पश्चिम बंगाल की राजनीति के वरिष्ठ नेता और पूर्व रेल मंत्री मुकुल रॉय का सोमवार तड़के दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 71 वर्ष के थे। परिवार के अनुसार, उन्होंने सोमवार सुबह करीब 1:30 बजे एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके बेटे शुभ्रांशु रॉय ने बताया कि वह पिछले कई दिनों से कोमा में थे। करीब चार दशक लंबे राजनीतिक जीवन में मुकुल रॉय ने कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी तीनों दलों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।
रॉय ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत यूथ कांग्रेस से की और 1998 में ममता बनर्जी के साथ कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। पार्टी के संस्थापक सदस्य के रूप में वह जल्द ही संगठन के प्रमुख स्तंभ बन गए और राष्ट्रीय महासचिव के पद तक पहुंचे।
हालांकि उनका राजनीतिक सफर विवादों से भी घिरा रहा। शारदा चिटफंड घोटाले और नारदा स्टिंग ऑपरेशन में उनका नाम सामने आया, जिसके बाद पार्टी नेतृत्व से उनके संबंधों में दरार आ गई। 2017 में उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया और बंगाल में पार्टी के संगठन को मजबूत करने व 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के बेहतर प्रदर्शन में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जब पार्टी ने राज्य की 42 में से 18 सीटें जीतीं। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के टिकट पर कृष्णानगर उत्तर सीट से जीत दर्ज की। हालांकि, चुनाव के बाद उनका भाजपा में प्रभाव धीरे-धीरे कम होता गया और उन्होंने जून 2021 में दोबारा टीएमसी में वापसी कर ली।
टीएमसी में वापसी के बाद भी वह पहले जैसी राजनीतिक सक्रियता हासिल नहीं कर सके और गिरती सेहत के चलते धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए। अपने चरम दौर में उन्हें पश्चिम बंगाल की राजनीति का चाणक्य कहा जाता था और वह कोलकाता के संगठनात्मक गलियारों से लेकर दिल्ली की सत्ता के केंद्र तक प्रभावशाली रणनीतिकार माने जाते थे।
पिछले कुछ वर्षों में उनकी सेहत लगातार गिरती रही। 2023 में डिमेंशिया से जूझने की बात सार्वजनिक हुई थी, जब दिल्ली यात्रा के दौरान उन्होंने खुद को भाजपा विधायक बताया था। वर्ष 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने दल-बदल कानून का उल्लंघन मानते हुए उन्हें विधायक पद के लिए अयोग्य ठहरा दिया था।
उनके निधन से पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक युग का अंत माना जा रहा है, क्योंकि वह राज्य की बदलती राजनीतिक धाराओं के प्रमुख रणनीतिक चेहरों में से एक थे।