पिछले वर्षों में उत्पादन कितना रहा?
भारत का चीनी उत्पादन पिछले एक दशक में काफी उतार-चढ़ाव से गुजरा है। वर्ष 2014-15 में देश का चीनी उत्पादन 283.10 लाख टन था, जो 2016-17 में घटकर 202.85 लाख टन रह गया। इसके बाद बेहतर मौसम और गन्ने की खेती बढ़ने से उत्पादन में तेज सुधार हुआ और 2021-22 में यह रिकॉर्ड 357.60 लाख टन के स्तर पर पहुंच गया, जो इस अवधि का सबसे अधिक उत्पादन था। हालांकि इसके बाद उत्पादन में गिरावट का दौर शुरू हुआ और 2022-23 में यह 328.15 लाख टन व 2023-24 में 319.64 लाख टन रह गया। आईएसमए के मौजूदा अनुमान के अनुसार 2025-26 में भारत का चीनी उत्पादन 349 लाख टन रहने की उम्मीद जताई गई थी।
इस सीजन में कितना रहा उत्पादन?
- सहकारिता मंत्रालय और नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज के अनुसार 15 अप्रैल 2026 तक देश में 273.90 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन हो चुका था।
- इस सीजन में चीनी मिलों ने 2,865.21 लाख मीट्रिक टन गन्ने की पेराई की।
- गन्ने से चीनी निकालने की औसत दर (रिकवरी) 9.56% रही।
- देशभर में 541 चीनी मिलें इस सीजन में संचालित रहीं।
भारत के चीनी उत्पादन में किन राज्यों का दबदबा?
एनएफसीएफसी के 14 फरवरी के आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक मिलकर देश के कुल चीनी उत्पादन में 87.48% हिस्सेदारी रखते हैं।
महाराष्ट्र इस सीजन में सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य बनकर उभरा है।
- चीनी उत्पादन: 89.80 लाख मीट्रिक टन (LMT)
- पिछले साल इसी अवधि में: 68.10 एलएमटी
- गन्ना पेराई: 960.43 एलएमटी
- पिछले साल गन्ना पेराई: 740.22 एलएमटी
उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है।
- चीनी उत्पादन: 65.60 एलएमटी
- पिछले साल इसी अवधि में: 63.25 एलएमटी
कर्नाटक तीसरे स्थान पर रहा।
- चीनी उत्पादन: 41.70 एलएमटी
- पिछले साल इसी अवधि में: 37.20 एलएमटी
निर्यात के आंकड़ों में कैसे दिखे बदलाव?
आंकड़ों के अनुसार, भारत का चीनी निर्यात पिछले कुछ वर्षों में काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा है। चीनी सीजन 2020-21 में देश ने कुल 70 लाख मीट्रिक टन (LMT) चीनी का निर्यात किया था। इसके बाद 2021-22 में निर्यात बढ़कर 110 लाख मीट्रिक टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
हालांकि, 2022-23 में कुल चीनी निर्यात घटकर 63.08 लाख मीट्रिक टन रह गया। इसके बाद घरेलू उपलब्धता सुनिश्चित करने और कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार ने निर्यात पर प्रतिबंधात्मक रुख अपनाया, जिससे 2023-24 में चीनी निर्यात लगभग थम गया और केवल 1 लाख मीट्रिक टन चीनी का निर्यात हुआ।
भारत के निर्यात बाजारों का भूगोल कैसे बदला?
भारत के निर्यात बाजारों का भूगोल बदल रहा है। वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान जहां इंडोनेशिया और बांग्लादेश सबसे बड़े खरीदार थे, वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में अफ्रीका और खाड़ी क्षेत्र के देश भारतीय चीनी की मांग का मुख्य आधार बन गए हैं। सोमालिया, सूडान, जिबूती, श्रीलंका, तंजानिया और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं।
अल नीनो कैसे डाल रहा चीनी उत्पादन पर असर?
मुंबई स्थित कमोडिटी ट्रेडिंग कंपनी एमईआईआर कमोडिटीज इंडिया के प्रबंध निदेशक राहिल शेख ने न्यूज एजेंसी रॉयटर्स से कहा कि भारत में पहले ही आपूर्ति दबाव में है और अब अल नीनो एक बड़ा जोखिम बनकर उभर रहा है। उनका कहना है कि अगर अनुमान के मुताबिक बारिश कमजोर रहती है तो गन्ने की खेती प्रभावित होगी।
रिपोर्ट के अनुसार मौसम विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस वर्ष भारत में मानसून 11 वर्षों के सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच सकता है। जून में सामान्य से 40 प्रतिशत से अधिक कम बारिश दर्ज होने के कारण कई किसानों ने गन्ने की बुवाई टाल दी है।
आत्मनिर्भर ऊर्जा की दिशा में भारत का लक्ष्य क्या है?
इसी दौरान भारत की एथेनॉल नीति भी तेजी से आगे बढ़ रही है। देश पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को प्रोत्साहित करने की दिशा में काम कर रहा है। उद्योग अनुमानों के अनुसार वर्तमान 12-13 अरब लीटर की तुलना में 2039-40 तक एथेनॉल की मांग बढ़कर लगभग 30 अरब लीटर तक पहुंच सकती है।
हाल ही में देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनियों में से एक ने पहला फ्लेक्स-फ्यूल यात्री वाहन पेश किया है, जबकि दोपहिया क्षेत्र में भी फ्लेक्स-फ्यूल मोटरसाइकिल बाजार में आ चुकी है। सरकार ने उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन को बढ़ावा देने के लिए कर संबंधी बदलाव भी किए हैं।
सरकार क्यों बनाना चाहती है एथेनॉल को वैकल्पिक ईंधन?
भारत सरकार एथेनॉल को केवल एक वैकल्पिक ईंधन नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति के अहम हिस्से के रूप में देख रही है। पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाकर देश की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने, कार्बन उत्सर्जन घटाने और किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर पैदा करने पर जोर दिया जा रहा है। इसी दिशा में भारत ने 2025 में पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य निर्धारित समय से पहले हासिल कर लिया।
अब सरकार इससे भी आगे की तैयारी कर रही है। अब सरकार E85 और E100 जैसे उच्च इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधनों को शामिल करना चाहती है। E85 में 85 प्रतिशत इथेनॉल और 15 प्रतिशत पेट्रोल होता है, जबकि E100 पूरी तरह शुद्ध इथेनॉल आधारित ईंधन है। उद्योग के कई विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में सरकारी नीतियां चीनी निर्यात की तुलना में एथेनॉल उत्पादन को अधिक समर्थन दे सकती हैं।
वैश्विक चीनी बाजार पर क्यों बढ़ रहा दबाव?
एसएंडपी ग्लोबल कमोडिटी इनसाइट्स की रिपोर्ट अनुसार वैश्विक चीनी बाजार पर दबाव बढ़ रहा है क्योंकि दुनिया के दो सबसे बड़े उत्पादक भारत और ब्राजील दोनों को खाद्य और ईंधन के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। भारत में उद्योग एथेनॉल उत्पादन को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाए रखने के लिए बेहतर कीमतों की मांग कर रहा है।
मुंबई में आयोजित चीनी, इथेनॉल और जैव ऊर्जा सम्मेलन में श्री रेणुका शुगर्स के कार्यकारी अध्यक्ष अतुल चतुर्वेदी ने कहा कि अगर गन्ने के रस से बनने वाले एथेनॉल की कीमतें नहीं बढ़ाई गईं तो उद्योग ज्यादा चीनी बनाने की ओर लौट सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अल नीनो की आशंका के बीच अगले सीजन में गन्ने की फसल इस वर्ष से बेहतर होने की गारंटी नहीं है।
एसएंडपी के अनुसार अमेरिकी कृषि विभाग का अनुमान है कि 2026-27 में वैश्विक चीनी उत्पादन घटकर 184.9 मिलियन टन रह सकता है। वहीं अंतरराष्ट्रीय चीनी संगठन ने भी 2026-27 में वैश्विक आपूर्ति घाटे का अनुमान जताया है।
ब्राजील में भी स्थिति आसान नहीं है। वहां चीनी की बजाय एथेनॉल उत्पादन के लिए अधिक गन्ना इस्तेमाल किया जा रहा है। अमेरिकी कृषि विभाग के अनुसार 2026-27 में ब्राजील का चीनी उत्पादन 4.25 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले सीजन से कम है।