ने लगे थे। खासतौर से छात्रों ने महंगाई, बेरोजगारी और विदेशियों की मौजूदगी का मुद्दा उठाना शुरू कर दिया था। 

अटल जी ने संसद में उठाया मुद्दा

जनता पार्टी में तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी संसद में देश में बढ़ते विदेशियों को लेकर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को यह जानकारी मिली है कि मतदाता सूची में बाहरी नागरिकों के नाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं। खासतौर से पूर्वोत्तर में। चुनाव आयोग ने भी चुनाव आयुक्तों को ऐसे नाम तलाशकर उन्हें सूची से हटाने का निर्देश दिया। असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोलप बोरबोरा ने भी समस्या को स्वीकार किया। 

मगर शुरू हो गई राजनीति 

मगर इस मुद्दे पर जल्द ही राजनीति शुरू हो गई। कई पार्टियों ने विदेशियों, खासतौर से बांग्लादेशियों को हिरासत में लेने और उन्हें बाहर किए जाने को राजनीतिक मुद्दा बनाना शुरू कर दिया। इस प्रक्रिया को धीमा करने के लिए कई प्रयास शुरू हो गए।

...फिर आया यह मोड़ 

असम में पनपते विरोध के बीच मार्च, 1979 को एक खुलासे ने चिंगारी को हवा दे दी। हीरालाल पटवारी असम के दरांग जिले के मंगलदोई लोकसभा क्षेत्र से सांसद थे। मगर 28 मार्च, 1979 को उनका देहांत हो गया। इसके बाद उपचुनाव की तैयारियों में इस क्षेत्र की मतदाता सूची सार्वजनिक हुई। 

70 हजार वोट जिनमें 45 हजार विदेशी 

मतदाता सूची के सार्वजनिक होने के कुछ ही समय में 10—20 नहीं बल्कि मतदाता सूची में विदेशियों का नाम होने की 70 हजार शिकायतें चुनाव आयोग तक पहुंची। आयोग ने जांच शुरू की, जिनमें 45 हजार शिकायतें सही पाई गईं। 

यह हाल सिर्फ एक लोकसभा क्षेत्र का था। असम की बाकी 13 लोकसभा सीटों का क्या? 

यह सवाल प्रत्येक असमवासी के दिमाग में बैठ गया। असम के छात्र संगठन आसू ने तुरंत चुनाव रद्द कराने की मांग शुरू कर दी। 
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छह साल लंबा चला आंदोलन 

  • इस एक घटना ने एनआरसी नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजन की नींव रख दी। 
  • असम में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। 
  • 1979 से 1985 के बीच छह सालों में 855 लोगों की जान गई 
  • 1985 में राजीव गांधी सरकार को झुकना पड़ा। एनआरसी लागू करने के साथ असम समझौता बनने के बाद विरोध प्रदर्शन खत्म हुआ। 
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