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कोरोना वायरस से खुद को मुक्त घोषित करने की जल्दबाजी क्यों है इन देशों को?

Fri, 19 Jun 2020 08:19 PM IST
अनिल पांडेय बीबीसी हिंदी

सार

दुनिया के तकरीबन 188 देश कोरोना वायरस से संक्रमित हैं। न्यूजीलैंड और फिजी जैसे कुछ देशों ने खुद को हाल ही में कोरोना के संक्रमण से मुक्त घोषित किया है। लेकिन न्यूजीलैंड में पिछले 24 घंटों में दो नए मामले सामने आ चुके हैं।
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जेसिंडा एडर्न - फोटो : Twitter
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विस्तार
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न्यूजीलैंड में 24 दिनों के बाद संक्रमण के ये नए मामले सामने आए हैं। जब न्यूजीलैंड ने 8 जून को कोरोना से पूरी तरह मुक्त होने की घोषणा की थी तब वहां पिछले 17 दिनों से कोई मामला सामने नहीं आया था और आखिरी मरीज उस दिन संक्रमण से पूरी तरह से ठीक हुआ था।

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न्यूजीलैंड के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, जिन दो नए लोगों में संक्रमण की पुष्टि हुई है, वे दोनों ही ब्रिटेन से लौटे थे और दोनों एक-दूसरे से संबंधित हैं। न्यूजीलैंड ने खुद को पिछले हफ़्ते ही कोरोना मुक्त घोषित करते हुए लॉकडाउन की सभी पाबंदियां हटा ली थीं लेकिन अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर अब भी रोक लगी हुई है।

प्रधानमंत्री जेसिंडा एडर्न ने कोरोना मुक्त होने की घोषणा के साथ चेताया था कि देश में फिर से मामले सामने आ सकते हैं। फिजी ने भी खुद को 5 जून को कोरोना मुक्त घोषित किया है।
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वहां के प्रधानमंत्री फ्रैंक बैनिमारामा ने तब ट्वीट किया था, "फिजी ने अपने आखिरी कोरोना मरीज को ठीक कर लिया है। हमारी टेस्टिंग की संख्या भी बढ़ गई है। आखिरी संक्रमण का मामला सामने आए हुए 45 दिन हो चुके हैं। कोई मौत नहीं हुई है और हमारी रिकवरी रेट 100 प्रतिशत है। दुआओं, कड़ी मेहनत और विज्ञान की मदद का यह नतीजा है।"

न्यूजीलैंड और फिजी के अलावा और भी कई देश हैं जिन्होंने खुद को कोरोना मुक्त घोषित किया है। इनमें सेशेल्स, वैटिकन सिटी, तंजानिया और मोंटेनेगरो जैसे कई देश शामिल हैं। इन सभी देशों ने अपने यहां संक्रमण के नए मामले नहीं आने और संक्रमण के पहले से मौजूद मामलों में आखिरी मरीज के ठीक हो जाने की स्थिति में कोरोना मुक्त होने की घोषणा की है।

लेकिन जहां न्यूजीलैंड ने 17 दिनों तक नए मामले नहीं आने के बाद कोरोना मुक्त होने की घोषणा की थी तो वहीं फिजी ने 45 दिनों तक नए मामलों के सामने नहीं आने के बाद यह कदम उठाया। वैसे ही दूसरे देशों ने भी दिनों के मामले में अलग-अलग अंतराल के बाद कोरोना मुक्त होने की घोषणा की है। कोई देश आखिर ये कैसे तय करता है कि वो अब खुद को कोरोना मुक्त घोषित कर सकता है।

जब यह सवाल हमने पूछा जेएनयू में सेंटर ऑफ सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ की चेयरपर्सन डॉक्टर संघमित्रा आचार्या से तो उनका कहना था कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अप्रैल की शुरुआत में कहा था कि कहीं पर अगर 45 दिनों तक संक्रमण का कोई नया मामला नहीं आया और वहां पर कोई सिम्प्टोमैटिक मरीज नहीं है तो उस क्षेत्र को कोरोना मुक्त घोषित किया जा सकता है लेकिन अब अलग-अलग देशों ने इस अंतराल में अपने हिसाब से बदलाव किए हैं।

आखिर अलग-अलग देशों ने मापदंड में ये बदलाव क्यों किए हैं?
इस पर संघमित्रा आचार्या कहती हैं, "जिन देशों में रिकवरी रेट बेहतर है, उन देशों ने 45 दिनों के इस अंतराल को अपने यहां कम कर दिया है। एक वजह यह भी थी कि इन देशों को दुनिया को बताना था कि हमारे यहां रिकवरी रेट बेहतर है। कुछ देशों ने इसलिए 15 दिनों का अंतराल अपनाया तो कुछ देश अब इससे भी कम दिनों के अंतराल में खुद को कोरोना मुक्त घोषित कर रहे हैं।"

वो बताती हैं कि भारत ने भी इस अंतराल को कम किया है और अब करीब दो हफ्ते तक अगर किसी क्षेत्र में कोई नया संक्रमण नहीं आता है और उस क्षेत्र के सभी संक्रमित मरीज ठीक हो जाते हैं तो फिर उस क्षेत्र विशेष को कोरोना मुक्त घोषित किया जा सकता है।

कोरोना मुक्त घोषित करने की यह जल्दबाजी क्यों?
खुद को कोरोना मुक्त घोषित करने की इस जल्दबाजी पर वो कहती हैं, "हर देश यह साबित करने में लगा हुआ है कि उसने कोरोना से बेहतर तरीके से निपट कर उसे मात दे दी है। इसे इमेज बिल्डिंग से जोड़कर देखा जा रहा है। अर्थव्यवस्था का भी सवाल है। हर देश जल्द से जल्द अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना चाहता है। तो इसके लिए भी जरूरी है कि वो खुद को कोरोना मुक्त घोषित करके आगे बढ़े। लेकिन ये न्यूजीलैंड जैसे देश के लिए मुमकिन है लेकिन तंजानिया या फिर भारत जैसे ही देश के लिए यह इतना आसान नहीं है।"

भारत के साथ क्या है समस्या?
संघमित्रा आचार्या कहती हैं कि भारत का हर राज्य अलग तरीके से व्यवहार कर रहा है इसलिए यहां किसी राज्य या क्षेत्र तक को कोरोना मुक्त घोषित करना मुश्किल है।

वो कहती हैं, "केरल में शुरू के दिनों में जिन तीन-चार जिलों में संक्रमण के मामले आए थे वहां कुछ हफ्तों तक जब तक की प्रवासी मजदूरों का पलायन शुरू नहीं हुआ था, नियंत्रण करने में कामयाबी मिली थी लेकिन वहीं महाराष्ट्र में शुरू के चार हफ्तों में पुणे, मुंबई और सांगली में जो संक्रमण था, वो बढ़कर कई और नए जिलों तक पहुँच गया। उत्तर-पूर्व के राज्य कई हफ्तों तक कोरोना मुक्त रहे लेकिन बाद में कम संख्या में ही सही लेकिन वहां भी संक्रमण पहुंच गया है।"

घनी और बड़ी आबादी का क्या है लेना-देना?
अभी तक जिन देशों ने खुद को कोरोना मुक्त घोषित किया है, उनमें लगभग सभी छोटी और कम सघन आबादी वाले देश ही हैं। न्यूजीलैंड की कुल आबादी जहां पचास लाख के करीब है तो वहीं फिजी और तंजानिया की आबादी क्रमश: करीब नौ लाख और साढ़े पाँच करोड़ हैं।

तो क्या यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि छोटी और कम सघन आबादी वाले देशों के लिए खुद को कोरोना मुक्त घोषित कर देना कहीं अधिक आसान है।

डॉक्टर संघमित्रा आचार्या कहती हैं, "कई घनी आबादी वाले देश में हमें जितना लगता था कि वहां संक्रमण की दर ज्यादा होगी वहां ऐसा नहीं हुआ। मसलन आप इंडोनेशिया और मलेशिया को देख सकते हैं। ये देश सघन आबादी वाले देश हैं लेकिन यहां आप संक्रमण की दर या फिर संक्रमण से होने वाली मृत्यु दर देखें तो यह उतनी नहीं है जितनी कुछ इससे कम घनी आबादी वाले देशों में हैं।"

वो आगे बताती हैं कि वायरस के संक्रमण का पैटर्न अलग-अलग देशों में अलग-अलग तरीके का है। अमरीका में अलग पैटर्न से संक्रमण फैला है तो स्पेन और इटली में अलग तरह से।

कोरोना मुक्त होने की तरफ कैसे बढ़ा जा सकता है?
कोरोना के लिए वैक्सीन और दवाइयों की खोज अब तक नहीं हो पाई है लेकिन हर देश अपने यहां संक्रमण के नहीं फैलने या फिर बिल्कुल भी रोक देने की कोशिश में लगा हुआ है। कोरोना मुक्त होने की ये कोशिशें आखिर कैसे कामयाब हो सकती हैं। डॉक्टर संघमित्रा आचार्या इसके लिए दो बातों पर जोर देने की बात कहती हैं- एक टेस्टिंग और दूसरी है ट्रैवलिंग।

वो कहती हैं, "हॉटस्पॉट को देखकर अगर सिर्फ वहां पर पूरी तरह से शुरू में लॉकडाउन किया जाता तो काफी हद तक कामयाबी मिल सकती थी। शुरू के दिनों में केरल में हमने यह तरीका कारगर होते हुए देखा है। चीन के वुहान क्षेत्र के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। वहां आज भी वुहान क्षेत्र के बाहर संक्रमण नहीं हो पाया है। थोड़े-बहुत मामले अब बीजिंग से आ रहे हैं लेकिन बहुत हद तक यह वुहान क्षेत्र तक ही सीमित है। ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि पूरे वुहान क्षेत्र की एक तरह से किलाबंदी कर दी गई थी।"

वो आगे कहती हैं, "इसलिए पूरी तरह से लॉकडाउन के बजाए हॉटस्पॉट को पहचान कर उन क्षेत्रों में सख्त पाबंदियां लगानी थीं। पूरी तरह लॉकडाउन करने से हासिल कुछ नहीं हुआ उल्टे इससे जुड़े कुछ दूसरे मसले सामने आ गए जैसे प्रवासी और अंसगठित क्षेत्र के मजदूरों की समस्या। इसके साथ-साथ संगठित क्षेत्र में काम करने वालों को भी बहुत कुछ झेलना पड़ा है।"

कोरोना मुक्त घोषित होने के बाद भी कोरोना के नए मामलों के आने पर संघमित्रा आचार्या कहती हैं कि संक्रमण के मामले तो आएंगे ही लेकिन अब अहम यह है कि संक्रमण से कोई देश कैसे निपट रहा है, सब कुछ इस पर निर्भर करता है।

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